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कोविंद फेल तो एससी-एसटी एक्ट से कैसे वोट?

लाख टके का सवाल है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सुप्रीम कोर्ट में जाने के बजाय अपने हाथो से एससी-एसटी एक्ट बनवाने का फैसला किस राजनीतिक सोच में किया? अपना मानना है कि कुछ वैसी ही सोच में किया होगा जैसे रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाने का फैसला किया था। मतलब दलितों में वाह बनेगी कि देखों नरेंद्र मोदी ने एक दलित को राष्ट्रपति बनवा दिया और इससे दलितों के वोट उनके लिए पकेंगे।

मगर क्या पके? हिसाब से देखा जाए तो रामनाथ कोविंद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निजी लाभ याकि राष्ट्रपति भवन के भी पीएमओ की एनेक्सी बन जाने की भले उपलब्धि हो लेकिन भाजपा को रत्ती भर लाभ नहीं हुआ है। ऐसे ही मोदी-शाह कितना ही सोचे कि संसद में नया एससी-एसटी एक्ट बनवा कर वे उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र में दलितों में पांच-दस प्रतिशत वोट ही सही पका लेगें लेकिन होना ठीक विपरित है। 

संदेह नहीं कि मोदी-शाह की सियासी-वोट उधेड़बुन में इस समय उत्तर प्रदेश- महाराष्ट्र नंबर एक पर है। दोनों राज्यों की 128 लोकसभा सीटों में से कोई 115 सीटे भाजपा-एनडीए के पास है। इनकी वापसी के लिए मोदी-शाह दस तरह के जतन कर रहे हैं। मगर न उद्वव ठाकरे-शिवसेना–मराठा वोट भाजपा की गणित बनने देगें और न यूपी में बसपा-सपा का कोर वोट हिलना है। फिर ओबीसी आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलाने या एससी-एसटी एक्ट नया बनवा देने का भले ही कितना भी हल्ला मोदी-शाह करवाए। 

वजह गणित से ज्यादा केमेस्ट्री का बिगड़ा होना है। मोदी-शाह की नंबर एक गलती थी जो योगी आदित्यनाथ को उत्तरप्रदेश में और देवेंद्र फडनवीस को महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री बनाया। ये दोनों नेता जातियों में सद्भाव बनाने, उन्हें पटाने, सबको साथ ले कर चलने का स्वभाव लिए हुए नहीं है। तभी महाराष्ट्र में भी तीन सालों में भयावह जातीय संघर्ष बना तो योगी आदित्यनाथ से ब्राह्यण बिदके हुए है तो दलित व ओबीसी भी। ध्यान रहे दोनों जगह दलित अच्छी संख्या में है लेकिन क्या एक भी बार किसी ने सुना कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने बतौर दलित इन राज्यों में दलित आबादी में अपना जादू दिखाया। 

मतलब भाजपा के दलित चेहरे और दलित के घर जा कर खाना खाने की सारी कवायद इसलिए जीरो अर्थ रखने वाली है क्योंकि सियासी केमेस्ट्री के रसायन एक-दूसरे को खत्म करने वाले है। कही गोरक्षकों की मार, कहीं बीफ का हल्ला और कहीं चमड़े के कारोबार ने और कही सत्ता के साझे ने हालात ऐसे बना दिए है कि एक रसायन ठीक करेंगे तो दूसरा रसायन भड़केगा। 

तभी भाजपा संसद में नया एससी-एसटी एक्ट ला कर उसे पास कराएगी तो उससे यूपी के दलित भाजपा को नहीं बल्कि मायावती की वाहवाही इस धारणा में करेंगे कि मायावती, रामविलास, उदितराज, अठावले, खड़गे आदि दलित नेताओं ने हल्ला किया तो मोदी सरकार मजबूर हुई। यह उन दलित संगठनों की जीत है जिन्होंने भारत बंद करवाया या जिनका 9 अगस्त को बंद का आह्वान है। मतलब यूपी ,महाराष्ट्र में एक प्रतिशत दलित वोट भी भाजपा से वैसे ही नहीं जुड़ने है जैसे रामनाथ कोविंद को बनाने के बावजूद नहीं जुड़े। मगर हां, यूपी में ओबीसी, ब्राह्यण क्योंकि एससी-एसटी एक्ट से जरूर सर्वाधिक पीड़ित रहे है, इसलिए इनमें से दो-चार प्रतिशत वोट जरूर आम चुनाव में भाजपा से टूटेगे। ऐसा महाराष्ट्र में मराठा वोटों में भी होना है। 

सो यूपी व महाराष्ट्र की बदहवासी मोदी-शाह से गलत, उल्टी मार वाले फैसले कराने लगी है। महाराष्ट्र में अब इतने विकट हालात बन गए है, केमेस्ट्री इतनी बिगड़ गई है कि मराठा को पटाएगें तो ओबीसी, दलित बिदकेगे और दलित- ओबीसी को पटाएंगे तो मराठा- फारवर्ड बदकेगें। अब वहां कोई हिंदू लहर नहीं बननी है, नहीं चलनी है क्योंकि खांटी हिंदू शिवसेना मुंबई में ही यह हल्ला बनाए रखेगी कि ये तो गुजराती व्यापारी है न कि मर्द हिंदू! ऐसे ही योगी यूपी में कितना ही हल्ला कर लें वे जाट, ब्राह्यण, ओबीसी और दलित में वैसी हिंदू हवा बनवा नहीं सकते जो 2014 और 2017 में थी क्योंकि जातियों में परस्पर रिश्तों का 2014 से पहले का केमिकल फिर मुखर है। खुद योगी जब राजपूत इमेज और गंवार ठाकुर राज की इमेज बनवा बैठे है तो भाजपा के भी ब्राह्यण, ओबीसी, भूमिहार वोटों का केमिकल भगवा रंग को फीका बनाए हुए हो गया है। अपनी जगह यह भी तथ्य हैकि बसपा और सपा का ठोस वोट 2014 में जैसा था तो वह 2017 में भी जस का तस था और आगे भी वह रहेगा। वह किसी सूरत में बाग्लादेशी घुसपैठियों के हल्ले याकि हिंदु बनाम मुस्लिम के नए नैरेटिव की हवा में नहीं बहेगा। 

उस नाते रामनाथ कोविंद और एससी-एसटी एक्ट का उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र-बिहार में जीरो अर्थ है और जीरो ही अर्थ रहेगा। मगर हां, इससे भाजपा की खुद की केमेस्ट्री के पुराने केमिकल जरूर कुछ बिखरेंगे।

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