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सुप्रीम कोर्ट को देनी पड़ी सफाई!

देश की सर्वोच्च अदालत ने सफाई दी। उत्तर प्रदेश के सपा नेता आजम खां के एक बयान से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच में शामिल जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह कहना गलत होगा कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार समर्थक जज बैठे हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह बात चीफ जस्टिस की मौजूदगी में कही। यह भी जाने कि उस समय सुप्रीम कोर्ट की एक नंबर अदालत में फली एस नरीमन, हरीश साल्वे जैसे बड़े वकील मौजूद थे। 

सवाल है कि इस सफाई की जरूरत क्यों पड़ी? क्यों जस्टिस चंद्रचूड़ को कहना पड़ा कि अदालत पर ऐसी टिप्पणी करने वाले एक दिन के लिए आकर कोर्ट में बैठें तो पता चलेगा कि हर दिन कैसे अदालत में सरकार की धुलाई होती है? इस सफाई का मतलब है कि किसी न किसी स्तर पर न्यायपालिका में सरकार के दखल को लेकर चिंता है। धारणा बनी है कि सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने मैनेज किया हुआ है। चाहे वह कर्नाटक हाई कोर्ट के जज जस्टिस जयंत पटेल के तबादले का हालिया मामला हो या नोटबंदी, काले धन आदि पर अदालत का रुख हो, जंतर मंतर पर धरना बंद कराने का एनजीटी का हालिया फैसला हो, ऐसे कई मौके आए हैं, जब जनता ने सोचा अदालत स्टैंड लेगी पर सरकार की मंशा माफिक स्टैंड हुए तो शक, सवाल गहरे बने हैं। ध्यान रहे मेमोरेंडम ऑफ प्रोसेस, एमओपी तैयार करने के नाम जजों की नियुक्ति, प्रमोशन और तबादले के सवाल पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में खींचतान है। कई बार कॉलेजियम की सिफारिशें सरकार ने खारिज की है, जिससे टकराव की नौबत आई। 

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में सरकार समर्थक जजों के होने का दावा वरिष्ठ वकील और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष दुष्यंत दवे ने की थी। उन्होंने कर्नाटक हाई कोर्ट के जज जस्टिस जयंत पटेल का तबादला इलाहाबाद हाई कोर्ट में करने के फैसले पर यह टिप्पणी की। जस्टिस पटेल कर्नाटक हाई कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ जज थे और वे चीफ जस्टिस बनने वाले थे। इलाहाबाद में वे वरिष्ठता क्रम में तीसरे स्थान पर आते और इसलिए चीफ जस्टिस नहीं बन सकते थे। तभी तबादले के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

ध्यान रहे जस्टिस पटेल का यह दूसरा तबादला था। पिछले ही साल उनको गुजरात हाई कोर्ट से कर्नाटक भेजा गया था। फिर दस महीने के बचे हुए कार्यकाल के लिए उनको इलाहाबाद भेजा जा रहा था। दुष्यंत दवे ने इसका विरोध करते हुए कहा कि जस्टिस पटेल ने गुजरात हाई कोर्ट में जज रहते इशरत जहां इनकाउंटर की सीबीआई जांच की सिफारिश की थी, जिसके बाद कई पुलिस अधिकारियों पर मुकदमा हुआ था और राज्य सरकार को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी। दवे का कहना है कि इसी वजह से जस्टिस पटेल को परेशान किया गया। उनके कहे का मतलब है कि सरकार समर्थक जजों ने जस्टिस पटेल को कर्नाटक हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनने से रोकने के लिए उनका तबादला किया। दूसरी ओर यह कहा जा रहा है कि कॉलेजियम ने आम सहमति से जस्टिस पटेल का तबादला किया। सवाल है कि उनका कार्यकाल सिर्फ दस महीने का बचा हुआ है उतने समय के लिए उनके तबादले के पीछे क्या कारण थे? 

ऐसे मसले  न्यायपालिका की साख पर सवाल खड़े किए है। पिछले दो मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर जैसी खबरें सोशल मीडिया में चर्चा में रही हैं, वह भी चिंता की बात है। अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिवगंत कलिखो पुल की चिट्ठी में न्यायपालिका को लेकर जो बातें कही गई हैं उनकी जांच नहीं कराने या उनका संज्ञान नहीं लेने से भी न्यायपालिका की साख पर सवाल उठे हैं। तभी यह सवाल भी उठ रहा है कि कहीं ऐसी चर्चाओं और खबरों से सरकार को न्यायपालिका पर दबाव बनाने का मौका तो नहीं मिल रहा है? अच्छा है कि अब सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम के फैसलों को वेबसाइट पर डालने का फैसला किया है। अगर पूरी कार्यवाही का ब्योरा वेबसाइट पर डाला जाए तो पारदर्शिता सुनिश्चित हो सकती है। 

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