AAP party in Punjab पंजाब में दिल्ली दोहरायेगी आप?
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पंजाब में दिल्ली दोहरायेगी आप?

AAP party in Punjab

आम आदमी पार्टी को दिल्ली में 2015 में मिली ज़बरदस्त जीत और पंजाब में आज के हालात में कई समानताएँ नज़र आती हैं। आम आदमी पार्टी का मुक़ाबला करने के लिए इस बार कैप्टन के नेतृत्व में संगठित दिखने वाली कांग्रेस नहीं होगी, बल्कि सिद्धू, चन्नी, बाजवा और जाखड के बीच बंटी कांग्रेस होगी। जबकि दूसरी तरफ़ आम आदमी पार्टी में फ़िलहाल लीडरशिप को लेकर कोई विवाद नहीं है। AAP party in Punjab

पंजाब चुनाव में अब क़रीब एक महीने का वक़्त बचा है। राजनैतिक दल अपने अपने तरीक़े से रणनीति बनाने, प्रचार करने और वोटरों को रिझाने में लगे हैं। लेकिन ज़्यादातर लोगों और राजनैतिक दलों में एक चर्चा ये चल रही है कि कहीं आम आदमी पार्टी पंजाब में दिल्ली जैसा प्रदर्शन तो नहीं दोहरा देगी? परिस्थिति और तथ्यों के आधार पर आँकलन करें तो इस बात की ठोस संभावना नज़र आती है। दरअसल दिल्ली विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए राजनैतिक प्रयोगशाला रहे हैं जहां से पार्टी जीत का फ़ार्मूला सीखी और उस फ़ार्मूले को लगातार दूसरी बार दिल्ली में दोहरा कर टेस्ट भी कर लिया। देखना ये है कि क्या आम आदमी पार्टी के लिए दिल्ली जैसी परिस्थितियाँ और तैयारी पंजाब में भी है

पंजाब में 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को लेकर मालवा इलाक़े में ज़बरदस्त क्रेज़ था लेकिन वो उस हद तक वोट में नहीं बदल पाया। साथ ही बाक़ी दो इलाक़ों दोआबा और माझा में पार्टी काफ़ी कमज़ोर थी। इस बार तमाम सर्वे ये इशारा कर रहे हैं कि आम आदमी पार्टी ने पंजाब के तीनों इलाक़ों में अपनी पैठ बना ली है। भगवंत मान मालवा इलाक़े से आते हैं और फिलहाल आम आदमी पार्टी पंजाब में उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। पंजाब के धुरंधर पुलिस अधिकारी रहे कुंवर विजय प्रताप सिंह माझा में आम आदमी पार्टी का परचम लहराने का दावा कर रहे हैं। 2015 के बेअदबी के मामले की जाँच टीम के मुखिया रहे कुंवर विजय प्रताप तब सुर्खियों में आये जब उन्होंने इस मामले में अपनी रिपोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री और दिग्गज अकाली नेता प्रकाश सिंह बादल की संदिग्ध भूमिका पर सवाल उठाए। सिंह की छवि एक दमदार पुलिस अधिकारी की रही है और वो लोगों में काफ़ी लोकप्रिय हैं।

आम आदमी पार्टी को दिल्ली में 2015 में मिली ज़बरदस्त जीत और पंजाब में आज के हालात में कई समानताएँ नज़र आती हैं। मसलन उस वक़्त दिल्ली में मुख्य मुक़ाबला बीजेपी से था और बीजेपी में सीएम उम्मीदवार को लेकर अंदरुनी टकराव थे। आज पंजाब में आम आदमी पार्टी का मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस से है और कैप्टन अमरिंदर सिंह के पार्टी छोड़ने के बाद जिस तरह से चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया उसे लेकर सिद्धू की नाराज़गी किसी से छुपी नहीं है।

AAP Party CM Punjab

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ऐसे में आम आदमी पार्टी का मुक़ाबला करने के लिए इस बार कैप्टन के नेतृत्व में संगठित दिखने वाली कांग्रेस नहीं होगी, बल्कि सिद्धू, चन्नी, बाजवा और जाखड के बीच बंटी कांग्रेस होगी। जबकि दूसरी तरफ़ आम आदमी पार्टी में फ़िलहाल लीडरशिप को लेकर कोई विवाद नहीं है। दिल्ली के चुनाव और पंजाब के विधानसभा चुनावों में एक और समानता नज़र आती है। दिल्ली में भी पहले विधानसभा चुनाव में पूरा माहौल होने के बावजूद आम आदमी पार्टी की 28 सीटें ही आयी थी और उसे अपने दम पर बहुमत नहीं मिला था, लेकिन उसके बाद जब दोबारा चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी ने 70 में से 67 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। पंजाब में भी दिल्ली की तरह ही पहली बार में पूरा माहौल होने के बावजूद आम आदमी पार्टी को 20 सीटें ही मिली थी। लेकिन इस बार आम आदमी पार्टी दूसरी बार चुनाव मैदान में है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ चले बड़े आंदोलन का फ़ायदा मिला था। आंदोलन से जुड़े लोगों की आम आदमी पार्टी के प्रति सहानुभूति थी। पंजाब में इस बार एक अभूतपूर्व किसान आंदोलन के बाद चुनाव होने जा रहे हैं। दिल्ली में किसान आंदोलन को केजरीवाल सरकार ने जिस तरह खुलकर समर्थन दिया और दिल्ली के स्टेडियमों को जेल बनाने की इजाज़त नहीं दी, उसे लेकर किसानों में आम आदमी पार्टी के लिए वैसी ही सहानुभूति है। कुछ लोगों का मानना है कि किसान नेताओं के अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने से आम आदमी पार्टी को नुक़सान होगा। लेकिन दिल्ली के उदाहरण से देखें तो आंदोलन से निकली किरण बेदी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाकर भी बीजेपी आंदोलन समर्थक वोट आम आदमी पार्टी को मिलने से नहीं रोक पायी थी।

चुनाव तैयारियों और प्रचार पर नज़र डालें तो भी आम आदमी पार्टी दिल्ली जैसी ही मज़बूत स्थिति में नज़र आती है। दिल्ली में भी चुनाव के मुद्दे और एजेंडा आम आदमी पार्टी ही तय करती थी, पंजाब में भी अभी तक वही नज़र आ रहा है। केजरीवाल कहते हैं महिलाओं को एक हज़ार महीना देंगे तो सिद्दू पहले आम आदमी पार्टी के उस वादे का मज़ाक़ उड़ाते हैं और फिर ख़ुद 2 हज़ार रुपये महीना देने की घोषणा करते हैं। केजरीवाल ने बिजली बिल माफ़ करने की बात कही तो चन्नी ने भी आनन फ़ानन में बिजली के दाम कम करने की घोषणा कर दी। आम आदमी पार्टी ने रेत माफ़िया का मुद्दा उठाया हो या स्कूलों का, पंजाब चुनाव में सब पार्टियाँ उन्हीं मुद्दों पर बात करने लगती हैं। दिल्ली में टिकटों का बँटवारा हो या मेनिफेस्टो के वादे आम आदमी पार्टी भरोसे के साथ सबसे पहले फ़ैसले लेती रही।

पंजाब में भी आम आदमी पार्टी लगभग सभी सीटों पर उम्मीदवारों का एलान कर चुकी है जबकि कांग्रेस ने अभी तक एक भी उम्मीदवार का एलान नहीं किया है। कांग्रेस ने बेशक कैप्टन को हटाकर एंटी इनकम्बेंसी कम करने की कोशिश की हो लेकिन सारे चुनावी सर्वे फ़िलहाल आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी दिखा रहे हैं। बीजेपी के पुराने साथी रहे अकाली दल के नेताओं ने ये खुलासा किया कि पिछली बार किस तरह आरएसएस और बीजेपी ने कैप्टन की मदद करने के लिए अपने समर्थकों के वोट ट्रांसफ़र करवा कर एन मौक़े पर खेल पलट दिया था।

किसान आंदोलन के चलते इस बार ये हालत हो चुकी है कि बीजेपी या आरएसएस के पास वोट ट्रांसफ़र कराने को पंजाब में समर्थक ही नहीं बचे हैं। यानि वोट ट्रांसफ़र से कोई बड़ा उलटफेर हो ऐसी स्थिति भी नज़र नहीं आती है। और ये भी ध्यान रहे कि विरोधी दलों के स्थानीय चेहरों के मुक़ाबले ये सब बढ़त और माहौल फ़िलहाल सिर्फ़ केजरीवाल और मुद्दों के आधार पर है इसमें मुख्यमंत्री के चेहरे के एलान का तड़का अभी बाक़ी है।

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