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उफ! अब सुप्रीम कोर्ट में भी यह!

जिन बातों ने, जिस माहौल ने रिर्जव बैंक, चुनाव आयोग, मीडिया, सीबीआई आदि एजेंसियों की साख, विश्वसनीयता, सम्मान को दो कौड़ी का बनाया है वह अब सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच गया है। गुरुवार और शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में जो देखने को मिला उसके फोकस में भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा है। भारत में हम और आप भले शर्म महसूस न करें लेकिन दुनिया की न्यायिक जमात में ताजा किस्सा भारत की न्यायपालिका, उसके चीफ जस्टीश को विचारणीय बना गया है। दुनिया के किस सभ्य लोकतांत्रिक देश की सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टीस ने अपनी ही बैंच में अपने कानों से यह सुना होगा कि माई लार्ड आप इस केस की सुनवाई न करें क्योंकि शक की सुई आप पर है!  ऐसा सुनने पर चीफ जस्टीस को ग्लानि नहीं हुई, गुस्सा नहीं आया जो या तो सुनवाई से उठ चल देते या कहने वाले को उसी वक्त अवमानना का नोटिस थमा जेल में डालते। इसके उलटा हुआ। वरिष्ठ वकील के कहे की अनसुनी करते हुए चीफ जस्टीस ने अपना यह अधिकार रेखांकित किया कि उन्हंे अधिकार है कि कौनसी बैंच क्या सुनेगी?  इस अधिकार के हवाले सुप्रीम कोर्ट के ही टॉप वरिष्ठतम जजों की बैंच गठित करने के उस आदेश को उन्होंने खारिज किया जो एक दिन पहले उनके साथी, नंबर दो जज ने जारी किया था!

संदेह नहीं कि चीफ जस्टीस अपनी अदालत, अपनी संस्था में व्यवस्था, गरिमा बनवाए रखने के अधिकार लिए हुए होने चाहिए। अदालत के मुखिया हैं, चीफ है तो चीफ ही तय करें कि कौन जज कौन सा केस सुने। पर उस मामले में क्या हो जब सामने वकील यह जिरह करें कि शक की सुई आप पर उठी हुई है!

ध्यान रहे गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के नंबर दो जज जस्टीस जे. चेलामेश्वर और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर याकि दो जजों की बैंच ने आदेश दिया कि मामले की सुनवाई के लिए सर्वाधिक सीनियर पांच जजों की संवैधानिक बैंच का गठन हो। न्यायिक सुधार व न्यायिक जवाबदेही के एक एनजीओ की तरफ से जस्टीस चेलामेश्वर की बैंच के आगे इस मांग को ले कर याचिका थी कि ओडिशा हाईकोर्ट के पूर्व जज आईएस कुद्देशी के भ्रष्टाचार की जांच के लिए विशेष जांच दल याकि एसआईटी का गठन हो। ध्यान रहे इन्हें 21 सिंतंबर को सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। 

सीबीआई की एफआईआर में आरोप है कि हाईकोर्ट के एक पूर्व जज और अन्य लोगों ने लखनऊ के मेडिकल कॉलेज के मामले में टॉप अदालत में अपने पक्ष में निपटारा कराने का आश्वासन देते हुए साजिश रची। इसके लिए रिश्वत के रूप में मोटी रकम मांगी। इसी पर एनजीओ की याचिका थी। जस्टीस चेलामेश्वर की बैंच ने सीबीआई को आदेश दिया कि 19 सितंबर को दर्ज हुई एफआईआर संबंधित सामग्री, दस्तावेज सुरक्षित रखें। 13 नवंबर को सीलबंद लिफाफे में ये दस्तावेज और संबंधित सामग्री संविधान बैंच को दे। याचिका में मांग है कि अदालत रिटायर जज की कमान में एसआईटी बनवाए। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी रहे।  

इसी याचिका पर गुरुवार को जस्टीस चेलामेश्वर की बैंच ने सुनवाई की थी। बैंच ने अदालत के पांच वरिष्ठ जजों की संवैधानिक बैंच के गठन का आदेश दिया। 

क्या यह आदेश अनहोना था? इसमें मंशा की कोई गड़बड़ है? पर कुछ था जिससे अगले दिन चीफ जस्टीस दीपक मिश्रा ने अपनी अध्यक्षता में हड़बड़ी के साथ पांच सदस्यों की बैंच बैठा एक दिन पहले की दो जजों की बैंच के फैसले को यह कहते हुए रद्द किया कि बतौर प्रमुख उन्हें अधिकार है कि कौन क्या सुने! इस बैंच में  प्रशांत भूषण से पूछा गया कि गुरुवार को जस्टीस चेलामेश्वर की बैंच के आगे क्यों सेकेंड़ पीटिशन डाली गई जब शुक्रवार को मैटर सुनवाई के लिए था? 

इसी के साथ चीफ जस्टीस की बैंच के आगे वे बाते हुई जिनसे ये सीधे सवाल बन गए है कि सीबीआई ने जो एफआईआर बनाई है उसमें जांच से या न्यायपालिका पर उठे सवालों पर यदि सर्वाधिक सीनियर जजों की बैंच जांच दल बनाने या न बनाने का फैसला करें तो भला हर्ज क्या है? अंततः तो अदालत को ही अपनी निगरानी में जांच करानी होगी। इस गंभीर मामले पर भी यदि सुप्रीम कोर्ट, न्यायिक बिरादरी बंटी दिखे, लड़े तो मोदी सरकार के तो मजे होगें। 

निश्चित ही शुक्रवार को चीफ जस्टीस और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण में जो संवाद हुआ वह न्यायिक इतिहास में अनहोना है तो न्यायपालिका पर दबिस बनाने वाले तंत्र के लिए सुनहरा मौका है। कोर्ट में प्रशांत भूषण का कहना था- चीफ जस्टीस को इस मामले में सुनवाई से अपने को इसलिए अलग करना चाहिए क्योंकि पहले उन्हीं की बैंच ने लखनऊ के इस आरोपी मेडिकल कॉलेज के मामले में आर्डर दिया है। इस पर चीफ जस्टीस ने बताया कि उन्होंने इसे राहत नहीं दी थी बल्कि मेडिकल काउंसिल को फैसला लेने को कहा था। चीफ जस्टीस ने यह भी कहा- नहीं, आप हमारे आर्डर पर कमेंट नहीं कर सकते। 

इस पर वकील की हिमाकत अवमानना वाली थी। तभी सुनवाई के दौरान जस्टीस अरूण मिश्रा ने पूछा – यदि कोई कहें कि भारत के चीफ जस्टीस को सुनवाई नहीं करनी चाहिए तो क्या यह अदालत की अवमानना नहीं होगी? इस पर भूषण का कहना था – मैं अभी भी कहूंगा कि इस केस से चीफ जस्टीस को अपने को अलग करना चाहिए। लार्डशीप एफआईआर आपके खिलाफ है। सुन चीफ जस्टीश बोले – कौन सी एफआईआर मेरे खिलाफ? यह नानसेंस है। कोई एक शब्द नहीं है एफआईआर में मेरा नाम लेते हुए।... पहले हमारा आदेश पढ़ों। मुझे खेद है। आप अब अवमानना के लिए लायेबल है। इस पर भूषण ने हिमाकत से कहा – तब अवमानना नोटिस जारी करें मेरे खिलाफ। इस पर चीफ जस्टीस का कहना था – अवमानना लायक नहीं है आप ( यू आर नोट वर्थी ऑफ कंटेप्ट!) 

भूषण ने नहीं रूकते हुए कहा – मैं अनुरोध करता हू चीफ जस्टीस से कि वे इस मामले को न सुने। इससे अदालत के प्रति असम्मान बनेगा। सरकार के एएसजी नरसिंहा ने कहा – पार्टी तय नहीं करा सकती कि कौन सुनवाई करें और कौन नहीं। यदि ऐसा चला तो संस्था काम नहीं कर सकती। भूषण ने बताया कि गुरुवार की सुनवाई के दौरान जस्टीस चैलामेश्वर की बैंच के आगे सीजेआई दफ्तर की तरफ से नोट आया बताते है जो आर्डर के साथ रिकार्ड है। इस पर चीफ जस्टीश का कहना था वह उनका नोट था और रजिस्ट्री दफ्तर से बैंच को गया था। तब सुप्रीम कोर्ट बॉर के अध्यक्ष और सचिव ने भूषण पर कहा ये पूरी संस्था पर न कि एक व्यक्ति पर लांछन लगा रहे है। यह अवमानना वाली बात है।  

मगर जस्टीस अरूण मिश्रा ने भूषण पर अवमानना की बात पर कहा – संयम हमारा पॉवर है! जस्टीस अरूण मिश्रा ने यह भी कहा कि  सुप्रीम कोर्ट के एक जज की तरफ एफआईआर में संकेत हो यह इसलिए असंभव है क्योंकि यह कानून है कि ऐसी एफआईआर बिना भारत के चीफ जस्टीस की अनुमति के नहीं हो सकती।  क्या हम अपनी न्यायपालिका को एक एसआई (सब इंस्पेक्टर) के डिस्पोसल पर ला देगें... यह अकल्पनीय है और परमिशिबल नहीं। भूषण के आरोप एफआईआर में नहीं झलकते और केवल अफवाहे है। सो भूषण एंड पार्टी ने चीफ जस्टीस पर शक की सुई उठाई तो उनकी बैंच ने जस्टीस चेलामेश्वर के एक दिन पहले के आर्डर पर क्षोभ प्रकट करते हुए कहा कि ऐसा कोई पूर्व उदाहरण नहीं है जिसमें दो जजों की बैंच से संवैधानिक बैंच बनाने का आर्डर हुआ हो। 

ध्यान रहे एक सदस्यी बैंच तीन जजों की बैंच के लिए कह सकती है। दो जजों की बैंच पांच सदस्यों की कह सकती है या नहीं, इसका उदाहरण नहीं बताया जाता है। जस्टीस चेलामेश्वर चीफ जस्टीस के बाद सुप्रीम कोर्ट में नंबर दो जज है। उन्होने पांच सदस्यों की बैंच के आदेश के साथ उसमें कौन होगा यह तय कर दिया इस आदेश से कि वह सर्वाधिक वरिष्ठ जजों की संवैधानिक बैंच हो। तभी प्रशांत भूषण ने सुनवाई का बहिष्कार करने के बाद टिवट किया कि भारत के मुख्य न्यायधीश ने अपने चुने जजों की बैंच से पिछले दिन के उस आर्डर को रद्द किया जिसमें टॉप जजों को बैठना था। ऐसा कंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट के बावजूद! 

सो  गुरुवार-शुक्रवार का यह किस्सा अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टीश दीपक मिश्रा पर फोकस बनाए रखेगा। वे दस तरह की चिंताओं में रहेगें। वे कैसे चीफ जस्टीस कहलाएगें और कार्यकाल तक कैसे रहेगें इसको ले कर दस तरह के कयास बनने है। क्या लगता नहीं कि न्यायिक बिरादरी दो खेमों में बंट गई है? वकीलों के एक वर्ग ने एक जज के यहां सुनवाई कराई तो उससे दूसरे वर्ग और दूसरे जजों को खटका हुआ कि यह तो गड़बड़ है। ताबड़तोड़, हड़बड़ी में क्यों कैसे हुआ यह अटकल ही सुप्रीम कोर्ट याकि न्यायपालिका की साख, विश्वसनीयता को वैसे ही कटघरे में लिवा लाई है जैसे भारत की बाकि संस्थाएं इन दिनों आ गई है। चौतरफा एक सी दशा, एक सा माहौल है। 

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