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Monday, April 19, 2021
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‘नाथ’ पर ‘अरुण’ का हमला ‘राजा’ की ‘कांग्रेस’ से दूरी क्यों…

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कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक कमलनाथ पर अरुण यादव का अपरोक्ष तौर पर ही सही इशारों इशारों में बड़ा हमला… दूसरी ओर किसानों के हक की लड़ाई की चिंता में राजा के मजबूरी में ही सही कांग्रेस संगठन और उसके नेताओं से रणनीतिक दूरी के आखिर मायने क्या निकाले जाएंगे।

वह भी तब जब नेता प्रतिपक्ष और प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे कमलनाथ पहले ही पार्टी में अपनी भूमिका का फैसला हाईकमान पर छोड़ चुके.. जो विधानसभा के अंदर शिवराज और उनकी सरकार के खिलाफ बतौर नेता प्रतिपक्ष लड़ाई लड़ने का माद्दा दिखा रहे.. राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा का जवाब दे रहे मुख्यमंत्री शिवराज से सदन के अंदर नोकझोंक और सवाल खड़ा करने की उनकी कोशिश यही बताती है कि वह मैदान छोड़ने को तैयार नहीं।

तो उन्हें 15 महीने की अपनी सरकार की उपलब्धियों पर अभी भी भरोसा कि वह आज भी न सिर्फ विधायको बल्कि प्रदेश की जनता के बीच लोकप्रिय है.. लेकिन यह भी सच है कि संगठन के मुखिया के तौर पर उनके नेतृत्व में कोई बड़ा आंदोलन अभी तक संभव नहीं हो पाया.. कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान से लेकर पंजाब में कांग्रेस के आंदोलन को धार दे रही है.. लेकिन मध्यप्रदेश में किसान और कांग्रेस एक दूसरे का भरोसा अभी तक नहीं जीत पाए.. ऐसे में कांग्रेस के अंदर नई कलह की स्थिति निर्मित हो गई जब लंबे अरसे बाद कांग्रेस के दो पूर्व प्रदेश अध्यक्षों में से एक यदि अरुण यादव ने सिद्धांत और विचारधारा की लड़ाई में प्रदेश कांग्रेस के फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराते हुए अपना राजनीतिक भविष्य दांव पर लगाने के संकेत दिए… तो अरुण यादव द्वारा खड़े किए गए सवाल पर दो पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेस के कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने इस मुद्दे पर मानो चुप्पी साध ली ।

लेकिन अरुण यादव को दिग्विजय सिंह के भाई और कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक लक्ष्मण सिंह का साथ जरूर मिला.. अरुण यादव ने एक बार फिर कहा कि मैं खामोश नहीं बैठ सकता हूं.. वैचारिक संघर्ष किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं होकर कांग्रेस पार्टी की विचारधारा को समर्पित है इसके लिए मैं हर राजनीतिक क्षति सहने को तैयार हूं अरुण यादव ने कहा कि अपनी ही सरकार में कमलनाथ ने बाबूलाल चौरसिया और उनके सहयोगियों का ग्वालियर में गोडसे का मंदिर बनाने और पूजा करने के विरोध में एफ आई आर दर्ज कराने का निर्देश दिया था संदेश सा अरुण को कमलनाथ के उस फैसले पर सख्त ऐतराज जिन्होंने बाबूलाल चौरसिया को कांग्रेस की सदस्यता दिलवाई ।

सवाल अरुण यादव ने यह कहकर भी खड़ा किया की गोडसे को देशभक्त बताने वाली प्रज्ञा ठाकुर को क्या भविष्य में कांग्रेस कभी स्वीकार करेगी.. उन्होंने गोडसे की पूजा करने वाले की कांग्रेस में प्रवेश को लेकर वह सब नेता खामोश क्यों हैं जो उन्हें पहला आतंकवादी बताते रहे..मध्यप्रदेश में हिंदू महासभा के नेता और गोडसे भक्त बाबूलाल चौरसिया की कांग्रेस में एंट्री पर पार्टी दो फाड़ हो गई है…पूर्व सीएम कमलनाथ की मौजूदगी में बाबूलाल के पार्टी में शामिल होने पर सवाल खड़े हो रहे हैं….पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ने पहले तो कांग्रेस में बाबूलाल चौरसिया के शामिल होने पर सवाल खड़े किए….वहीं एक दिन बाद अब उन्होंने इस मामले में बड़े नेताओं कमलनाथ, दिग्विजय सिंह की चुप्पी पर सवाल उठाए….अरुण यादव ने एक पत्र भी ट्वीट किया है…जिसमें उन्होंने लिखा कि मैं संघ की विचारधारा का हमेशा विरोध करता रहा हूं…उन्होंने लिखा कि क्या साध्वी प्रज्ञा कांग्रेस में अगर शामिल होती हैं तो क्या उनको स्वीकार किया जाएगा…. सवाल
बाबूलाल चौरसिया पर क्या कांग्रेस दो फाड़..
अरुण यादव ने पार्टी में एंट्री पर सवाल उठाए
दिग्गजों की चुप्पी पर भी अरुण के सवाल
बाबूलाल को पार्टी से हटाएंगे कमलनाथ?

ट्विटर पर अरुण यादव ने लिखा- बापू हम शर्मिंदा हैं
कांग्रेस के दिग्गजों की चुप्पी पर भी अरुण ने सवाल उठाए
क्या प्रज्ञा ठाकुर कांग्रेस में शामिल होती हैं तो क्या पार्टी स्वीकार करेगी?अरुण यादव के इस बयान के बाद प्रेस के सामने आए दिग्विजय सिंह लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर चुप्पी नहीं तोड़ी .. ना उन्होंने कमलनाथ के फैसले की मुखालफत की ना ही अरुण यादव को अपना समर्थन दिया.. अलबत्ता उनके भाई लक्ष्मण सिंह ने कहीं ना कहीं अरुण यादव की लाइन को आगे बढ़ाते हुए ट्वीट कर कहा कि गोडसे के उपवास को के लिए सेंट्रल जेल उपयुक्त स्थान हैं… कांग्रेस पार्टी नहीं गृह मंत्रालय भी गोडसे समर्थकों की गतिविधियों पर नजर रखें तो उचित होगा.. अरुण यादव को समर्थन राहुल गांधी की कोर टीम के सदस्य पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन का भी मिला.. मीनाक्षी ने कहां यह मेरा निजी मत और सत्याग्रह है कि इस निर्णय पर पुनर्विचार हो जिसका मैं समर्थन नहीं कर सकती.. संदेश साफ भोपाल से लेकर दिल्ली तक बाबूलाल चौरसिया कि कांग्रेस में प्रवेश पर बहस छिड़ चुकी है ।

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस में रहते करीब 1 साल पहले कमलनाथ के खिलाफ सड़क पर उतर जाने की चेतावनी दी थी.. तो अब अरुण यादव ने साफ कर दिया कि वह जुबानी जंग नहीं लड़ते बल्कि मुद्दा आधारित लड़ाई सड़क पर आकर ही लड़ते हैं… कहीं ना कहीं टि्वटर विज्ञप्ति बयान की राजनीति करने वाले नेताओं की ओर इशारा कर अरुण यादव ने कमलनाथ को भी आईना दिखा संदेश पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व तक पहुंचा दिया… राहुल गांधी पहले ही संविधान बचाओ मार्च के दौरान एक रैली में नाथूराम गोडसे और नरेंद्र मोदी की विचारधारा के आधार पर तुलना कर विवाद खड़ा कर चुके है.. दिग्विजय सिंह जैसे नेता भी नाथूराम गोडसे के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलकर संघ को खरी-खोटी सुनाते रहे.. सवाल खड़ा होना लाजमी है क्या अरुण यादव कांग्रेस के अंदर अपनी उपेक्षा और भूमिका से आहत और उपेक्षित है.. जो उन्होंने प्रदेश नेतृत्व की कार्यशैली और फैसलों पर बिना लाग लपेट के सवाल कम खड़े किए भड़ास ज्यादा निकाली है.. पिछले विधानसभा चुनाव में शिवराज के खिलाफ बुधनी से चुनाव मैदान में उतार दिए गए अरुण यादव को इससे पहले कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के लिए अपनी कुर्सी छोड़ना पड़ी थी।

यही नहीं शिवराज सरकार के खिलाफ किसानों को लामबंद करने के लिए किसान नेता के तौर पर अरुण यादव को कमलनाथ द्वारा आगे नहीं किया गया.. न ही ट्रैक्टर रैली की इजाजत नहीं दी गई.. सवाल क्या अरुण यादव ने राहुल गांधी का ध्यान मध्य प्रदेश कांग्रेस की दुर्दशा की ओर खींचा है.. क्या राष्ट्रीय नेतृत्व खासतौर से राहुल गांधी की टीम के ईशारे पर यह बयान देना पड़ा.. जो सीधे तौर पर कमलनाथ की सोच और रणनीति पर खड़ी करने वाले सवाल से जुड़ा है.. अरुण यादव ने 28 विधानसभा के उपचुनाव में कमलनाथ को मजबूत करने के लिए प्रचार में पूरी ताकत लगाई थी.. तो क्या यह मान लिया जाए की दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे कमलनाथ के खिलाफ अरुण यादव ने सीधा मोर्चा खोल दिया है.. सवाल दिग्विजय, अजय सिंह, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया ही नहीं मुकुल वासनिक इस सिद्धांत और विचारधारा की लड़ाई में आखिर किसके साथ खड़े नजर आएंगे ।

तीन वरिष्ठ नेताओं में क्या कोई खुलकर अरुण यादव के साथ नजर आएगा या फिर कमलनाथ का खौफ इन्हें अपने भविष्य को लेकर सोचने को मजबूर करेगा.. सवाल क्या अंदर खाने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी को लेकर बिसात बिछाने लगी है.. जो कमलनाथ सीधे नरेंद्र मोदी अमित शाह और संघ के खिलाफ अपने अंदाज में व्यक्तिगत रिश्तो को छोड़कर सीधा हमला करते रहे.. आखिर क्या उनसे गोडसे का मंदिर बनवाने वाले बाबूलाल चौरसिया को कांग्रेसमें लाने के साथ बड़ी चूक हो गई है.. तो सवाल क्या बतौर प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव के सख्त एतराज के बाद कमलनाथ अपने फैसले पर पुनर्विचार करेंगे.. जो भी हो अरुण यादव क्या कमलनाथ के बाद कॉन्ग्रेस के दूसरे ऐसे नेता बनकर उभरे हैं जिन्हें इग्नोर नहीं किया जा सकता.. जिन्होंने राजनीतिक क्षति की चिंता न करते हुए कांग्रेस के विचारधारा की लड़ाई को लड़ने का दमखम दिखाया है.. सवाल राष्ट्रीय नेतृत्व प्रदेश नेतृत्व से आखिर किससे उन्हें अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता सता रही है.. यदि अरुण यादव ने कमलनाथ की नीति और नियत पर सवाल खड़ा किया है तो कहीं ना कहीं दिग्विजय सिंह ने भी किसान नेता अरुण यादव के साथ बतौर प्रदेश अध्यक्ष कमल नाथ की काबिलियत पर सवाल खड़ा कर दिया है।

कमलनाथ ने यदि अरुण यादव को ट्रैक्टर रैली निकालने की अनुमति नहीं दी थी तो इस बार दिग्विजय सिंह किसानों के आंदोलन को मध्यप्रदेश में समर्थन दे उसे नई धार देने के लिए आखिर गैर राजनीतिक मंच का चयन क्यों दिया ..क्या दिग्गी राजा को प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और उनकी कांग्रेस संगठन पर भरोसा नहीं रहा.. यही नहीं कमलनाथ और अरुण यादव के मतभेद उभरने के कारण क्या राजा ने खुद को किसानों का सही शुभचिंतक साबित करने की अपनी लाइन को आगे बढ़ा दिया है.. क्या किसानो की हक की लड़ाई लड़ते रहे अरुण यादव में दिग्विजय सिंह को अब दम नजर नहीं आता और कांग्रेस संगठन के दम पर कमलनाथ की नेतृत्व क्षमता और प्रबंधन क्षमता पर दिग्गी राजा को भरोसा नहीं रहा.. यह सवाल इसलिए क्योंकि राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल कर गैर राजनीतिक मंच से किसानों की हुंकार लगाने की रणनीति दिग्विजय सिंह द्वारा न सिर्फ बनाई गई बल्कि इसकी तारीख और मंच का स्वरूप भी तय कर दिया गया है।

क्या कांग्रेस को भरोसा नहीं रहा कि मध्य प्रदेश के किसान सीधे भाजपा से आगे मोदी और शिवराज के खिलाफ उनके मंच से किसान आंदोलन का समर्थन और उसे ताकत दे सकते हैं.. तो सवाल पिछले विधानसभा चुनाव से पहले मंदसौर गोली कांड के बाद कांग्रेस ने पीछे रहकर जिस तरह किसानों को आंदोलन के लिए मजबूर किया और चुनाव में सियासी फसल काटी थी.. उसी लाइन को राजा फिर आगे बढ़ा रहे हैं.. जो पहले ही गैर राजनीतिक लेकिन धार्मिक नर्मदा यात्रा कर सियासत में धमाकेदार वापसी कर चुके हैं तो अब गैर राजनीतिक मंच के जरिए किसानों के मसीहा बनने की लाइन पर आगे बढ़ते हुए नजर आ रहे हैं.. उनके यह प्रयास के दिन रंग लाते हैं तो सिर्फ किसान आंदोलन मजबूत होगा या फिर कमलनाथ और अरुण यादव के मुकाबले दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश कांग्रेस के अंदर सबसे प्रभावशाली लोकप्रिय और स्वीकार्य नेता बन कर उभरेंगे।

तो इसकी वजह है सिर्फ नगरीय निकाय चुनाव है या फिर आगामी विधानसभा चुनाव में धर्म जाति और दलगत राजनीति से ऊपर किसानों को सामने रखकर किसान पुत्र शिवराज और भाजपा की सरकार को मात देने की योजना बनाई जा रही है ..ठीक उसी तरह जैसे अन्ना आंदोलन के बाद भाजपा और संघ ने मनमोहन सरकार के खिलाफ बने माहौल को चुनाव में भुनाया था.. सवाल दिग्विजयसिंह ने क्या कमलनाथ ही नहीं सोनिया और राहुल को भरोसे में लेकर उस मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन को सफल बनाने की योजना बनाई है.. जहां अभी तक दूरदर्शिता के चलते शिवराज का डैमेज कंट्रोल सफल रहा ..दिग्विजय सिंह ने कहा है कि कमलनाथ और दूसरे नेता किसान महापंचायत के मंच पर नहीं बल्कि नीचे पंडाल में बैठे नजर आएंगे और इस महापंचायत का मंच किसान नेता राकेश टिकैत भी ग्वालियर चंबल क्षेत्र में साझा करेंगे ..सवाल खड़ा होना लाजमी है जब प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश और राहुल गांधी राजस्थान में किसान आंदोलन का हिस्सा बन चुके हैं।

तब मध्यप्रदेश में आखिर इन दोनों को क्यों नहीं बुलाया जा रहा.. क्या कांग्रेस को इस बात का भय सता रहा कि कर्ज माफी का मुद्दा और वादाखिलाफी से किसान की नाराजगी कांग्रेस के लिए सिरदर्द तो भाजपा और शिवराज की ताकत बन सकती है.. तो बड़ा सवाल नेता प्रतिपक्ष के साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका निभा रहे कमलनाथ आखिर अपनों के निशाने पर क्यों और उनकी नेतृत्व क्षमता पर सहयोगियों को भरोसा क्यों नहीं.. क्या किसानों के हक की लड़ाई कमलनाथ और कांग्रेस लड़ने में सक्षम नहीं रहे हैं.. तो सवाल कभी अरुण यादव की पैरवी करने वाले दिग्विजय सिंह दोनों अपने अपने दांव के जरिए पोजिशनिंग नए सिरे से ले चुके हैं.. तो क्या यह दोनों नेता भविष्य में नए नेतृत्व को लेकर एक पाले में किसी एक के खिलाफ खड़े नजर आएंगे.. तो वह कौन होगा क्या कमलनाथ गोडसे भक्त बाबूलाल चौरसिया को कांग्रेस से बाहर कर अरुण यादव का भरोसा फिर से जीतने का जोखिम मोल लेंगे.. तो कमलनाथ किसानों की लड़ाई के लिए ताल ठोक चुके दिग्विजय सिंह की इस बार कमजोरी या फिर ताकत साबित होंगे।

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