गठबंधन के नए प्रयोगों का वर्ष

भारतीय राजनीति में बेमेल गठबंधन पहले भी होते रहे हैं। राजनीति संभावनाओं का खेल होती है और इसमें कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है, नेताओं ने इसे साबित किया है। बिहार में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का गठबंधन इसी तरह की राजनीति की मिसाल बनी थी। पर इस साल इससे भी ज्यादा चौंकाने वाले गठबंधन हुए हैं। उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र तक इसकी मिसाल देखने को मिली है और अगर राजनीति इसी तरह आगे बढ़ती रही तो अगले साल और भी हैरान करने वाले गठबंधन देखने को मिल सकते हैं। जैसे तीन साल पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट मिल कर लड़े थे। हो सकता है कि आगे इसमें कुछ और प्रयोग हो जाएं।

बहरहाल, इस साल की शुरुआत एक सबसे बेमेल गठबंधन के साथ हुई थी। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने तालमेल किया था। करीब ढाई दशक पुराने गेस्ट हाउस कांड के बाद किसी ने सोचा नहीं था कि सपा और बसपा साथ आएंगे। पर दोनों साथ आए। साथ मिल कर चुनाव लड़े। मंच साझा किया और पुराने तमाम गिले शिकवे भूला दिए। मुलायम सिंह की बहू ने सार्वजनिक रूप से मंच पर मायावती के पांव छुए। यह अलग बात है कि लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन बिखर गया और दोनों पार्टियां अलग हो गईं। पर यह अलगाव फिर से साथ आने के लिए भी है। दोनों के प्रति सद्भाव अब भी है और पहले जैसी कड़वाहट नहीं है। यह उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे अहम घटनाक्रम है।

इससे भी बेमेल गठबंधन महाराष्ट्र में हुआ। जहां शिव सेना ने चुनाव लड़ा भाजपा के साथ और चुनाव के बाद एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिल कर सरकार बना ली। राजनीतिक इतिहास की जानकारी रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह स्वीकार करना मुश्किल था कि कांग्रेस कभी शिव सेना के साथ तालमेल कर सकती है। अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस ने अपनी धर्मनिरपेक्ष राजनीति की ब्रांडिंग को कमजोर करके शिव सेना के साथ तालमेल किया। कांग्रेस ने शिव सेना के कट्टर हिंदुत्व के मुद्दों पर अपने को पीछे किया तो शिव सेना ने फैसला किया कि वह कांग्रेस को असहज करने वाले मुद्दे नहीं उठाएगी। इस तरह पिछले एक महीने से महाराष्ट्र में शिव सेना, कांग्रेस और एनसीपी की सरकार चल रही है।

इन दो प्रयोगों ने देश की राजनीति में किसी तरह के गठबंधन को संभव बना दिया है। पिछले दिनों नागरिकता कानून के विरोध के सवाल पर केरल में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां साथ आईं। यह भी अपने आप में अनोखा प्रयोग था।बंगाल में जब दोनों पार्टियां साथ थीं, तब भी केरल में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ लड़े थे। पर देश में हो रहे नए प्रयोगों से वहां भी प्रयोग का रास्ता खुला है। जिस तरह से इस साल प्रादेशिक क्षत्रपों के लिए मुश्किलें पैदा हुई हैं उससे ऐसा लग रहा है कि आने वाले सालों में नए राजनीतिक प्रयोग होंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares