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नगरनिगम पर झूमना

क्या‍ कभी पहले हुआ कि यूपी के नगरनिगम चुनाव भाजपा ने जीते और अटलबिहारी वाजपेयी ने टीवी चैनलों पर देश को मैसेज दिया  कि वाह उनके काम पर एक और जनादेश! सो एक दिशंबर को राष्ट्रीय चैनलों पर यूपी के चुनावों की जीत का जश्न कुल मिला कर प्रमाण है अब हर बात प्रोपेगेंडा के लिए है। यूपी के नगर निगम चुनावों में भाजपा पहले भी जीतती रही है। शहरों में भाजपा की पकड पुरानी है। 2012 के चुनाव में 12 में से दस मेयर भाजपा के थे। इस दफा चार नए नगर निगम बने तो 16 में से 14 भाजपा के मेयर बने!

फिर यूपी में फरवरी में ही भाजपा की आंधी थी। जब मायावती या अखिलेश के राज में भी महानगरों में भाजपा जीतती रही है तो भाजपा की अपनी सरकार के वक्त तो लोकल राजनीति अपने काम अपनी सरकार में करवाने के लालच में यों भी दमदार होती है। लोकल पार्षद, पंच सत्तापक्ष के फायदे से चुने जाते है। 

सो भाजपा को जीतना ही था। अपना मानना है इसे समझते हुए भी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गुजरात चुनाव से पहले योगी सरकार को निकाय चुनावों के लिए कहां होगा। नरेंद्र मोदी-अमित शाह की यह नंबर एक खूबी है कि वे हर चुनाव की योजना, उसके रोडमैप में दस तरह के तत्व जोड़ते है। जापान के प्रधानमंत्री से बुलैट ट्रैन की नींव रखवाने से ले कर यूपी के निकाय चुनाव सब प्लानिंग का हिस्सा है। 

सवाल है एक प्रदेश के लोकल चुनावों का राष्ट्रीय टीवी चैनलों और मीडिया में जो हल्ला हुआ क्या वह तुक वाला है? किस कदर चैनलों पर हल्ला हुआ?  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद इस बहाने गुजराती में मैसेज रिकार्ड करवा उसे गुजराती चैनलों पर जैसे प्रचारित करवाया वह इस बात का प्रमाण है कि चुनाव मतलब जीना-मरना है। राजनीति और चुनाव को किसी भी तरह सहज, सामान्य, रूटिन का नहीं रहने दिया जा रहा है। सबकुछ चुनाव और उससे फिर वाह में, प्रोपेगेंडा में सिमटता जा रहा है!

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