यूपी के क्षत्रप सबक नहीं सीख रहे

झारखंड में भाजपा के सहयोगी रहे हेमंत सोरेन ने अपने सारे विवाद भूला कर कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़े और जीते। बिहार में भाजपा के सहयोगी रहे उपेंद्र कुशवाहा एनडीए छोड़ कर राजद और कांग्रेस के गठबंधन के साथ आ गए हैं। महाराष्ट्र में भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी शिव सेना ने भाजपा को रोकने के लिए अपनी धुरी वैचारिक व राजनीतिक विरोधी कांग्रेस से हाथ मिला लिया है और सरकार बना ली। पर ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश के प्रादेशिक क्षत्रप कोई सबक सीखने के मूड में नहीं हैं।

उत्तर प्रदेश के प्रादेशिक क्षत्रप अपने-अपने मुगालते में राजनीति कर रहे हैं। सबसे बड़े मुगालते की शिकार मायावती हैं। वे यह मानने को तैयार नहीं हैं कि उनका समय धीरे धीरे खत्म हो रहा है। वे अपनी लोकप्रियता और अपनी ब्रांड की राजनीति के चरम से अब उतार पर हैं। पूरे देश में उनकी पार्टी सिमट रही है। जिन राज्यों में कभी उनकी पार्टी को दस फीसदी तक वोट मिलते थे वहां एक फीसदी वोट के लाले हैं। दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र आदि राज्यों की राजनीति इसकी मिसाल है। उत्तर प्रदेश में भी भीम आर्मी जैसी छोटी पार्टी ने उनकी नींद उड़ाई है। भाजपा उनके दलित वोट को खत्म करने के लिए हर राज्य में छोटी छोटी पार्टियां खड़ी कर रही हैं। पर मायावती भाजपा के प्रति सद्भाव दिखा रही हैं और कांग्रेस से झगड़ा बढ़ाती जा रही हैं। ध्यान रहे उनकी वजह से पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को विपक्षी गठबंधन में जगह नहीं मिली थी। सपा और अखिलेश यादव के सद्भाव के बावजूद बसपा प्रमुख ने कांग्रेस का विरोध किया और उसे गठबंधन से अलग रखा। अभी भी वे भाजपा से ज्यादा कांग्रेस पर हमलावर हैं, जबकि हकीकत है कि प्रदेश में कांग्रेस 30 साल से सत्ता में बाहर है और केंद्र में भी लगातार दो चुनाव हार चुकी है।

मायावती को लग रहा है कि कांग्रेस उनका दलित वोट हथिया लेगी। सवाल है कि उस दलित वोट का वे कर क्या रही हैं? और कब तक उस वोट को सीने से चिपकाए रख सकती हैं? रेत की तरह वह वोट उनकी मुट्ठी से खिसक रहा है। वह भाजपा की ओर जा रहा है, कांग्रेस की ओर जा रहा है, भीम आर्मी की ओर जाएगा, दिल्ली में आप के साथ गया तो महाराष्ट्र में प्रकाश अंबेडकर और रामदास अठावले के साथ गया, पंजाब में भी आप के साथ चला गया और दूसरे राज्यों में भी अपनी जगह खोज रहा है। अगर मायावती कोई नई पहल नहीं करती हैं और लोगों के मूड को समझते हुए इस वोट का रचनात्मक इस्तेमाल नहीं करती हैं तो समय से पहले अप्रसांगिक होंगी। उन्हें इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि मुस्लिम उनके साथ आ जाएगा और फिर ब्राह्मण को जोड़ कर वे 2007 जैसा नतीजा हासिल कर लेंगी। 2007 के बाद से गंगा, जमुना में बहुत पानी बह चुका है।

कुछ कुछ इसी तरह का मुगालता समाजवादी पार्टी को भी है। लोकसभा चुनाव के बाद हुए उपचुनावों में अच्छे प्रदर्शन की वजह से उनको लग रहा है कि वे उत्तर प्रदेश में भाजपा के स्वाभाविक विकल्प हैं और अपने आप लोग उनके साथ जुड़ेंगे और वे 2012 के नतीजे को दोहरा देंगे। पर ऐसा कुछ नहीं होने वाला है क्योंकि 2012 के बाद राजनीति बहुत बदल गई है। नागरिकता कानून और नागरिक रजिस्टर पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, अयोध्या में राम मंदिर और सरयू किनाने भगवान राम की भव्य मूर्ति के बनने से राजनीतिक दशा-दिशा प्रभावित होगी। इसमें पुरानी तरह की राजनीति कारगर नहीं होने वाली है।

ध्यान रहे उत्तर प्रदेश में दोनों प्रादेशिक पार्टियों के पास अब भी वोट आधार बचा है, उसे ठीक तरह से दिशा देने की जरूरत है। प्रियंका गांधी वाड्रा को सक्रिय राजनीति में उतार कर कांग्रेस ने उनको उत्तर प्रदेश में झोंका है। वे एक नया चेहरा हैं और उनके प्रति लोगों का आकर्षण है। नागरिकता कानून के अलावा कई और कारणों से देश के मुस्लिम कांग्रेस को भाजपा का स्वाभाविक विकल्प मानने लगे हैं। ऐसे में भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस हर गठबंधन का अनिवार्य अंग है। सपा और बसपा दोनों को यह बात समझनी होगी। दूसरी ओर कांग्रेस को भी यह भ्रम छोड़ना होगा कि प्रियंका का चेहरा 2022 में जीत की गारंटी है। तीनों विपक्षी पार्टियां एक दूसरे की जरूरत को समझें तभी उनका भला है।

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