‘सत्ता ने भाजपा को खोखला कर दिया है’: अरुण शौरी

अभी एक साक्षात्कार में वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अरुण शौरी ने कहा कि मीडिया का ध्यान एक बड़े परिवर्तन पर नहीं गया है। यह है भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) में आया बदलाव। शौरी का संघ-भाजपा से लंबे समय तक निकट संबंध रहा। उन्हें एक बार आर.एस.एस. ने अपना सर्वोच्च सम्मान भी दिया था। वैसे भी, शौरी तथ्य लेखन के लिए जाने जाते रहे हैं। इसलिए उन की बातें ध्यातव्य हैं।

शौरी ने कहा कि कि पहले भाजपा में आर.एस.एस. के कुछ लोग भेजे जाते थे। तब भाजपा के पास अपने कार्यकर्ता होते थे। लेकिन अब भाजपा के पास अपने कैडर नहीं हैं। वह कोई पार्टी नहीं रह गई है। केवल ऊपर नेताओं का एक फेन या झाग (‘फ्रॉथ’) है, जिसे दिखाकर वोट लिया जाता है। वे चाहे नाटक, तमाशे कर या किसी चतुराई से चुनाव जीतते हैं। बाकी नीचे लोग उन के आसरे रहते हैं। मंत्री जैसे लोग भी, जिन्हें अब कुछ बोलने का अवसर नहीं है।

इस बीच, उन ऊपरी नेताओं के लिए पूरे देश में कैडर का काम आर.एस.एस. के लोग कर रहे हैं। वे  आर.एस.एस. के सरसंघचालक के हाथ में नहीं रह गए। शौरी के अनुसार, “मोहन भागवत बड़े भले आदमी हैं। मगर अब उन के हाथ-पैर नहीं हैं। यदि भाजपा सत्ताधारी ने कह दिया कि एक हजार आर.एस.एस. कार्यकर्ता बिहार भेजने हैं, तो वे भेजे जाएंगे। चाहे भागवत जी चाहें या न चाहें।” इस प्रकार, आर.एस.एस. पूरी तरह भाजपा की सेना बन गई है।

यह अनायास नहीं हुआ। शौरी 1980 के दशक का एक प्रसंग सुनाते हैं, जब वे अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस के संपादक थे। एक बार तात्कालीन आर.एस.एस. सरसंघचालक बालासाहब देवरस के छोटे भाई, और प्रमुख संघ नेता भाऊराव जी देवरस ने उन्हें दिल्ली के झंडेवालान मिलने बुलाया। शौरी गए तो देखा कि एक छोटी सी कोठरी में भाऊराव रहते हैं, जिस में एक चारपाई और एक कुर्सी है। एक आदमी उन की सेवा के लिए है। बातचीत से शौरी चकित हुए कि भाऊराव जी की दृष्टि कितनी पैनी थी, उन्हें शौरी के लेखन के नुक्तों की गहरी समझ थी। वापस आकर उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका को बताया कि उतना प्रखर और बड़ा व्यक्ति कैसा साधु सा रहता है! किन्तु गोयनका पर कुछ असर नहीं हुआ। वे बोले, कि ‘अरे, उन लोगों को अभी तक कुछ मिला ही नहीं, इसलिए साधु बने फिर रहे हैं! एक बार सत्ता-सुन्दरी मिलने दो, फिर देखना उन की साधुता या भोग-विलास।”

शौरी के अनुसार, आर.एस.एस. के आम नेता गोयनका के इस टेस्ट में फेल हुए हैं। भाजपा सत्ताधारियों ने आर.एस.एस. के मँझोले, निचले नेताओं को अपना आदमी बना लिया है। इस से इन की पूछ बढ़ गई है। जिन्हें कोई पहचानता तक न था, उन्हें लेने के लिए गाड़ी आती है, बढ़िया गेस्ट-हाउस रहता है, एयरपोर्ट पर लोगों को किनारे हटा कर उन के लिए रास्ता खाली कराया जाता है। बेचारों को यह महत्व कब मिला था! लिहाजा वे भाजपा चुनाव-मशीनरी के पुर्जों में बदल गए हैं। ऊपर के चार-पाँच आर.एस.एस. नेता संस्कृति, हिन्दुत्व, आदि पर भाषण देते रहते हैं। जबकि उन के राज्य और जिले स्तर के लोग अब सीधे भाजपा सत्ताधारियों के कब्जे में हैं, और खुश हैं। संघ के ऊपरी नेता यह पसंद करें या नहीं, अब बेबस हैं।

भाजपा-आर.एस.एस में आया यह परिवर्तन विचारणीय है। यह केवल शौरी का अवलोकन नहीं। कुछ पुराने संघ-भाजपा नेता भी मानते हैं कि बहुत कुछ बदल गया है। पुराने, प्रतिष्ठित आर.एस.एस. कार्यकर्ताओं की स्थिति चुपचाप सब स्वीकारने या किनारे पड़े रहने की है। भाजपा मशीनरी शहर के किसी भी व्यक्ति को कार्यकारी बना कर चुनावी काम करवाती है। वह व्यक्ति आर.एस.एस. से बाहर का व्यापारी, चालबाज, कारकुन, आदि कोई भी हो सकता है। मुख्य.काम है – चुनाव जीतना। ताकि आगे फिर चुनाव जीता जा सके। यह अपने आप में संपूर्ण गतिविधि हो गई है। सत्ता ने भाजपा को खोखला कर दिया है। उस में अब कोई नया विचार, समाधान, आदि देने की क्षमता नहीं है। भाजपा मानो एक रोजगार-एजेंसी भर है, जिस में किसी तरह ऊपर का ध्यान आकृष्ट कर, ठकुरसुहाती करके कोई पद, सुविधा, आदि पाई जाती है।

यह दयनीय दृश्य है। बड़े-बड़े पदों पर लोग काम के लिए नहीं, बल्कि ऊपर की कृपा बनाए रखने के लिए हैं। ऐसे में हमारी राष्ट्रीय स्थिति शोचनीय हो सकती है। क्योंकि ऐसे लोगों में कोई रीढ़ या विवेक होने की संभावना संयोग भर है। यद्यपि वे गंभीर जिम्मेदार पदों पर हैं। इस पर हम जैसों की आलोचना का कोई महत्व नहीं। किन्तु चीन जैसी ताकतें पूरे हालात को गौर से देख रही होंगी, कि ऐसे कार्यकारी लोग उन का दबाव बर्दाश्त नहीं कर सकता। कोई संकट झेल नहीं सकता। क्योंकि कार्यकारी बड़े औसत किस्म के हैं, जिन की स्थितियाँ योग्यता और सामर्थ्य से नहीं बनी है। वे तो केवल ऊपर का मुँह जोहते हैं। जो अपने नेता से साफ-साफ कुछ बोलने तक का साहस नहीं रखते।

यदि शौरी की बातों में आधा भी सही हो, तो चिन्ता का विषय है। चुनाव जीतना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। असल चीज है कि देश का क्या हो रहा है? ब्राजील और तुर्की जैसे समृद्ध देशों के उदाहरण से शौरी कहते हैं कि वहाँ नेता चुनाव जीतते गए हैं, पर अपने देश को कहाँ पहुँचा दिया! तुर्की पूरे मुस्लिम विश्व में इस्लाम की जकड़ से निकल कर विकसित होने का उदाहरण बन सकता था। यही कमाल पाशा की महान विरासत थी। उसे एरदोगान ने तहस-नहस कर दिया। भारत में भी भाजपा के चुनाव जीतते जाने के हजार कारण बताए जा सकते हैं। जिस में विपक्ष की दुर्गति और राष्ट्रीय संस्थाओं का पतन भी कारण हो सकते हैं। यदि संस्थाएं बिगाड़ी जाती रहें, जो इंदिरा गाँधी के समय से शुरू होकर लगातार चल रहा है, तो लोग किस के पास जाएंगे? कानून सत्ताधारियों को लाभ पहुँचाने के लिए बनाए जाते हैं। जैसे, हाल के चुनावी बाँड कानून के कारण बड़े उद्योगपति सत्ताधारी दल को ही चंदा देंगे, जिस का हिसाब भी दल को नहीं देना है। इस का मुकाबला विपक्षी दल कैसे कर सकते हैं? फिर उन में स्वार्थ, आपसी ईर्ष्या, आदि से वे थोड़े समय के लिए भी एकताबद्ध नहीं हो पाते। अतः भाजपा का चुनाव जीतना अपने-आप में कोई अनोखी बात नहीं।

कई लोग अरुण शौरी की आलोचना को ‘अंगूर खट्टे हैं’ जैसा लेते हैं। किन्तु उन आलोचनाओं को स्वतंत्र रूप से परखा जा सकता है, इसलिए परखा जाना चाहिए। क्योंकि वही बात कोई दूसरा अवलोकनकर्ता, कोई तटस्थ लेखक कहे, तो क्या उत्तर दिया जाएगा? सदैव आलोचक का चरित्र-हनन करना कोई उत्तर नहीं है। यह तो उलटे आलोचना के सही होने का संकेत हो जाता है। चूँकि देश और समाज किसी पार्टी या संगठन से बहुत ऊँचा है। उस के भवितव्य को किसी पूर्वाग्रह से उपेक्षित करना अनुचित है। फिर, देश-सेवा के दावे को किसी कसौटी से क्यों बचना चाहिए?

स्वयं शौरी को अपने बारे में अधिक मुगालता नहीं है। वे कहते हैं, “हम जैसे लिखने-पढ़ने, टीका-टिप्पणी करने वाले तो कीट-पतंग हैं, जिन की तकलीफ बेमानी है। किन्तु हमारे द्वारा दिखाए तथ्यों की उपेक्षा करने वाले ही कष्ट भोगेंगे। साथ ही, देश की और आम लोगों की हानि होगी । चिन्ता उसी की करनी चाहिए।” निस्संदेह। विचारशील लोगों को सारी बात पर शान्ति से अवश्य सोचना चाहिए।

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