New liquor policy Delhi शराब बनाम शिक्षा व स्वास्थ्य
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शराब बनाम शिक्षा व स्वास्थ्य

New liquor policy Delhi

सरकार की नई शराब नीति 17 नवंबर से लागू हुई है और उसी दिन से सारी दिल्ली में विपक्ष के धरने प्रदर्शन चल रहे है। भाजपा व कांग्रेस के इन प्रर्दशनों को राजनीतिक भी मान लिया जाए तो पर आप पार्टी के बहुत से कार्यकर्ता व नेता भी इसके खिलाफ हैं कि उनके रोजमर्रा की खरीददारी वाले बाजार में एक दुकान शराब की भी हो। New liquor policy Delhi

जुलाई 2018 में पूर्वी दिल्ली की मंडावली बस्ती में एक साथ हुई तीन बच्चियों की मौत को ज्यादातर दिल्लीवासी भूल चुके होंगे पर संभवतया उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को वह अच्छी तरह याद होगी। कारण, इस हादसे के बाद मंडावली में चल रहे शराब के अवैध ठेके को बंद किया जाए या नहीं इस पर वहां के लोगों की राय जानने के लिए जब वे वहां गए तो अचानक नारे बाजी होने लगी और लोगों ने चर्चा को राशन कार्ड व आधार कार्ड जैसी सुविधाओं की ओर मोड़ दिया। यह तब हुआ जब अधिकतर लोग ठेके को बंद कर देने के पक्ष में अपनी राय दे रहे थे। नारेबाजी करने वालों को चुप कराने की कोशिशें बेकार हुईं। असामाजिक तत्वों को अनियंत्रित होते देख सिसोदिया वहां से चुपचाप खिसक लिए। जाहिर है उन्हें समझ आ गया होगा कि ये तत्व ठेकेदार के पाले पोसे भाड़े के टट्टू है। इसके बाद इस साल जुलाई में जब वे शराब नीति घोषित कर रहे थे तो उनसे उम्मीद थी कि वे इस बात का ख्याल रखेगे कि अवैध शराब की बिक्री पर रोक लगे और लोगों को यह इतनी सरलता से उपलब्ध न हो कि व्यक्ति बाल ब़च्चों को भूल अपनी सारी कमाई को ही दारू में उड़ा धुत्त पड़ा रहे।

पर ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने तो वैध शराब को भी अवैध जितना ही सरल-उपलब्ध बना दिया। अभी तक गांवों व अनाधिकृत बस्तियों में ही महिलाएं व बच्चे इसलिए कुपोषित, गरीब व रोगी थे कि एक बड़ा पुरुष वर्ग अपनी सारी कमाई शराब पर खर्च कर देता था। पर अब मध्यम वर्ग भी इसकी चपेट में आ जाएगा। जिसका सीधा प्रभाव सरकार के फ्लैगशिप कार्यक्रम शिक्षा व स्वास्थ्य पर पड़ेगा। अपने इनोवेटिव माइंड के साथ युवा केजरीवाल व सिसोदिया की जोड़ी चाहती तो राजस्व बढ़ाने के कुछ नए व बेहतर तरीके भी ढूंढ सकती थी पर नहीं तमाम अन्य लचर राज्य सरकारों की तरह उसने भी आबकारी राजस्व से अपने लक्ष्यों को हासिल करने का रास्ता चुना। शिक्षा नीति को लागू करते हुए मनीष सिसादिया ने महात्मा गांधी को याद किया था। पर शराब नीति को जारी करते हुए वे यह भूल गए कि गांधी जी साध्य के साथ-साथ साधन की पवित्रता को भी जरूरी मानते थे और शराब या नशे के तो पूरी तरह ही खिलाफ थे।

हम नहीं कहते कि शराब को पूरी तरह से बंद कर दिया जाए। उसके नतीजे भयानक ही होते है। बिहार और गुजरात दोनों ही इसका उदाहरण है। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि अपनी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार ही उसे बना लिया जाए। इसका समाज के विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार ने एक साल के भीतर ही जो उपलब्धियां हासिल की है उनके पीछे चले जाने का खतरा बढ़ गया है। 31 अक्तूबर 2021 को उपमुख्यमंत्री मनीष सिसादिया ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में आर्थिक व गणना निदेशालय विभाग, दिल्ली की रिपोर्ट को जारी करते हुए बहुत फक्र से बताया था कि दिल्ली में शिशु मृत्युदर 2019 के 24.19 प्रतिशत के मुकाबले घट कर 2020 में 20.37 प्रतिशत रह गई है। मातृ मृत्युदर प्रति हजार जन्म पर 0.55 से घट कर 0.54  और मृत्युदर 7.29 से घटकर 7.03 प्रति हजार रह गई है। उनके अनुसार ऐसा स्वास्थ्य क्षेत्र में ढांचागत सुविधाओं के विस्तार और गुणवत्ता में सुधार से ही संभव हो सका। कह सकते है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार के कामों के नतीजे आने अभी शुरू ही हुए थे। अब इस शराब नीति के बाद 2023 के आंकड़े तो दूर हैं। पर मंडावली तो कभी भी फिर सामने आ सकता है।

New liquor policy Delhi

सरकार की नई शराब नीति 17 नवंबर से लागू हुई है और उसी दिन से सारी दिल्ली में विपक्ष के धरने प्रदर्शन चल रहे है। भाजपा व कांग्रेस के इन प्रर्दशनों को राजनीतिक भी मान लिया जाए तो पर आप पार्टी के बहुत से कार्यकर्ता व नेता भी इसके खिलाफ हैं कि उनके रोजमर्रा की खरीददारी वाले बाजार में एक दुकान शराब की भी हो। वे भी मानते है कि बाजार में बच्चे, किशोर व महिलाएं सभी आते हैं ऐसे में शराब की दुकान वहां होने पर वातावरण बिगड़ने का डर ज्यादा है। भले ही पुलिस व प्रशासन दोनों ही कहें कि इन दुकानों के बाहर खड़े होकर दारू पीने की इजाजत नहीं होगी। आप वहां से केवल खरीद सकेगे। पर खरीदने के बाद अगर कोई बाजार में ही अपनी दुकान पर बैठ कर पीता है या फिर आसपास की कोलोनी की अंधेरी गलियों में जाकर पीता है तो उसे कौन रोक सकेगा।

चार युवकों के समूह द्वारा ऐसी अंधेरी तंग गलियों में एक साथ मिलकर दारू पीने और फिर महिलाओं से अपराध करने की खबरें तो हमारे यहां आम हैं। दिल्ली तो वैसे भी पिछले कई सालों से महिला संबंधी अपराधों में शिखर पर ही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों के अनुसार 2019 के मुकाबले 2020 में भारतीय दंड संहिता संबंधी अपराधो में 18 प्रतिशत की कमी आई है पर महिलाओं के प्रति अपराध अन्य संघ शासित राज्यों के मुकाबले दिल्ली में सबसे ज्यादा रहे। कुल 10093 दर्ज मामलो में से 997 बलात्कार व 2557 घरेलू हिंसा, 1840 महिलाओं से छेड़छाड़ व 110 दहेज हत्याओं के रहे।

अभी तक शराब पीकर बच्चियों या किशोरियों से छेड़छाड़ या बलात्कार की खबरें अधिकतर दिल्ली के गांवों या कच्ची बस्तियों से आती थीं पर अब सोसायटियों के आसपास भी ऐसी वारदातें बढ़ जाएं तो कोई बड़ी बात नहीं। यौन अपराध व घरेलू हिंसा बढ़ती है तो लड़कियों की शिक्षा व रोजगार बाधित हो सकता है। उपमुख्यमंत्री के दृढ़ संकल्प से शिक्षा के क्षेत्र में दिल्ली वर्ल्ड क्लास सिटी की श्रेणी में तो आ जाएगी पर जमीन पर हो सकता है बहुत से बच्चे शिक्षा पाने के अपने सपने को पूरा नहीं कर पाएं।

तो सवाल है कि सरकार इस नाति से मिले पैसे से हासिल क्या करना चाहती है? बस फ्री बिजली-पानी जैसी लोक लुभावनी योजनाओं के लिए पैसा? पर अब तो वह उनकी ही जेब से निकाला जाएगा न। किस कीमत पर?

नई शराब नीति के तहत राजधानी में शराब के कुल 850 निजी ठेके शूरू किए जाएंगे। इसके लिए पूरी दिल्ली को 32 जोन में बांटा गया है। एक खुदरा लाइसेंसधारी को एक जोन में 27 दुकाने खोलने की छूट होगी। लाइसेंसधारी अपनी गैलरी या बालकनी में भी शराब बेच सकेंगे। पांच सुपर प्रीमियम रिटेल स्टोर होगे। इनमें समस्त देशी व विदेशी ब्रांड ग्राहको को मिल सकेगे। यही नहीं, वे खरीदने से पहले ब्रांड का स्वाद भी चख सकेंगे। 849 अत्याधुनिक मॉल स्टोर खुलेंगे। यहां भी लोग सीधा अंदर जाकर अपने पसंद की शराब खरीद सकेगे। निश्चय ही इससे लोगों को उस घटिया व अपमानजनक तरीके से शराब नहीं खरीदनी पड़ेगी जो अभी तक किसी भी सरकारी दुकान पर लोहे के जंगले के बाहर लाइन में खड़े हो वे खरीदते थे। महिलाओं को भी उसी लाइन में लगना पड़ता था। अब जिसको भी चाहिए वह किसी भी स्टोर पर जाकर उसी तरह से अपनी पसंद की शराब खरीद सकता/सकती है जैसे कि साबुन, बिस्कुट, दवाई, कपड़े आदि आम जरूरत की चीजें। लेकिन बाजार जहां दस बजे तक बंद हो जाते हैं ये स्टोर रात के तीन बजे तक खुले रहेंगे। बार व रेस्टोरेंट भी तीन बजे तक चलेंगे।

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