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एडवांस तकनीक है एचडी-लेसिक 2.0

Advance technology HD LASIK

लेसिक से चश्में या कॉन्टेक्ट लेंस के बिना नजर सामान्य की जाती है। इसके लिये कार्निया के सामने दृष्टि बाधित करने वाले टिश्यू लेजर से रिशेप या रिमूव करते हैं। स्वस्थ आंखों में कार्निया, आंख के पिछले हिस्से में रेटिना पर प्रकाश को ठीक से मोड़ता (रिफ्रेक्ट) है लेकिन निकट दृष्टि दोष (मायोपिया), दूर दृष्टि दोष (हाइपरोपिया) या दृष्टिवैषम्य (अस्टिग्मेटिज्म) की स्थिति में प्रकाश गलत कोण पर मुड़ने से दृष्टि धुंधला जाती है। Advance technology HD LASIK

हाई-डेफनीशन लेज़र-असिस्टेड इन सीटू केराटोमाइल्यूसिस 2.0 दृष्टि दोष दूर करने वाली सबसे एडवांस तकनीक है, इसमें नेत्र सर्जरी की सटीकता अभी तक इस्तेमाल की जा रही कंटूरा विजन और स्माइल तकनीक से कई सौ गुना ज्यादा है। आईडिजाइन 2.0 वेवफ्रंट की वजह से कार्नियल एबरेशन (विपथन) और आंख के सम्पूर्ण इंटरनल एबरेशन को सटीकता से मापने वाली एडवांस रिफरेक्टिव तकनीक है जो मापे गये समस्त एबरेशन ठीक भी करती है।  दिल्ली-एनसीआर में इस तकनीक से पहली सफल नेत्र सर्जरी पूर्वी-दिल्ली स्थित श्रेया आई सेन्टर में दिल्ली के जाने-माने आई सर्जन डॉ. राकेश गुप्ता (निदेशक श्रेया आई सेन्टर) के निर्देशन में की गयी। इस तकनीक के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि-

यह अभी तक चलन में रही कंटूरा विजन और स्माइल तकनीक से बहुत एडवांस है, क्योंकि कंटूरा विजन केवल कॉर्नियल एबरेशन की गणना करती है, न कि आंख के आंतरिक एबरेशन की। यह उन दृष्टि-दोषों को भी सुधार सकती है जिन्हें चश्में या कॉन्टेक्ट लेंस से सुधारना मुश्किल होता है। यदि इसकी तुलना स्माइल तकनीक से करें तो यह ज्यादा बेहतर है क्योंकि स्माइल तकनीक में वेवफ्रंट आधारित डेटा इस्तेमाल करने की सुविधा नहीं होती। इसमें प्रयुक्त आई-डिजाइन 2.0 स्टूडियो, कॉर्नियल और वेवफ्रंट से आंख के इंटरनल एबरेशन की गणना करके डेटा को एक्सीमर लेजर मशीन में ट्रांसफर करता है। नेत्र सर्जन कॉर्निया की फ्रंट सरफेस पर केराटोम या फेम्टो लेजर से फ्लैप बनाकर, फ्लैप के नीचे आने वाले इंटरनल कॉर्नियल टिश्यू वेपोराइज करने के लिये मशीन प्रोग्राम करते हैं, लेजर ऑन करने के बाद जब फ्लैप उठाते हैं तो स्लेक्ट किये टिश्यूज रिमूव हो जाते हैं और पूरी प्रक्रिया 5 से सात मिनट पूरी।

किन द़ृष्टि दोषों में कारगर?

लेसिक से चश्में या कॉन्टेक्ट लेंस के बिना नजर सामान्य की जाती है। इसके लिये कार्निया के सामने दृष्टि बाधित करने वाले टिश्यू लेजर से रिशेप या रिमूव करते हैं। स्वस्थ आंखों में कार्निया, आंख के पिछले हिस्से में रेटिना पर प्रकाश को ठीक से मोड़ता (रिफ्रेक्ट) है लेकिन निकट दृष्टि दोष (मायोपिया), दूर दृष्टि दोष (हाइपरोपिया) या दृष्टिवैषम्य (अस्टिग्मेटिज्म) की स्थिति में प्रकाश गलत कोण पर मुड़ने से दृष्टि धुंधला जाती है।

मायोपिया: आईबॉल (नेत्रगोलक) के सामान्य से लंबे या कॉर्निया के ज्यादा शार्प कर्व होने से प्रकाश किरणें रेटिना के सामने केंद्रित हो जाती हैं जिससे दूर की दृष्टि धुंधलाती है और करीब के ऑब्जेक्ट स्पष्ट दिखाई देते हैं। इससे आंखों पर जोर और कुछ लोगों को सिरदर्द होता है।

हाइपरोपिया: आईबॉल का औसत से छोटा या कॉर्निया सपाट होने से प्रकाश के इस पर फोकस होने के बजाय रेटिना के पीछे केंद्रित होने के कारण पास के ऑब्जेक्ट धुंधले और दूर के साफ दिखाई देते हैं।

एस्टिग्मेटिज्म: कॉर्निया के असमान रूप से सिकुड़ने (घटने) या चपटे होने का परिणाम है दृष्टिवैषम्य, इससे निकट और दूर दोनो तरह की दृष्टि का फोकस बाधित होता है।

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पतला कॉर्निया: आज ट्रांस-पीआरके प्रोसीजर से इसकी सर्जरी सम्भव है। इसमें कॉर्नियल फ्लैप नहीं बनाते बल्कि लेजर को सीधे 2 चरणों में कॉर्नियल सरफेस पर लगाते हैं। पहले चरण में इपीथीलियम रिमूवल और दूसरे में स्ट्रोमल एब्लेशन करते हैं। प्रोसीजर के बाद इपीथीलियम ठीक करने हेतु 3 दिनों के लिए संपर्क लेंस लगाते हैं। यह सुरक्षित प्रक्रिया है, इसमें रोगी को कुछ दिनों तक दर्द, आंख में पानी, जलन और धुंधलाहट अनुभव हो सकती है। प्रोसीजर के 8-10 दिन बाद अच्छी दृष्टि आ जाती है।

लेसिक सर्जरी की तैयारी

लेसिक के दीर्घकालिक परिणाम उन लोगों में ज्यादा सफल रहते हैं जिनकी सर्जरी से पहले अच्छी जांच की गयी हो कि वे लेसिक सर्जरी के लिये फिट हैं या नहीं।

कॉन्टेक्ट लेंस कॉर्निया का आकार बदल सकते हैं, इसलिये यदि कॉन्टेक्ट लेंस लगाते हैं तो सर्जरी से कुछ सप्ताह पहले इनका इस्तेमाल पूरी तरह बंद करके चश्मा पहनें।

सर्जरी से पहले नेत्र चिकित्सक को मेडिकल हिस्ट्री बतायें। यदि ब्लड थिनर या इम्यूनोसप्रेसेंट ले रहे हैं तो डॉक्टर को इनके बारे में बताना अनिवार्य है।

लेसिक सर्जरी से अपेक्षित परिणाम प्राप्त हो इसके लिये नेत्र चिकित्सक सर्जरी से पहले आंखों में संक्रमण, सूजन, सूखापन, प्रेशर और पुतलियों की जांच करते हैं। इस जांच में कार्निया के आकार, मोटाई और कॉन्टूर को मापकर मूल्यांकन करते हैं कि कॉर्निया के किस हिस्से को रिशेप करने की जरूरत है और फिर इसी के मुताबिक टिश्यू रिमूव किये जाते हैं।

लेसिक सर्जरी से पहले आंख का गहन मूल्यांकन करने के लिए वेबफ्रंट-निर्देशित तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस जांच में एक स्कैनर आंख की माप का विस्तृत चार्ट बनाता है। माप जितनी डिटेल में होगी,  नेत्र चिकित्सक उतनी सटीकता से कॉर्नियल टिश्यू हटा पायेगा।

लेसिक को वैकल्पिक सर्जरी माना जाता है इसलिये बीमा कम्पनियां इसे पॉलिसी में कवर नहीं करतीं। सर्जरी से पहले खर्चे इत्यादि के बारे में पहले से पूरी जानकारी लें। नेत्र सर्जरी के लिये अपने साथ किसी को अवश्य ले जायें क्योंकि सर्जरी के पहले और बाद में कुछ ऐसी दवायें आखों में डाली जाती हैं जिससे दृष्टि धुंधला जाती है। सर्जरी से एक दिन पहले आंखों का मेकअप और लोशन इत्यादि लगाना बंद कर दें।

सर्जरी के बाद आंख में खुजली, किरकिरी, जलन, दर्द, आंख में पानी और दृष्टि धुंधला सकती है लेकिन यह कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है। लेसिक के बाद रात में आंख पर आईशील्ड पहनने से हीलिंग में मदद मिलती है।

सर्जरी के तुरन्त बाद मरीज देख तो पाता है लेकिन दृष्टि साफ नहीं होती, आंख ठीक होने और दृष्टि स्थिर होने में एक-दो महीने लगते हैं। दृष्टि में सुधार की संभावना आंशिक रूप से इस बात पर आधारित है कि सर्जरी से पहले दृष्टि कितनी अच्छी थी। आंखों के आसपास सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग ठीक होने के कुछ सप्ताह बाद करें। डॉक्टर की अनुमति पर ही खेलना-कूदना और स्वीमिंग शुरू करें।

इन स्थितियों में लेसिक सर्जरी से बचें

यदि फैमिली हिस्ट्री में आंखों की ऐसी बीमारी है जिसके कारण कॉर्निया पतला या उभरा है, काफी अच्छी समग्र दृष्टि है, गंभीर निकट दृष्टिदोष है, पुतलियां बड़ी और कॉर्निया पतली, ऐसे खेलों में हिस्सा लेते हों जिसमें आंख पर चोट लग सकती है जैसे बॉक्सिंग और स्वीमिंग, उम्र के साथ आंखों में बड़े बदलाव आने पर लेसिक से बचें। ऑटोइम्यून डिसीस जैसे रुमेटीइड ऑर्थराइटिस,  कमजोर इम्युनिटी,  सूखी आंखें, दवाओं- हार्मोनल परिवर्तन-गर्भावस्था-स्तनपान या उम्र के कारण दृष्टि में बदलाव, कॉर्निया में सूजन, लिड डिस्आर्डर, चोट, यूवाइटिस/हर्पीज सिम्प्लेक्स जो आंखों के पास हो, ग्लूकोमा या मोतियाबिंद होने पर भी डॉक्टर लेसिक सर्जरी के लिये मना कर सकते हैं।

लेसिक के साइड इफेक्ट्स

इसके कुछ टेम्प्रेरी साइड इफेक्ट हैं जो समय के साथ ठीक हो जाते हैं इनमें शुष्क आंखे, अस्थायी विजुअल प्रॉब्लम जैसे चकाचौंध (ग्लेयर) बहुत कॉमन है। ये समस्यायें आमतौर पर कुछ हफ्तों या महीनों में ठीक हो जाती हैं और ऐसा बहुत कम होता है कि ये लम्बे समय तक रहें।

सूखी आंखें:  लेसिक से कुछ लोगों में अस्थायी रूप से आंसू बनना कम हो जाता है ऐसा सर्जरी के छह माह बाद तक रह सकता है इससे दृष्टि की गुणवत्ता घटती है आमतौर पर ऐसे में नेत्र चिकित्सक आईड्रॉप लिखते हैं, समस्या गंभीर होने पर आंखों की नमी रोकने के लिये आंसू लाने वाली नसों में विशेष प्लग लगाने पड़ते हैं।

चकाचौंध, प्रभामंडल और दोहरी दृष्टि:  सर्जरी के बाद रात में देखने में कठिनाई हो सकती है, जो आमतौर पर कुछ दिनों या हफ्तों में ठीक हो जाती है ऐसा आंखों की प्रकाश के प्रति संवेदशीलता बढ़ने से होता है,  कुछ लोगों को आंखें चौंधियाने या डबल विजन जैसी समस्यायें भी होती हैं।

अंडरकरेक्शन: लेजर सर्जरी में यदि टिश्यू जरूरत से कम रिमूव हुआ है तो सर्जरी के अच्छे परिणाम नहीं मिलते और दृष्टि उतनी स्पष्ट नहीं होती जितनी होनी चाहिये। जिनकी पास की नजर कमजोर हो उनमें यह समस्या आम है। ऐसे में और अधिक टिश्यू हटाने के लिए एक वर्ष के भीतर फिर से लेसिक सर्जरी की आवश्यकता होती है।

ओवरकरेक्शन: यह भी संभव है कि लेजर, आंख से जरूरत से ज्यादा टिश्यू निकाल दे, यह अंडरकरेक्शन से बड़ी समस्या है और इसे ठीक करना मुश्किल होता है।

दृष्टिवैषम्य (अस्टिग्मटिज़): लेजर से असमान टिश्यू कटने पर दृष्टिवैषम्य हो सकता है ऐसे में  अतिरिक्त सर्जरी, चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस की आवश्यकता होती है।

फ्लैप प्रॉब्लम्स: सर्जरी के दौरान आंख के सामने के फ्लैप को वापस मोड़ने से संक्रमण और ज्यादा आँसू आने जैसी समस्यायें हो सकती हैं। हीलिंग के दौरान सबसे बाहरी कॉर्नियल टिश्यू की परत फ्लैप के नीचे असामान्य रूप से बढ़ सकती है।

रिग्रेसन: इसमें दृष्टि धीरे-धीरे वापस पुरानी स्थिति में बदल जाती है यानी इलाज का कोई असर नहीं होता लेकिन ये बहुत रेयर है।

विजन लॉस: यह भी रेयर है शायद ही कभी, लेसिक से विजन लॉस हुआ हो। हां ऐसा जरूर होता है कि कुछ लोग पहले की तरह स्पष्ट नहीं भी देख पाते।

लेसिक सर्जरी से जुड़े आम सवाल?

क्या एक ही समय में दोनों आँखों का इलाज सम्भव है?

एचडी-लेसिक अत्यंत सुरक्षित प्रक्रिया है और जटिलताएं रेयर। मरीज आमतौर पर एक ही बार में दोनों आंखों का इलाज कराना पसंद करते हैं जिससे जल्द काम पर लौट सकें। यदि रोगी एक बार में एक आंख का इलाज कराने में अधिक सहज महसूस करता है, तो ऐसा किया जा सकता है और इसके लिये अतिरिक्त खर्चा नहीं करना पड़ता।

क्या इससे नंबर पूरी तरह ठीक हो जाता है?

इसमें लेजर, कॉर्निया के दोष पूरी तरह खत्म करके उसे नया आकार देता है। सर्जरी के बाद प्रत्येक व्यक्ति की आंखें अलग-अलग ढंग से हील होती हैं ऐसे में हो सकता है किसी का बहुत कम नंबर रह जाये। आमतौर पर रूटीन काम के लिए चश्मा पहनना जरूरी नहीं होता।

क्या इसके परिणाम स्थायी हैं?

लेसिक से किया गया दृष्टि सुधार स्थायी है और इसका आपके नंबर की प्राकृतिक प्रगति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यही कारण है कि केवल उन्हीं रोगियों में लेसिक करते हैं जिनका नंबर कम से कम एक साल से न बदला हो।

क्या लेसिक को रिपीट किया जा सकता है?

यदि पहली सर्जरी में दृष्टि सुधार के उद्देश्य पूरे नहीं होते तो अतिरिक्त सुधार के लिए एक्सटेन्डेड सर्जरी की जा सकती है। अधिकांश लोगों को एक्सटेन्डेड सर्जरी की आवश्यकता नहीं होती। सुधार की गुंजाइश जितनी अधिक होगी, एक्सटेन्डेड सर्जरी की संभावना उतनी ज्यादा होगी।

क्या लेसिक के बाद पढ़ने के चश्मे की जरूरत होगी?

लेसिक के बाद आप दूर की सभी वस्तुओं को स्पष्ट रूप से देख पाएंगे। चूंकि लेसिक शरीर की सामान्य उम्र बढ़ने की प्रक्रिया नहीं रोकता इसलिए आपको लगभग 40-45 वर्ष की उम्र में पढ़ने के लिए चश्मे की आवश्यकता हो सकती है।

क्या इससे मायोपिया से जुड़ी सभी समस्याओं ठीक हो जाती हैं?

लेसिक केवल आंख की अपवर्तक शक्ति ठीक करता है ताकि चश्मे के बिना छवि को रेटिना पर केंद्रित किया जा सके। मायोपिया की वजह से अनेक जोखिम होते हैं जैसे रेटिना डिटेचमेंट, ग्लूकोमा, मोतियाबिंद इत्यादि, लेसिक इन जोखिमों को दूर नहीं कर सकता।

परिणाम-निष्कर्ष

यदि सर्जरी सफल है तो चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस के बिना बेहतर दृष्टि मिलती है। 10 में से 8 से अधिक लोगों को अपनी अधिकांश गतिविधियों के लिए चश्मे या कॉन्टैक्ट लेंस की जरूरत नहीं पड़ती। लेसिक के परिणाम स्पेसिफिक रिफरेक्टिव इरर और अन्य कारकों पर निर्भर करते हैं। निकट दृष्टि दोष वाले लोगों को रिफरेक्टिव सर्जरी के सबसे बेहतर परिणाम और दृष्टिवैषम्य के साथ दूर-दृष्टि दोष वाले लोगों को अनुमान से कम परिणाम प्राप्त होते हैं। जब सर्जरी के बाद अपेक्षा से कम परिणाम मिलते हैं सुधार के लिए एक्सटेन्डेड सर्जरी की जा सकती है। रेयर मामलों में ही ऐसा होता है कि लेसिक के बाद दृष्टि में सुधार न हो, डॉक्टरों का कहना है कि ऐसा केवल विशेष मेडिकल कंडीशन्स के कारण होता है जैसे हारमोनल असन्तुलन, गर्भावस्था, मोतियाबिंद और सर्जरी के बाद अच्छी तरह हीलिंग न होना। सर्जरी के एक या दो दिन बाद नेत्र चिकित्सक के पास फॉलोअप के लिये जाना होगा, वह आंख ठीक होने की स्पीड और कॉम्प्लीकेशन्स की जांच करता है। सर्जरी के बाद पहले छह महीनों के दौरान कई बार फॉलोअप के लिये जाना पड़ सकता है।

 

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