शिवराज के बाद की भाजपा का मध्यप्रदेश में ‘उदय’…

मध्य प्रदेश की बदलती राजनीति जिसे सिंधिया की प्रेशर पॉलिटिक्स से जोड़ कर देखा जाए तो अपने समर्थकों को शिवराज सरकार में भारी भरकम विभाग दिलाने में सफल रहे.. चाहे फिर तुलसी सिलावट को जल संसाधन गोविंद सिंह राजपूत को राजस्व एवं परिवहन, महेंद्र सिंह सिसोदिया को पंचायत और ग्रामीण विकास प्रद्युम्न सिंह तोमर को ऊर्जा इमरती देवी का महिला एवं बाल विकास विभाग बरकरार रखते हुए डॉक्टर प्रभु राम चौधरी को लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण ही क्यों ना हो यही नहीं राज्यवर्धन सिंह दत्ती गांव को औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन का जिम्मा सौंपा गया .. राज्यवर्धन भले ही सिंधिया कोटे से मंत्री बने हो लेकिन उनकी योग्यता प्रतिभा जो अभी तक छाप छोड़ने में सफल रही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और भाजपा संगठन दोनों की उनसे अपेक्षा ज्यादा रहेगी ..जबकि उनके दूसरे समर्थक इस्तीफा देने वाले विधायकों को राज्यमंत्री का दर्जा देकर सम्मान के साथ एडजस्ट किया गया।

ज्योतिरादित्य के जुझारू तेवर यदि रंग लाए लेकिन समन्वय उन्होंने टूटने नहीं दिया.. लंबी एक्सरसाइज कई दौर के विचार मंथन के बीच कंप्रोमाइज उन्होंने भी किया तो भाजपा ने उन्हें यह भी संदेश दे दिया कि मध्य प्रदेश की राजनीति में भाजपा संगठन को विश्वास में लेकर ही उन्हें आगे बढ़ना होगा.. कुल मिलाकर ज्योतिरादित्य शिवराज की केमिस्ट्री कमजोर साबित नहीं हो पाई ..जो उन्होंने सामूहिक इस्तीफे के साथ ऑपरेशन लोटस के दौरान बनाई थी.. केंद्र का महाराज प्रेम रंग लाया.. सिंधिया ने खुद को मजबूत साबित किया और संकेत दिया कि भविष्य की भाजपा में यदि उनकी दिलचस्पी मध्यप्रदेश में बनी रहेगी.. तो केंद्रीय राजनीति में वह बड़ा किरदार निभाने की सामर्थ रखते.. जिस तरह प्रदेश भाजपा के दिग्गज नेताओं ने सिंधिया को सम्मान के साथ सरकार बनाने का श्रेय दिया ..इससे उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है ..सिंधिया का दबदबा इसलिए और गौर करने लायक है कि सिर्फ शिवराज ही नहीं बल्कि कई दूसरे नेताओं चाहे फिर वह नरेंद्र सिंह ,तोमर प्रहलाद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय के लिए इस कैबिनेट विस्तार में ज्यादा गुंजाइश नजर नहीं आई।

कुल मिलाकर प्रदेश भाजपा के नीति निर्धारक शिवराज से लेकर विष्णु दत्त शर्मा सुहास भगत और दूसरे नेताओं ने केंद्र की मंशा के अनुरूप महाराज को सिर माथे पर बैठाया.. जिस सम्मान की खातिर महाराज ने कांग्रेस को छोड़ दिया भाजपा ने उसका पूरा ध्यान रखा.. यह जानते हुए कि आने वाले समय में विधानसभा के चुनाव बीजेपी से ज्यादा ज्योतिरादित्य के लिए मायने रखते हैं.. दूसरी ओर मुख्यमंत्री की शपथ लेने के बाद लगातार चौतरफा चुनौतियों से जूझ रहे शिवराज ने भी विभाग वितरण के बाद बड़ा सकारात्मक संदेश दिया कि उन्हें या उनकी पसंद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. चौहान का धैर्य और संयम बेकार नहीं किया अपने समर्थक और पसंद के कुछ नेताओं को कैबिनेट में वह शामिल नहीं करा पाए.. लेकिन विभाग वितरण के बाद समर्थकों को कमजोर भी साबित नहीं होने दिया ..चाहे फिर वह नंबर दो सरकार में माने जाने वाले नरोत्तम मिश्रा जिन्हें गृहमंत्री बनाए रखा गया या फिर पूर्व नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव जिन्हें लोक निर्माण विभाग का जिम्मा सौंपा ..तो साथ में कुटीर और ग्राम उद्योग भी दे दिया.. यदि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग सिंधिया समर्थक महेंद्र सिंह सिसोदिया के खाते में गया तो अपने सबसे भरोसेमंद भूपेंद्र सिंह के हवाले नगरीय विकास एवं आवास कर दिया।

विधानसभा के उपचुनाव के बाद नगरी निकाय के चुनाव इस सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी.. सिंधिया यानी ज्योतिरादित्य का भाजपा में दबदबा लेकिन शिवराज ने अपने सिंधिया यानी यशोधरा के पुराने सम्मान को बरकरार रखा.. आदिवासी चेहरा विजय शाह को निराश नहीं होना पड़ा जिन्हें वन विभाग तो प्रोटेम स्पीकर रह चुके जगदीश देवड़ा को वाणिज्य कर वित्त योजना आर्थिक एवं सांख्यिकी की जिम्मेदारी सौंप दी गई.. कमल पटेल को यथावत किसान कल्याण एवं कृषि विकास बिना काट छांट के बरकरार रखा ..बुंदेलखंड के बृजेंद्र प्रताप सिंह को भी खनिज साधन और श्रम जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया गया.. जो नरेंद्र सिंह से लेकर विष्णु दत्त शर्मा की पसंद माने जाते हैं .. गोपाल ,भूपेंद्र ,बृजेंद्र के साथ गोविंद ने उस बुंदेलखंड का पल्ला भारी साबित किया.. जहां प्रद्युम्न के साथ भाजपा नई संभावनाओं पर नजर लगाए हुए.. राजधानी का प्रतिनिधित्व करने वाले विश्वास सारंग नई जिम्मेदारी चिकित्सा शिक्षा के साथ भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास संभालेंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरेंद्र सकलेचा के पुत्र ओमप्रकाश सकलेचा को सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग उनकी पसंद माना जा सकता सौंपा गया.. इंदौर मालवा की राजनीति में संघ की पसंद बन कर उभरी उषा ठाकुर को पर्यटन संस्कृति एवं आध्यात्म तो संघ की अपेक्षाओं पर खरा उतर कर दिखाने की जिम्मेदारी मोहन यादव को सोपी जिन्हें उच्च शिक्षा विभाग का जिम्मा दिया गया.. ऑपरेशन लोटस के फाइटर अरविन्द भदोरिया को सहकारिता एवं लोक सेवा प्रबंधन सौंपकर ग्रामीण क्षेत्रों की राजनीति में पार्टी का एक नया कैडर खड़ा करने की लाइन खोल दी.. अरविन्द की गिनती संगठन के प्रति शत प्रतिशत समर्पित नेताओं में होती है ..शिवराज और ज्योतिरादित्य खेमे से अलग ऑपरेशन लोटस के पहले चरण से जुड़े इंदल सिंह कंसाना को लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपकर बड़ा संदेश दिया गया.. भाजपा जिनका उपयोग उनके प्रभाव वाले क्षेत्र जहां उपचुनाव होना वहाँ अपनी सोशल इंजीनियरिंग को मजबूत करने की मंशा रखती है.. इंदल जो कांग्रेस से भले ही बीजेपी में शामिल हुए.. लेकिन इससे पहले ग्वालियर- चंबल की राजनीति में तीसरा बड़ा फैक्टर निभाने वाली बीएसपी से जुड़े रहे.. कुछ इसी तरह कांग्रेस से पहला इस्तीफा देने वाले हरदीप सिंह डंग को महत्वपूर्ण पर्यावरण विभाग के साथ नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है.. यानी संदेश उन नेताओं के लिए जिनका कांग्रेस से मोहभंग हुआ और भविष्य में हो सकता उनके लिए कि भाजपा जो वादा करती है वह निभाती है।

यहीं पर सवाल खड़ा होता कैबिनेट विस्तार के साथ निगम मंडल में एडजस्ट किए गए मंत्री रह चुके निर्दलीय प्रदीप जयसवाल और सुबह कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल होने वाले प्रथम सिंह लोधी कैबिनेट का दर्जा दे दिया गया.. लेकिन जिन सपा बसपा और निर्दलीय ने राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस से दूरी बनाकर ज्योतिरादित्य और डॉ सुमेर सिंह का समर्थन किया ..आखिर उनके साथ बे इंसाफी क्यों की गई ..सिंधिया फैक्टर के पहले नरोत्तम मिश्रा के इर्द-गिर्द नजर आने वाली संजू बबलू की जोड़ी हो या फिर राम बाई के साथ दूसरे निर्दलीय विधायकों की नाराजगी कहीं भाजपा को भविष्य में महंगी तो नहीं पड़ जाएगी.. यह वह विधायक है जिनकी शर्त ,समझौते और सौदे को लेकर भाजपा में अब कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं है.. लेकिन इनकी पीड़ा किसी से छुपी भी नहीं है ..चाहे फिर वह बसपा विधायक संजू के ग्वालियर चंबल क्षेत्र में बदलती बीजेपी हो या फिर प्रद्युम्न लोधी की धमाकेदार एंट्री के साथ सपा से निष्कासित किए जा चुके बबलू भैया राजेश शुक्ला का बुन्देल खंड.. यहां भाजपा को कमलनाथ कांग्रेस की गलतियों से सीख लेकर समय रहते इन विधायकों के लिए समय रहते कोई सम्मान का रास्ता निकालना ही होगा।

चाहे फिर वह निगम मंडल हो या फिर और दूसरे विकल्प.. फिलहाल उपचुनाव से पहले मुख्यमंत्री शिवराज और उनकी भाजपा मंत्रियों को विभाग वितरण के बाद राहत महसूस कर सकती है.. प्रबंधन के इस दौर में जनसंपर्क विभाग की भूमिका को महत्वपूर्ण और निर्णायक मानते हुए मुख्यमंत्री ने अपने पास रखा है.. तो सामान्य प्रशासन को भी दूसरे को नहीं दिया.. संदेश साफ है आगे भी महाराज की अपेक्षा और मर्जी के मुताबिक बहुत कुछ मैदानी राजनीति में करना बाकी है ..खास तौर से उपचुनाव की जमावट और सियासी बिसात बिछाने के लिए… फिलहाल भाजपा मध्य प्रदेश में जिस मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है ..उसे भविष्य की भाजपा का टर्निंग प्वाइंट माना जा सकता है ..जहां एक नए भाजपा का उदय हो चुका है.. और आने वाले समय में जब विष्णु दत्त शर्मा की बीजेपी संगठन की नई टीम सामने आएगी ..तब तस्वीर और स्पष्ट होगी.. क्या पीढ़ी परिवर्तन के साथ भाजपा आगे बढ़ रही है.. अपना मानना है कि शिवराज के बाद भाजपा कैसी होगी किस नेता का दखल देखने को मिलेगा और किसके लिए साढे 3 साल में क्या संभावनाएं इसे समझा जा सकता है.. शिवराज सरकार ने भले ही 100 दिन का जश्न मना कर अपनी लाइन बड़ी साबित करने की कोशिश की ..लेकिन जिन चुनौतियों से वह अंदर ही अंदर जूझ रही थी.. काफी हद तक मंत्रियों को जिम्मेदारी सौंपी जाने के साथ वह इससे बाहर निकल चुकी …मध्यप्रदेश में यदि महाराज ज्योतिराज सिंधिया का दखल साफ देखा जा सकता है।

तो केंद्रीय नेतृत्व के बढ़ते हस्तक्षेप और नए रोड मैप से इनकार भी नहीं किया जा सकता… तो यह भी सच है कि अपने अनुभवों और धैर्य और संयम के साथ शिवराज ने भाजपा को कमजोर साबित नहीं होने दिया.. विधानसभा के अंतर्गत कमलनाथ सरकार के तख्तापलट के बाद इस सरकार में शिवराज ने अपने नेतृत्व को एक बार फिर अपेक्षाओं पर खरा उतर कर दिखाया .. देर से ही सही संदेश शिवराज ने दे दिया समझौते की सरकार में जरूरी समन्वय सामंजस्य और संवाद कर अपनी उपयोगिता बरकरार रखी .. सरकार बनने के साथ प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा संगठन महामंत्री सुहास भगत के और नजदीक नजर आए ..तो इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है की संगठन के साथ सरकार को मजबूत करने के लिए जरूरी फैसले अब वीडी की भाजपा लेने लगी है ।

बदलती बीजेपी के इस निर्णायक दौर में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती की प्रदेश की राजनीति में दिलचस्पी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है… जो प्रद्युम्न लोधी एपिसोड के साथ अब लगातार कांग्रेस को चुनौती दे रही हैं ..आने वाले समय में यदि कांग्रेस से कुछ और उसके विधायकों का मोह भंग होता है.. तो बयान बताते हैं कि इस स्क्रिप्ट को उमा भारती और विष्णु दत्त ही आगे बढ़ाएंगे ..भाजपा के लिए यदि चुनौती अपने कार्यकर्ताओं के साथ मंत्री नहीं बन पाए नेताओं को भरोसे में लेने की अभी खत्म नहीं हुई है तो अच्छी बात यह है कि दिग्गज नेताओं के बीच झगड़े झंझट उनकी महत्वाकांक्षा अब बाहर नहीं आ रही है ..वह भी तब जब उपचुनाव सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाले ऐसे में भले ही फ्री हैंड शिवराज को नहीं मिला लेकिन मुख्यमंत्री रहते सभी को साथ लेकर चलने की सामर्थ साबित कर दिखाइए।

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