Indian surgeons old discovery भारतीय सर्जन की पच्चीस साल पुरानी खोज
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भारतीय सर्जन की पच्चीस साल पुरानी खोज पर अमरीकियों का ठप्पा…!

भोपाल। अमेरिकी डॉक्टरों द्वारा “इंसान में सुअर का दिल” लगाने की खबर, पिछले चार दिनों से पूरी दुनिया में हलचल मचाये हुए है, लेकिन वास्तविकता के धरातल पर सच्चाई यह है कि अरबों खरबों रुपये की ग्रांट और सैकड़ों विशेषज्ञ, जीन थेरपी एक्सपर्ट्स की भारी भरकम टीम के सहारे किये गए जिस कारनामे को आज भारत के पुरोधाओं द्वारा भी सराहा जा रहा है, उसे पच्चीस साल पहले ही, भारत के सुदूरवर्ती इलाके, आसाम में, अपने निजी स्वास्थ्य केंद्र में, डॉ धनीराम बरुआ ने अमलीजामा पहना दिया था।
बिना किसी आर्थिक मदद या कुबेराई ग्रांट, जनवरी 1997 में एक मृतप्राय मरीज को उन्होंने सुअर का हार्ट और लंग्स लगाकर सात दिनों तक जीवित रखने में सफलता हासिल कर ली थी, सोचकर देखिये कि पच्चीस साल पहले हुआ उनका यह सुकर्म अगर अमरीकी धनकुबेर टीम प्रयास जैसा हुआ होता तो?

जीनोट्रांसप्लांटेशन की नींव रखने वाले डॉ बरुआ के इस भागीरथी मेडिकल मिरेकल ने ना सिर्फ दुनियाभर के विशेषज्ञों को आश्चर्य में डाल दिया था बल्कि मृतप्राय मरीजों की लाइलाज बीमारियों, ख़ास तौर पर ऑर्गन ट्रांसप्लांट, के निदान हेतु एक नई राह खोल दी थी। लेकिन इस देश का दुर्भाग्य यही है कि यहाँ योग्य पर अयोग्य सवार है। सिस्टम, कागजी रिसर्च करता है और भाई भतीजावाद ही नहीं, आरक्षण, चापलूसी, ग्रांट भ्रष्टाचार की दीमक, नालंदा तक्षशिला जैसी एम्सिय संस्थाएं तक चट कर जाती है, और जो भी इनका कहना ना माने तो उसे नेस्तनाबूद करने के सारे हथकंडे इस माफिया के पास हैं।

आर्थिक और संस्थागत अभावों, टीम की कमी और इंसानों के शरीर की जटिलताओं के चलते, इस तरह के उपचार और प्रयास, यूँ भी भारत देश में बेहद कम हैं, अंग्रेजों की, अमरीकियों की किताबें पढ़ो और उनमे जो लिखा है, उससे इतर कुछ किया तो देश का भीड़तंत्र और मीडिया आपको पहले ही सजा दे देगा, कोर्ट तो देगा ही बाद में।

और यही हुआ, डॉ बरुआ को सराहने, सम्मानित करने की जगह, उन्हें प्रताड़ित अपमानित करते हुए जेल में ठूंसवा दिया गया था और चालीस दिन बाद उनकी जमानत हो पाई थी। जबकि हकीकत में, विदेशियों द्वारा बाजार के लिए विकसित दवाइयाँ और उपकरण, यहाँ तक कि जानवरों के बाल, हड्डियां, खालें, उनकी आँतों से बनाये गए धागे, बेधड़क बिना सवाल, भारतीयों के मानव शरीरों पर प्रयोग और इस्तेमाल किये जाते रहे हैं, यहाँ तक कि, घर घर में खाई जाने वाली विटामिन की गोलियां, खासतौर पर विटामिन डी, मछलियां सड़ाकर ही बनाई जाती हैं और हार्ट के वाल्व भी, सुअर के, बबून्स के शरीर से लिए जाते हैं, इंसानों के लिए बनाई जाने वाली सभी वेक्सीनें भी जानवरों के शरीर और उसके तत्वों को लेकर ही बनती हैं।

समझना होगा कि आज भी पूरी दुनिया में ऑर्गन ट्रांसप्लांट की राह तकते करोड़ों लोग, हर साल, लिवर किडनी, हार्ट, स्किन की बीमारियों से ग्रस्त हो, मर जाते हैं, अव्वल तो अंग प्रत्यारोपण बेहद खर्चीला, जटिल और दुर्लभ प्रक्रिया में शामिल है, उस पर, विकसित अमेरिकी देशों द्वारा थोपी गईं सैकड़ों क़ानूनी जटिलताएं कदम कदम पर रोड़े अटकाती हैं, आरक्षण और भाई-भतीजावादी, चापलूस भ्रष्ट तंत्र से बचकर, अगर भारत के चुनिंदा मेधावी डॉक्टर्स, कोई विलक्षण खोज या उपचार ढूंढ भी लें तो वो मेडिकल माफिया के दबाव में, सरकारी सिस्टम, नेता, पुलिस, इनकम टेक्स विभाग के हाथों बेबस हो, उस खोज को या तो ओने पोने दामों में बेचने पर मजबूर हो जाता है या फिर वो अपनी खोज उपलब्धियां लेकर विदेशों की शरण ले लेता है और जो ऐसा नहीं कर पाता, वो कोर्ट कचहरी की, आयकर विभाग की ड्योढ़ियों पर दम तोड़ देता है।

America Pig Kidney Doctors : 

डॉ बरुआ के जिस कारनामे को पच्चीस साल पहले ही सराहा, सम्मानित किया जाना चाहिए था, उसके लिए उन्हें चालीस दिन तक जेल में रहना पड़ा था। उनके वैश्विक प्रयास को जमींदोज करने सहारा लिया गया था, विदेशियों की ड्योढ़ियों पर बंधे, भारतीय तंत्र द्वारा अनुशंसित अनुमोदित भारतीय ह्यूमन ऑर्गन ट्रांसप्लांटेशन कानून का।

सोचकर देखिये, एक चिकित्सक का चालीस दिन जेल में रहना, पीड़ा, अपमान, मेहनत से खड़े किये गए संस्थान का सर्वनाश अलग। जबकि पूरी दुनिया में मेडिकल एथिक्स की पहली शर्त है, मरीज के लिए निस्वार्थ बेहतर प्रयास और दूसरी, अगर कोई उपचार उपलब्ध ना हो तो, जान और अंग बचाने, चिकित्सक कोई भी, कैसा भी प्रयास कर सकता है।

ऐसा नहीं है कि भारत देश में रिसर्च नहीं होतीं या यहाँ योग्यता का अभाव है, या दीमक लगी, बिकाऊ और चापलूस भारतीय चिकित्सा व्यवस्था के शिकार सिर्फ डॉ बरुआ ही हुए हैं, गुलाम भारत के ही नहीं, आजाद देश के भी सैकड़ों हजारों उदाहरण हैं, चेचक के टीके भारत में खोजे गए थे, चिकित्साजगत के पितृपुरुष “शुश्रुत” की सारी खोज, ईजाद किये गए औजार तक, आज विदेशों में पेटेंट करवा लिए गए हैं। परमाणु वैज्ञानिक डॉ होमी जहांगीर भाभा और विक्रम साराभाई की मौतें, सादगी की अप्रतिम मूर्ति श्री लालबहादुर शास्त्री जी की ही तरह आज भी संदेह की गर्त में दफ़न हैं।

भारत देश में हो रही चिकित्सा खोजों को अव्वल तो देश में कोई सहायता या संरक्षण नहीं मिलता, ऊपर से विदेशों में भी उन्हें कोई राह नहीं है, उनके रिसर्च दोयम बोलकर रद्दी में फेंक दिए जाते हैं, फिर बाद में उन्ही को विदेशी, नई शक्लोसूरत देकर अपने नाम से छपवा लेते हैं। “1100 बिलियन डॉलर” की इंडस्ट्री को चेलेंज करने और पूरी तरह रिप्लेस कर सकने की क्षमता वाली, स्किन एवं सॉफ्ट टिश्यू रिवाइवल एन्ड रिजनरेशन प्रक्रिया को खोजने वाले, डॉ भुवनेश्वर गर्ग को यानी मुझे, पिछले बीस सालों से चौतरफा झूठे केस, आयकर प्रपंच और चौपट कर दिए गए अस्पताल तथा आर्थिक अभावों की वजह से तिल तिल कर मरना पड़ रहा है।
चंद्रयान की अंत समय हुई असफलता के बाद, इसरो प्रमुख डॉ सिवान की झुकी गर्दन और आंसुओं से भरी मूरत पूरी दुनिया ने देखी थी, लेकिन देश ने उसके बाद उनको अपने कलेजे से भींचे और पीठ थपथापते देश के प्रधानमंत्री मोदीजी को भी देखा था, यह इमोशनल दृश्य आजाद देश में पहली बार अंकित हुआ था।

भारत के योग्य मेधावी डॉक्टर भी हर दिन सिस्टम और भीड़तंत्र के हाथों अपमानित होते, रोते, लुटते पिटते हैं, उम्मीद की जानी चाहिए कि कम से कम अब तो डॉ. बरुआ ही नहीं, उनके जैसे सभी देवदूतों को यथायोग्य सम्मान, संरक्षण और रिसर्च में सर्वोच्च स्थान मिले, तो देश की डूबती उतराती चिकित्सा को ही सहारा नहीं मिलेगा, बल्कि आर्थिक स्थिति भी, इस बौद्धिक सम्पदा के सहारे सैकड़ों हजारों गुना बढ़ाई जा सकती है।

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