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मोदी-शाह को कितनी संघ की जरूरत?

हरि शंकर व्यास

साल आखिर और शुरुआत में संघ पदाधिकारियों से अमित शाह- अरुण जेटली की मुलाकात ने सुर्खियां बनवाईं। कंफ्यूजन और हल्ला हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह गुजरात के नतीजों से विचलित है। सो ये दोनों 2018 में आरएसएस को अधिक महत्व देंगे। पूछ कर काम करेंगे। हिसाब से यह फालतू बात है। इसलिए कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों ने पिछले पौने चार साल सरकार और संगठन को जैसे अपनी मर्जी चलाया है वह स्वभाव बदल नहीं सकता। वही 2018 में भी रहेगा। संघ के मोहन भागवत, सुरेश जोशी आदि का इनके लिए मतलब उतना ही है जितना मार्गदर्शन मंडल के लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. जोशी आदि का है। वजह साफ है। जब नरेंद्र मोदी-अमित शाह- अरुण जेटली तीनों का दो टूक मानना है कि हमारी बदौलत जीत और सत्ता है और हमें चुनाव जीतना आता है तो संघ को वैसे ही जीने दिया जाए जैसे मार्गदर्शक नेताओं का जीवन है। था कभी इनका योगदान अब क्या मतलब है। अब तो हमसे दुनिया है। 

हिसाब से मोदी-शाह पिछले चार सालों में आडवाणी को उनके जन्मदिन पर बधाई देने उनके घर भी गए लेकिन मोहन भागवत से उनके जन्मदिन पर कोई मिला हो, इसका पता अपने को नहीं है। सत्ता में आने से पहले अमित शाह पहले स्वयंसेवक और फिर नरेंद्र मोदी का हनुमान होने का भाव लिए हुए थे। सत्ता के बाद उनका भाव चाणक्य वाला है। वे सबके रणनीतिकार है तो अब स्वयंसेवक कहां रहे?  

बावजूद इसके गुजरात चुनाव का गुणात्मक नतीजा अमित शाह का गिरा ग्राफ है। वे अब न नरेंद्र मोदी के सहज उत्तराधिकारी है और न उनकी अध्यक्षता स्थाई। गुजरात ने संघ पदाधिकारियों में धारणा और चिंता बना दी है कि ये जब गुजरात में इतने पसीने से जैसे तैसे जीते है तो बाकि देश में ये और कितनी मेहनत कर लेगें?  तभी प्रधानमंत्री और अध्यक्ष दोनों गुजरात से लगातार बने रहे, यह तुक वाली बात नहीं। मतलब संघ पदाधिकारियों के लिए जनता पर सरकार के असर का गंभीर मसला है तो यह चिंता भी है कि ऐसे कैसे संगठन चलेगा? ध्यान रहे अध्यक्ष बनने के बाद अमित शाह ने केंद्रीय पदाधिकारियों की न टीम बदली और न संघ की फीडबैक अनुसार व्यवहार और चेहरे बदले। जैसे सरकार में नरेंद्र मोदी सोचते है कि वे अकेले सौ के बराबर है। सर्वज्ञ है और चुनाव में उनका जादू चलता है तो वही भाव अमित शाह का भी बना है। उन्हंे भला क्यों संघ की फीडबैक, सलाह, ढर्रे की जरुरत है।

तभी जो मेल-मुलाकाते है वे दिखावे की है। अमित शाह उज्जैन तब पहुंचे जब संघ की बैठक लगभग समापन में थी। बजट के बहाने संघ पदाधिकारियों से अरुण जेटली से मुलाकात कुल मिला कर संघ में दिखावे की जनसंपर्क कवायद थी। सरकार जब बुलंद हौसले में थी तब स्वदेशी या संघ वालों के सुझावों को बजट में जगह नहीं मिली तो अब आखिरी बजट में क्या खांक महत्व मिलेगा। अरुण जेटली से मुलाकात के बाद तमाम संगठनों के प्रमुखों का मूड कुल मिला कर यह झलका कि ये सुनते भी कायदे से नहीं है तो करेंगे क्या! हमें समझाते है समझते नहीं।

पर चुनाव करीब है। सो संघ पदाधिकारियों को 2018 में पटाने की जबरदस्त कोशिश होगी। शायद इसलिए भी कि गुजरात में संघ और उनके सहयोगी संगठनों के लोग या तो उदासीन थे या बेमन काम करते हुए। एक बड़ा प्रमाण विश्व हिंदू परिषद् के प्रवीण तोगडिया और उनके तमाम पदाधिकारी, प्रचारकों का है। कईयों ने माना कि इन्होंने मन से काम नहीं किया। इसलिए नहीं किया क्योंकि नरेंद्र मोदी और उनके प्रधानमंत्री दफ्तर ने वीएचपी की दुकान वैसे ही बंद कराने की कोशिश की जैसे अरुण जेटली ने बतौर वित्त मंत्री किसान संघ, मजदूर संघ, स्वदेशी मोर्चे आदि को उनके समर्थकों के बीच ही खलनायक बनवाया। 

हां, हर कोई जानता है कि विश्व हिंदू परिषद् की मुख्य वजह राम मंदिर है। वीएचपी ने आंदोलन खड़ा किया और मंदिर वहीं बनेगा की जिद्द पकड़े रखी। और इस वीएचपी को इस मसले में अप्रासंगिक बनाने की 2017 में जबरदस्त कोशिश हुई। प्रधानमंत्री दफ्तर ने 2017 में श्रीश्री रविशंकर को आगे करा विश्व हिंदू परिषद को हाशिए में डालने की कोशिश की। श्रीश्री रविशंकर ने अयोध्या जा कर, अलग-अलग पक्षों से बात करने का जो भी काम किया वह वीएचपी, तोगडिया को नागवार लगा। कहते है इस बारे में खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शंकराचांर्य के एक कार्यक्रम में दो टूक राय दे कर पीएमओ को मैसेज दिया था कि जिन्होंने मंदिर निर्माण का ध्येय बनाया हुआ है उन्हें ही इस बारे में आगे काम करना चाहिए। लेकिन साफ मैसेज के बावजूद पीएमओ ने श्रीश्रीरविशंकर से पंचायत करवाई। 

हकीकत है कि नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगडिया में शुरू से छतीस का आंकडा है। तोगडिया गुजरात से और पटेल है। इसलिए मोदी- शाह का शक बनना स्वभाविक है कि तोगडिया और उनके लोगों ने पटेलों का भडकाया तो नहीं? चुनाव में इनका रूख क्या रहा? जो हो, अयोध्या मामले में श्रीश्री रविशंकर को आगे करना वीएचपी और तोगडिया के लिए आग में घी का मामला था। सो दोनों तरफ ठनी। नौबत यहां तक आई कि प्रवीण तोगडिया को वीएचपी से आउट करने की रणनीति बनी। संगठन में आमने-सामने का टकराव हुआ। चुनाव में तोगडिया पैनल और विरोधी पैनल में मुकाबला हुआ और तोगडिया ने बहुमत की ऐसी ताकत दिखाई कि मोदी-शाह अनिवार्यतः अब सोच रहे होंगे कि 2018 में कहीं वीएचपी खेल न बिगाड़े। इसमें संघ के आला पदाधिकारियों ने, सुरेश भैय्याजी जोशी ने शक्ति परीक्षण रोकने और अपना रोल कैसे –क्या किया इसकी बारीकियों में जाने की जरुरत नहीं है। मोटी बात है कि संघ के अधिकांश संगठनों में धारणा बन गई है कि जनता के बीच, हिंदुओं में यदि मोहभंग की वजह है तो वह मोदी-शाह-जेटली का खुद अपने हाथों एंटी इनकंबेसी माहौल बनवाना है। तभी बुनियादी पेंच मोदी-शाह बनाम संघ, वीएचपी, किसान-मजदूर संघ आदि में आज किसको कितनी जरुरत है जो वह दूसरे को मनाए,पटाएं? 

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