nayaindia Anorexia being thin पतले होने का जुनून है एनोरेक्सिया!
गेस्ट कॉलम | लाइफ स्टाइल | जीवन मंत्र| नया इंडिया| Anorexia being thin पतले होने का जुनून है एनोरेक्सिया!

पतले होने का जुनून है एनोरेक्सिया!

Swine flu corona dengue

एनोरेक्सिया ग्रस्त लोगों में पतले बने रहने के जुनून में सीमित मात्रा में खाना, खाने के बाद जान-बूझकर उल्टी करना, जरूरत से ज्यादा व्यायाम, जुलाब-डॉयरूटिक-एनीमा के दुरूपयोग से वजन घटाने जैसी आदतें होती हैं जिनकी वजह से ये शारीरिक, भावनात्मक और व्यवहार सम्बन्धी गम्भीर समस्यायों से घिर जाते हैं जो समय के साथ जानलेवा हो जाती हैं।… यह रोग, व्यक्ति को शारीरिक-मानसिक-व्यवहारिक तीनों तरह से प्रभावित करता है। Anorexia being thin

पतले होने के जुनून में खाना छोड़ देना, फिर भले चाहे जान पर बन आए,  को एनोरेक्सिया नरवोसा बीमारी कहते हैं। लोग इसे पाचन सम्बन्धी रोग समझते हैं लेकिन यह गम्भीर दिमागी बीमारी है जिसमें व्यक्ति सिर्फ पतले होने के बारे में सोचता है। एनोरेक्सिया ग्रस्त लोगों में पतले बने रहने के लिये सीमित मात्रा में खाना, खाने के बाद जान-बूझकर उल्टी करना, जरूरत से ज्यादा व्यायाम, जुलाब-डॉयरूटिक-एनीमा के दुरूपयोग से वजन घटाने जैसी आदतें होती हैं जिनकी वजह से ये शारीरिक, भावनात्मक और व्यवहार सम्बन्धी गम्भीर समस्यायों से घिर जाते हैं जो समय के साथ जानलेवा हो जाती हैं।

लक्षण क्या उभरते हैं?

यह रोग, व्यक्ति को शारीरिक-मानसिक-व्यवहारिक तीनों तरह से प्रभावित करता है। शारीरिक रूप से इसके लक्षण भुखमरी (स्टारवेशन) वाले होते हैं वहीं मानसिक तौर पर वजन बढ़ने की अवास्तविक धारणा या मोटे होने का डर इस कदर हावी रहता है कि व्यवहार चिड़चिड़ा और एकाकी हो जाता है। शारीरिक लक्षणों के संकेत अंडरवेट, बहुत पतलापन, एनीमिया, अनियमित मासिक धर्म, थकान, अनिद्रा, चक्कर, बेहोशी, एब्नार्मल ब्लड काउंट,  नीली उंगलियां, बाल झड़ना, अनियमित धड़कन, लो-ब्लड प्रेशर, डिहाइड्रेशन, ज्यादा ठंड महसूस होना, कब्ज, पेट दर्द, सूखी-पीली त्वचा, हाथ-पैरों में सूजन और उल्टियां करने से खराब हुए दांतों के रूप में नजर आते हैं।

पीड़ित का व्यवहार वजन कम करने के प्रयासों पर केन्द्रित रहता है, जैसे अनावश्यक उपवास, बहुत कम या स्लेक्टेड आइटम खाना, अत्यधिक व्यायाम, भोजन के बाद स्व-प्रेरित-उल्टी, डॉयरूटिक- जुलाब-एनीमा का दुरूपयोग, खाने से मना करना, थाली में भोजन छोड़ना, सबके सामने खाने से बचना, कम कैलोरी वाला भोजन करना, देर तक खाना चबाने के बाद थूक देना, कितना खाया इस बारे में झूठ बोलना, बार-बार वजन लेना, खुद को आईने में जाँचना कि कहीं मोटे तो नहीं हो गये, हमेशा अपने मोटापे की शिकायत करना, खुद को कपड़ों की परतों में ढंकना, फ्लैट मूड (भावना की कमी), समाज से दूरी बनाना, चिड़चिड़ापन, सेक्स में रुचि कम होना इत्यादि।

क्या कॉम्प्लीकेशन हो सकते हैं?

अचानक मृत्यु या कोमा इसका सबसे बड़ा कॉम्प्लीकेशन है। ऐसा कम खाने से शरीर में हुए इलेक्ट्रोलाइट्स असंतुलन के कारण धड़कन असामान्य होने से होता है। इलेक्ट्रोलाइट्स असंतुलन से शरीर में सोडियम, पोटेशियम और कैल्शियम इत्यादि का स्तर गिरने से कार्डियक अरेस्ट हो जाता है। अन्य जटिलताओं में खून की कमी, एरिद्मिया, हार्ट फेल, ऑस्टियोपोरोसिस, कमजोर मांसपेशियां, माहवारी न होना, पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन की कमी, पेट में सूजन, कब्ज, मतली और गुर्दे से संबंधित समस्याएं प्रमुख हैं। लम्बे समय तक कुपोषित रहने से मस्तिष्क, हृदय और गुर्दों को गम्भीर नुकसान होता है जिसकी क्षति-पूर्ति इलाज से भी नहीं होती। एनोरेक्सिया पीड़ित डिप्रेशन, एंग्जॉयटी, पर्सनाल्टी डिस्आर्डर, ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिस्आर्डर जैसे मानसिक विकारों की चपेट में आ जाते हैं जिससे शराब या मादक द्रव्यों का दुरुपयोग, खुद को चोट पहुंचाना और आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियां जन्म लेती हैं।

क्यों होता है एनोरेक्सिया?

विशेषज्ञों के मुताबिक एनोरेक्सिया, जैविक, मनोवैज्ञानिक और पर्यावरणीय कारकों का संयोजन है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि वे कौन से जीन्स हैं जिनमें हुए आनुवंशिक परिवर्तनों से एनोरेक्सिया विकसित होता है। कुछ लोगों में पूर्णतावाद (परफैक्शन), संवेदनशीलता और दृढ़ता के प्रति अनुवांशिक प्रवृत्ति होती है जो समय के साथ एनोरेक्सिया में बदल जाती है। ज्यादातर एनोरेक्सिया पीड़ित, ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिस्आर्डर की वजह से भूखे होने के बावजूद भोजन नहीं करते। आसपास के फैशनपरस्त माहौल की वजह से महिलाओं में पतले होने की होड़ रहती है वे खुद को पतला रखने के चक्कर में अक्सर खाना छोड़ने की प्रवृत्ति धीरे-धीरे एनोरेक्सिया में बदल जाती है।

किन्हें इसका रिस्क ज्यादा?

 

एनोरेक्सिया महिलाओं में आम है लेकिन अब पुरूष भी इसकी चपेट में आ रहे हैं आमतौर पर किशोर। ये युवावस्था के शारीरिक परिवर्तनों, साथियों द्वारा शरीर के बारे में की गयी आलोचना के कारण भोजन करना कम कर देते हैं। कुछ अन्य कारक जैसे आनुवंशिकी, परहेज, कुपोषण, भुखमरी और ट्रांजीशन (नया स्कूल, घर या नौकरी; रिश्ता टूटना; या किसी प्रियजन की मृत्यु या बीमारी) भी एनोरेक्सिया का रिस्क बढ़ाते हैं। कुकिंग क्षेत्र में काम करने वालों को एनॉरेक्सिया का रिस्क अधिक होता है क्योंकि उन्हें भोजन बनाना है खाना नहीं।

Read also यह भी पढ़ें: ये न्याय है या मज़ाक ?

रोकथाम कैसे?

इसकी रोकथाम का सबसे असरदार तरीका है कि शुरूआती संकेतों की पहचान कर इसे और विकसित न होने दिया जाये। यदि महसूस हो कि परिवार के किसी सदस्य या मित्र में कम आत्म सम्मान और आहार से जुड़ी असामान्य आदतें हैं तो उससे इन मुद्दों पर बात करें। खाना कम खाने या थाली में खाना छोड़ने पर टोकें और उसमें हेल्दी डाइट हैबिट्स जगायें। यदि वह ज्यादा दुबला-पतला या अंडरवेट  है तो टेस्ट करायें कि शरीर में कोई डिफीशियेन्सी तो नहीं।

एनोरेक्सिया की पुष्टि कैसे?

इसकी पुष्टि हेतु हृदय गति, रक्तचाप, तापमान, त्वचा, नाखून, दिल, फेफड़ों और पेट की फिजिकल जांच के साथ लीवर, किडनी और थायरॉयड की कार्य-क्षमता पता लगाने के लिये कुछ ब्लड और यूरिनलिसिस टेस्ट; बोन डेन्सिटी के लिये एक्स-रे और दिल की अनियमिततायों के लिए ईसीजी की जाती है। इन टेस्टों के अलावा मनोचिकित्सक मरीज के विचार, भावनायें और खाने की आदतें पता करने के लिये मनोवैज्ञानिक स्व-मूल्यांकन प्रश्नावली और डायग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर (DSM-5) में एनोरेक्सिया के लिए तय नैदानिक मानदंडों का उपयोग किया जाता है।

डॉक्टर को कब दिखाना है?

एनोरेक्सिया की सबसे बड़ी चुनौती है कि लोग इसे एक बीमारी नहीं बल्कि जीवन शैली के रूप में देखते हैं। दुर्भाग्य से, एनोरेक्सिया पीड़ितों में पतले होने की इच्छा प्रबल होने से ये स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर ध्यान नहीं देते, इन्हें डॉक्टर के पास जबरन ले जाना पड़ता है। खाना कम खाने के अलावा यदि ऊपर दिये लक्षणों में से कोई तीन लक्षण दिखाई दें तो डॉक्टर के पास जाना चाहिये।

इलाज-ट्रीटमेंट

इसके उपचार में फिजीशियन, डॉयटीशियन और मनोचिकित्सक शामिल होते हैं। उपचार का पहला लक्ष्य मरीज का वजन सामान्य करना है क्योंकि ज्यादातर मरीज अंडरवेट होते हैं। यदि मरीज खाने से कतराता है तो उसे फूड पाइप लगा देते हैं ताकि जान बचायी जा सके। डॉयटीशियन, मरीज के लिये जरूरी कैलोरी आवश्यकतायें पूरी करने हेतु विशेष डाइट प्लान बनाते हैं जिससे वह स्वस्थ वजन हासिल कर ले। मनोचिकित्सक, मरीज में स्वस्थ वजन हासिल करने की इच्छा जगाते हैं, साथ ही परिवार के सदस्यों को भी सिखाते हैं कि मरीज के साथ उनका व्यवहार कैसा हो। किशोरों के लिये परिवार आधारित मानसिक चिकित्सा एक मात्र साक्ष्य आधारित उपचार है। वयस्कों को संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी से दिमाग में बसे भोजन से सम्बन्धित विकृत विश्वासों और विचारों को निकालते हैं जिनकी वजह से व्यक्ति खाने से बचता है।

अनियमित धड़कन, डिहाइड्रेशन और इलेक्ट्रोलाइट असन्तुलन की स्थिति में अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। सामान्य मामलों में डॉक्टर मरीज के खाने की दिनचर्या निर्धारित करके उसे प्रति सप्ताह चैकअप और थेरेपी के लिये बुलाते हैं। एनोरेक्सिया के इलाज में सीधे-सीधे कोई भी दवा काम नहीं करती केवल मनोविकार (डिप्रेशन, एंग्जॉयटी) दूर करने लिये एंटीडिप्रेसेंट दवाएं दी जाती हैं।

कैसी हो जीवनशैली?

एनोरेक्सिया पीड़ित की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह ठीक से अपनी देखभाल नहीं करता इसलिये उसे परिवार और मित्रों के सपोर्ट की जरूरत होती है। इससे निजात पाने के लिये जरूरी है कि वह ट्रीटमेंट प्लान पर डटा रहे, डॉयटीशियन ने जो डाइट प्लान बनाया है उससे भटके न, चाहे उसे अपनाने में कितनी भी असहजता हो। डॉक्टर द्वारा लिखे सप्लीमेन्ट्स समय से लें और प्रयास करें कि ये भोजन के माध्यम से शरीर में जायें। परिवार वालों और दोस्तों (जो आपको स्वस्थ देखना चाहते हैं) से खुद को अलग न करें और अपनी समस्याओं से अवगत कराते रहें। बार-बार वजन करना और खुद को आइने में देखना जैसी अस्वस्थ आदतों से दूरी बनायें। भूख या वजन बढ़ाने के लिये हर्बल उत्पादों का इस्तेमाल डॉक्टर के परामर्श से ही करें, याद रखें कि सभी प्राकृतिक उत्पाद सुरक्षित नहीं होते। एनोरेक्सिया के उपचार में पूरक आहारों के बजाय योगा, मालिश और मेडीटेशन ज्यादा उपयोगी हैं।

Tags :

Leave a comment

Your email address will not be published.

six − six =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
सीआरपीएफ शिविर पर आतंकी हमला
सीआरपीएफ शिविर पर आतंकी हमला