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संघ में बेचैनी कितनी?

जवाब मुश्किल है। मौटे तौर पर लगता है जैसे मोदी भक्त आम समर्थकों का मूड मोहभंग, बैचेनी, निराशा, तकलीफ व सफाई वाला है, वही मनोभाव संघ प्रचारकों का भी है। कुछ के लिए नरेंद्र मोदी अनिवार्य बुराई हो गई है तो अधिकांश के लिए मजबूरी। संघ का कोई 22-23 पदाधिकारियों का आलाकमान बनता है। इन सहित कार्यकारिणी के सदस्य, विशेष आमंत्रितों की कुल 50 लोगों की टीम में मूड के मौटे अनुमान में एक एक्स्ट्रीम बजरंग लाल गुप्त का है जो सत्य़ानाश देख रहे हैं तो दूसरा एक्स्ट्रीम मोहन भागवत का है जिनकी  थीसिस है कि वाजपेयी यदि बीस साल बरदास्त थे तो नरेंद्र मोदी को भी वक्त मिलना चाहिए। 

बावजूद इसके तथ्य है कि मोहन भागवत ने वृंदावन में मजदूर संघ, किसान संघ जैसे आर्थिक समूहों को छूट दी कि तुम लोगों को नीचे से जो फीडबैक है उस अनुसार आंदोलन करना हो तो करो। उसके बाद दशहरा के भाषण में 90 फीसद नसीहत दी और संभव है साल के आखिर में शिक्षा समूह के संगठनों को अनुमति मिले कि शिक्षा में मोदी सरकार ने कुछ नहीं किया तो तुम लोग अपनी बात सार्वजनिक तौर पर बोलो।

मीडिया में ध्यान नहीं गया लेकिन मोहन भागवत ने अपने दशहरा भाषण में शिक्षा नीति पर निराशा कम जाहिर नहीं की। शनिवार से भोपाल में संघ के पदाधिकारी इकठ्ठा हो रहे हंै। कार्यकारिणी मंडल की इस बैठक में भी जम्मू-कश्मीर, शिक्षा नीति जैसे संघ के कोर मसलों पर ज्यादा विचार होना है। अमित शाह को इस बैठक में सरकार की बात कहने के लिए बुलाया हुआ है। पर जैसे वे वृंदावन में भरोसा नहीं बना सकें वैसा भोपाल में न हो इसके आसार कम है। 

एक बात और जान ली जाए। संघ की कार्यकारिणी के जो चेहरे अपने मिजाज के अनुशासन में बंधे हुए है वहीं दूसरी तरफ संघ का मजदूर संघ हो या किसान संघ या विश्व हिंदू परिषद् ये पूरी तल्खी से ढाई लोगों की सरकार से प्रत्य़क्ष-परोक्ष तौर पर मोहभंग जाहिर कर रहे हैं। अपने को भरोसा नहीं हुआ मगर यहा तक किसी जानकार ने बताया कि प्रवीण तोगडिया एंड पार्टी के कई पदाधिकारी गुजरात में जुट गए हैं। 

एक बुनियादी सवाल उठता है कि जब नरेंद्र मोदी ने अपनी वाह-वाह का मीडिया नैरिटिव बनवा रखा है। जब चौतरफा तारीफ है। नरेंद्र मोदी खुद अपने श्रीमुख से श्रीकृष्ण की तरह ब्रहाण्ड की झांकी बताते हुए अभूतपूर्व विकास की नई श्रेणी में भारत के शामिल होने की बात कहते है तो संघ के लोगों को बैचेन क्यों होना चाहिए? मोदी सरकार के प्रोपगेंडा में संघ के पदाधिकारी और प्रचारक क्यों नहीं है? 

जवाब में अपनी पुरानी थीसिस है कि नरेंद्र मोदी की नंबर एक गलती है जो वे टीवी चैनलों, अंग्रेजी अखबारों याकि मीडिया, सोशल मीडिया में झूठ बनवा कर सवा सौ करोड़ लोगों को हकीकत में भटकाए रख सकने की खामोख्याली पाले हुए है। जब मोहन भागवत और उनके पदाधिकारियों को समझ आ रहा है कि नरेंद्र मोदी सिस्टम की सवारी नहीं कर रहे बल्कि सिस्टम उनकी सवारी करके गुमराह बनवा रहा है। संवाद और जमीनी हकीकत में दिन-रात का अंतर है तो जनता हो या संघ, फीलिंग वही बनेगी जो देश के हर बाजार में आज फीलिंग है। 

संघ के आला कमान में मोहभंग के विषय कई है। जम्मू-कश्मीर है, शिक्षा नीति है तो सरकार की अंहकारी तासीर होने के मैसेज व संवादहीनता भी है। संघ की तरफ से कृष्ण गोपाल, रामलाल आदि चाहे जो कार्डिनेट करें और अमित शाह कितनी ही बार झंडेवालान जाए उसके बावजूद संघ में सवाल तो यह है कि उसके शिक्षा समूह ने तीन सालों में जो सुझाव दिए क्या वे नीति में परिवर्तित हुए? जम्मू-कश्मीर में क्या पंडितों का, हिंदूओं का पुर्नवास हुआ?

जो हो, संघ परिवार उतना ही बैचेन है जितनी जनता है। अब जनता का जैसेयह भाव अपनी जगह है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प क्या है तो वह भाव संघ में भी है!

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