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आज चुनाव तो भाजपा 150!

छह महीनेे पहले 194 जबकि आज अपना अनुमान कि अभी लोकसभा चुनाव हो तो भाजपा 150 सीट पाएगी! यह गुजरात विधानसभा चुनाव नतीजों और कैराना के उपचुनाव नतीजे के बाद बना फर्क है। ऐसा कैसे?  तीन कारणों से। एक, विपक्ष सचमुच एलायंस बनाने का संकल्प ले बैठा है। दूसरे, हिंदू और खासकर उत्तरप्रदेश का ब्राह्यण, पिछड़ी किसान जातियों में योगी आदित्यनाथ को ले कर खुन्नस स्थाई हो गई है। तीसरा, नरेंद्र मोदी और उनका प्रचार भाजपा के लिए अब लायबिलिटी है न कि पूंजी! 

इसका सीधा-सपाट अर्थ है कि पिछले छह महीने में नरेंद्र मोदी-अमित शाह एक भी ऐसा पोजिटिव मंत्र जनता के बीच नहीं छोड़ पाए जिससे हवा का रूख बदल सका। कर्नाटक और उपचुनावों से मोदी-शाह के लिए मौका था मगर इस मौके में भाषण, प्रचार ऐसा उलटा हुआ जिससे विपक्ष की राजनीति खिली न कि लोगों में नरेंद्र मोदी को ले कर यह विचार आया या कैराना के जाट-जाटव-ब्राह्यण में यह धारणा बनी कि जिन्ना की चिंता करके नरेंद्र मोदी को वोट दो और योगी व गन्ने पर सोचना बंद रखो।

24 दिसंबर 2017 की टेबल में दो अनुमान थे। पहला यह कि यदि यूपी आदि में भाजपा विरोधियों का एलायंस नहीं बना तो भाजपा-एनडीए 231 व कांग्रेस-यूपीए 247 व अन्य 65 सीटे पा सकते हैं। यदि यूपी, महाराष्ट्र और झारखंड में विपक्ष ने एलायंस में चुनाव लड़ा तो भाजपा-एनडीए 194 सीटों पर व कांग्रेस-यूपीए 293 सीट वहीं अन्य 56 पर रहेंगे।   

छह महीने बाद आज अपना साफ मानना है कि यूपी, झारखंड, महाराष्ट्र के साथ कर्नाटक में एलायंस होगा तो महाराष्ट्र में शिवसेना का पहला मकसद अब भाजपा को जैसे भी हो हरवाने का है। ममता बनर्जी, कांग्रेस और लेफ्ट भी इस दबाव में आ गए हैं कि वे बंगाल और केरल में अपने घोर परस्पर विरोधी के साथ एलायंस बनाएंगे। मतलब बंगाल में तृणमूल, लेफ्ट, कांग्रेस या केरल में लेफ्ट व कांग्रेस समझ बना कर चुनाव लड़ सकते हंै। सोचंे, यह कितनी अकल्पनीय बात है! मगर पिछले छह महीनों में इसकी स्थितियां बनी हंै। पूरे विपक्ष में जैसे भी हो मोदी-शाह को हराने की अघोषित केमेस्ट्री बनी है और यह केमेस्ट्री आने वाले महीनों में बढ़ेगी न कि घटेगी। 

सो 24 दिसंबर 2017 को अपने इस कालम के मुख्य आईटम की हैडिंग थी-2019 में तो भाजपा को लाले! आज उस हैडिंग से बहुत आगे निर्णायात्मकता वाली हकीकत है। यदि आज चुनाव हो तो प्रमाणित होगा कि नरेंद्र मोदी हवा में आए थे और बिना हवा के ही टूट कर कहां जाएंगे इसका पता भी नहीं पड़ेगा। 

यों हवा आज भी कथित तौर पर नरेंद्र मोदी की बनी हुई है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह आज भी उसी हवा में उड़ रहे हंै जैसे गुजरात के चुनाव से पहले या बाद में उड़ रहे थे। और यह जान लिया जाए, मान कर चलंे कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह किसी सूरत में हार नहीं मानने वाले हंै। मोदी वापिस मई 2019 में शपथ लेंगे वाली जिद्द में अकल्पनीय कुछ भी आगे कर सकते हैं, हां, यह मेरा तब भी मानना था और आज भी मानना है। 

मगर वह अपनी जगह जबकि आज का वक्त, उसकी हकीकत भाजपा को यदि 150 के आकंड़े में समेटने वाली है तो वह अपनी जगह। 

तय माने और मैं फिर वापिस दिसंबर की इस लाइन को दोहरा रहा हूं कि – ‘किसी भी एंगल से सोचंे मतलब प्रदेशवार मूड, एंटी इनकंबेसी, मोदी के ग्राफ, लोगों की मनोदशा की कोई भी कसौटी अपनाए 2019 का लोकसभा चुनाव 2014 जैसा कतई नहीं होगा। अगले सवा साल लोगों की मनोदशा और बिगड़नी है।‘

दिसंबर में लिखी यह लाइन छह महीने बाद जून की दो तारीख में भी जस की तस प्रासंगिक है। और सोचिएगा छह महीने बाद, विधानसभा चुनाव के बाद दुबारा इस लाइन पर!

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