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संघ में जेटली बनाम मोदी बनाम राज

संघ में नरेंद्र मोदी बनाम अरुण जेटली की इमेज में क्या कुछ राय होगी? आम तौर पर अरुण जेटली पर ठिकरा फूटा हुआ है। मजदूर संघ, किसान संघ, लघु-मझौले उद्योगों के लघु उद्योग भारती आदि के आर्थिक समूहों ने संघ के पदाधिकारियों में सीधे अरुण जेटली पर ठिकरा फोड़ा हुआ है। कारण कई है। दिल्ली में जब पिछले दिनों लघु उद्योग भारती की बैठक हुई तब अरुण जेटली के खिलाफ खूब भंडास निकली। अपने को जान हैरानी हुई कि वित्त मंत्रालय में रहे संतोष गंगवार ने संघ परिवार के इन लोगों के आगे रोना रोया था कि अरुणजी उनकी सुनते नहीं। आप लोगों की बात रखी तो कहां आप तो उन लोगों की भाषा बोलते है। संतोष गंगवार क्योंकि बहुत जमीनी नेता है, कई बार लोकसभा सांसद चुने हुए हैं और संघ में उन्हंे माना जाता है। सो वित्त मंत्रालय में ढर्रे की फीडबैक ने भी कई तरह की प्रतिक्रिया बनवाई। तभी उन्हें पिछली फेरबदल में मजूदरों की चिंता करने वाले श्रम मंत्रालय में शिफ्ट कर दिया गया।

मौटे तौर पर िठकरा अरुण जेटली पर फूटा हुआ है। और उनका संवाद कायदे से सुरेश सोनी से रहा है। पर सोनी अपने को मिली यह फीडबैक देने से रहे कि फैसले प्रधानमंत्री मोदी लेते है। जेटली को पता नहीं होता और प्रधानमंत्री दफ्तर फैसले लेता जाता है। 

इसलिए संघ में बहुतों को गलतपहमी रही कि कैबिनेट की पिछली फेरबदल में जेटली को हटाना था। ऐसा नहीं हुआ तो अब थीसिस है कि दिल्ली की अंग्रेजीदा जमात में नरेंद्र मोदी, अमित शाह अंग्रेजी की हीनता से ऊबर नहीं पा रहे है। तभी इनके लिए अंग्रेजीदा जेटली की उपयोगिता बनी हुई है। 

सो संघ परिवार में मोहभंग की बढ़ती धारणा के साथ माना जाने लगा है कि ढाई लोगों का साथ आखिर तक रहना है। नरेंद्र मोदी-अरुण जेटली में भेद करना व्यर्थ है। हां, यह भी जान ले कि अरूण शौरी का ‘ढाई लोगों’ का जुमला संघ परिवार में जबरदस्त हिट हुआ है। यह जुमला सरकार का पर्याय बन गया है। गुरुवार को हल्ले के साथ नरेंद्र मोदी ने आर्थिकी पर विचार के लिए आपातकाल बैठक बुलाई। अगले दिन नया इंडिया में मोदी-जेटली-शाह की खबर के साथ फोटो थी तो संघ जमात से एक रिएक्शन था कि फिर देखों ढाई लोगों ने सीलबंद चैंबर में मंत्रणा की। बेहतर होता यदि नरेंद्र मोदी पांच चेहरों को बैठा कर चर्चा करते! 

सो परसेप्सन, धारणा में संघ के भीतर भी नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली या अमित शाह का अलग-अलग वजूद अब खत्म है। अमित शाह संघ बैठक में जा कर भले जो बोले उनकी संघ स्वंयसेवक की स्वतंत्र पहचान अब खत्म है। छह महीने पहले तक संघ में सुना जाता था कि अमित शाह उनकी बात पहुंचा रहे है। वे सब समझते है। हकीकत जानते है। वे फैसले करा सकते है। मगर अब धारणा है कि जैसे मोदी है वैसे अमित शाह है। वे संघ के उपयोग में मोदी के औजार है न कि वे संघ के पहले है। शिक्षा, जम्मू-कश्मीर, आर्थिकी को ले कर जितने सुझाव उनके जरिए दिए गए है वे सब संवाद बन कर रह गए। सरकार में उन सुझावों पर नीतिगत नोट नहीं बनते। 

यह बारीक, गहरी बात है। संघ पदाधिकारियों, संगठनों में अब यह सोच दो टूक है कि उनका एजेंडा सिस्टम खा गया। इसमें अपनी थीसिस है कि प्रचारक नरेंद्र मोदी और संघ दोनों वह मेकेनिज्म, वह वैचारिक खांका लिए हुए ही नहीं है जिससे विचार-सुझाव-नीति का क्रम कम्युनिस्टों के राज जैसे सत्ता में दौड़ने लगे। इसे और बारीकि से उदाहरण से समझे। मैंने पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में इंदिरा गांधी के राज में लेफ्ट झुकाव की बाते सुनी थी। तब पीएन हक्सर, मोहन कुमारमंगलम,   जी पार्थसारथी, डीपी धर, नरूल हसन जैसे नाम सुने थे। य़े सब विचारधारा, विचार लिए हुए थे। कोई माने या न माने इस लेफ्ट जमात ने इंदिरा गांधी से वह काम करवाया जिसने भारत की तासीर को संविधान तक में समाजवाद, सेकुलरवाज जैसे शब्दों में उस वक्त भी पूरे खटके से ढलवाया जब इंदिरा गांधी के आगे जहां संगठन कांग्रेस, पुराने नेताओं के दमदार विरोध की बाधाएं थी तो जनादेश में भी टोटा था। 

हां, वह लेफ्ट विचारधारा का भारत में स्वर्णिम काल था। तब नरूल हसन ने अकेले बतौर शिक्षा- संस्कृति राज्य मंत्री (स्वतंत्र) लेफ्ट के सुझावों को मिनिस्ट्री में सरकारी हरे कागजों पर नोट बनवा-बनवा कर ऐसे दौड़वाएया कि शिक्षा-संस्कृति के क्षेत्र में वह कमाल हुआ जिसका रोना पिछले चालीस सालों से संघ परिवार रो रहा है। सोचे लेफ्ट के असर में संविधान तक में संसोधन तब हुए!

अपनी स्याही से आज यह पते का गहरा उदाहरण निकला है कि अपनी विचारधारा में लेफ्ट ने इंदिरा गांधी को औजार बना कर सरकार में हरे कागज की नोटशीट चलवा कर संविधान संशोधन तक कराए तो शिक्षा-संस्कृति-अर्थ नीति-राष्ट्रीयकरण सब ( जो जनादेश के कारण उनका हक था) करवाएं जबकि आज ढाई लोगों की सरकार के नीचे पूर्ण दो टूक बहुमत के बावजूद प्रकाश जावडेकर हो या महेश शर्मा या धर्मेंद्र प्रधान कोई भी दक्षिणपंथी, हिंदूवादी विचार के सुझावों को नोटशीट में बदल अफसरों से उन्हे आगे नहीं बढ़वा रहे! 

गजब बात! गपशप का यह कालम और इतनी गंभीर बात! मैं मोदी बनाम जेतली की बात पर कहा से कहां आ गया तो वजह संघ परिवार की छलक रही छटपटाहट है। इसमें कोर बात मोदी-जेटली का अफसर को, सिस्टम को हावी बनाए हुए होना है। इससे जहां जनता पिस रही है वही सचिवों के यहां हरे कागज की नोट शीट हिंदू विचारों को ले कर नहीं बनी है। (नोटबंदी,जीएसटी की नोटशीटे न हिंदू एजेंडे की थी और न यह समझदारी या विचार लिए हुए थी। ये महज नौटंकी भरी उलटे ऐसे बनी जिसमें अफसरों के मजे बने रहने है।) ऐसा इसलिए कि वैचारिकता के लिए समझ, निश्चय पहली आवश्यकता होती है। दूसरे लेफ्ट ने तब जो किया तो वह जुमलेबाजी की मूर्खता नहीं थी बल्कि विचारधारा थी जिसे सामूहिकता, संगठन, और गर्वनेश की समझ से अमक करा सकने की संकल्प शक्ति ने सरकार में नोट शीटे बनवाई थी। दूसरी और आज जुमले है, ढाई लोग है, बौना संगठन है तो बौने मंत्री है। इन मंत्रियों को नोटशीट बना सकने की न अंग्रेजी (हिंदी लाने की हिम्मत नहीं) आती है और न उसे दृढ़ता से आगे बढ़ाने का सकंल्प है।

एक बात और जाने। सरकार में नोटशीट, शासन के तरीके की विश्वसनीय पुस्तक अरूण शौरी की लिखी हुई है। जिन्हे नोट बनाना, अंग्रेजी लिखना, नीति बनवा कर रिकार्ड तोड विनिवेशन (बिना विवाद के) का अनुभव है वे ढाई लोगों के राज  में वर्जित है और जुमले बोल, जुबानी ब्रीफिंग ले कर जुबानी वकालत करने वाले ढाई लोगों का ठेका हिंदू राज का, संघ परिवार का है!  

सोचे, हिंदू विचार, उसकी सियासत, सत्ता का यह पोस्टमार्टम क्या गलत है? कितना त्रासद है यह!  निसंदेह तभी आज हिंदू की विचारहीनता और पूरे संघ  परिवार के कथित, चाल,चेहरे, चरित्र का प्रतिनिधी मजाक ढाई चेहरों का है! क्या नहीं?

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