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Monday, April 19, 2021
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प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा को न जोड़े चुनाव से

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प्रायः दो पड़ोसी देशों के बीच तनातनी, रिश्तों में उतार-चढ़ाव, आपसी हितों में टकराव आदि देखने को मिलता रहता है। परंतु तमाम राजनैतिक सीमाओं और मज़हबी दुराग्रहों के मध्य भी यदि दो देशों के नागरिकों की विरासत, दुःख-सुख-संघर्ष से लेकर शत्रु-मित्र की अनुभूतियाँ साझी हों तो भौगोलिक तल पर विलग होने के बावजूद सांस्कृतिक तल पर सतत संपर्क, संबंध और सहयोग बना रहता है। मानचित्र पर लकीरें खिंचने मात्र से जमीन और जनता बंट नहीं जाती। साझे अतीत और साझे सपने यथार्थ के कतिपय थपेड़ों को भुलाकर दो देशों को साथ चलने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। यही कारण है कि तमाम प्रकार के आरोपित भेदभावों और मज़हबी ताक़तों की लगातार साज़िशों के बीच भी भारत-बांग्लादेश के नागरिकों के मध्य शांति, सौहार्द्र एवं सहयोग का रिश्ता क़ायम रहा है।

इसकी कुछ ठोस वजहें हैं। वर्ष 1971 में बांग्लादेश को मिली मुक्ति में भारतीय सेना की निर्णायक भूमिका को न वहाँ की सरकार भुला  सकती है, न वहाँ की जनता।  केवल युद्ध-काल में ही नहीं, अपितु उसके बाद भी भारत ने वहाँ के नागरिकों को सब प्रकार के राहत एवं सहयोग प्रदान करने में कभी कोई संकोच नहीं दिखाया। दोनों देश लगभग 4,096 किलोमीटर की लंबी सीमा और अनेकानेक नदियों के पानी की साझेदारी करते हैं, इसके बावजूद दोनों देशों के पारस्परिक संबंध कभी चिंताजनक रूप से तनावपूर्ण नहीं रहे। उलटे फेनी नदी पर बने मैत्री सेतु के निर्मित होने,26 जनवरी को नई दिल्ली के राजपथ पर बांग्लादेश की सैन्य-टुकड़ी के परेड में हिस्सा लेने और अब प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा से दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा, ऊर्जा एवं गति मिली है।

ग़ौरतलब है कि त्रिपुरा के दक्षिणी छोर सबरूम और बांग्लादेश के रामगढ़ को जोड़ने वाले इस 1.9 किलोमीटर लंबे सेतु का दोनों देशों के राजनयिक एवं सामरिक संबंधों की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है। इसके अलावा जानकारों का कहना है कि इस मैत्री सेतु के प्रारंभ होने के पश्चात त्रिपुरा के सबरूम से चिट्टागोंग बंदरगाह की दूरी केवल 80 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे यातायात एवं कारोबार सुगम होगा। इससे पूर्वोत्तर भारत के किसान एवं व्यापारी सुगमता से अपना सामान सीमा के आर-पार ले जा सकेंगें। उल्लेखनीय है कि जहाँ भारत बांग्लादेश से कागज़, तैयार कपड़े, धागा, नमक और मछली जैसी चीजों का आयात करता है, वहीं प्याज़, सूत, कपास, स्पंज आयरन और मशीनों के कलपुर्जे जैसी तमाम रोज़मर्रा की वस्तुएँ उसे निर्यात भी करता है।

कोरोना महामारी के कारण दोनों देशों के बीच होने वाले व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था। प्रधानमंत्री की यात्रा से पड़ोसी सर्वप्रथम, वसुधैव कुटुंबकम की भावना को तो बल मिलेगा ही, इसके साथ-साथ दोनों देशों के आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों, भावी योजनाओं एवं तमाम परियोजनाओं को भी गति मिलेगी। मसलन दोनों देशों के बीच वहाँ के दो सबसे बड़े बंदरगाहों मंगला और चट्टोग्राम के आधुनिकीकरण एवं विस्तार, पावर प्लांट व एलएनजी टर्मिनल लगाने तथा दोनों देशों को एक संयुक्त गैस पाइपलाइन नेटवर्क से जोड़ने की दिशा में ठोस क़दम उठाया जा सकेगा। इन परियोजनाओं का हिंद-प्रशांत क्षेत्र की महत्ता, चीन के ख़तरे को देखते हुए पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा, तेजी से बढ़ती वहाँ की अर्थव्यवस्था आदि की दृष्टि से भी विशेष महत्त्व है। दोनों देशों ने वाणिज्यिक, सूचना प्रौद्योगिकी, खेल एवं युवा मामले, आपदा-प्रबंधन संबंधी पाँच अहम समझौते पर भी हस्ताक्षर किए हैं, जो आपसी संबंधों की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे।

दुर्भाग्यपूर्ण है कुछ लोग प्रधानमंत्री के इस दौरे को असम एवं पश्चिम बंगाल के चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। दो देशों के बीच के राजनयिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को चुनावी लाभ-हानि से जोड़कर देखना सतही और संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। यदि प्रधानमंत्री इस दौरे के दौरान भारतीय दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण किसी धार्मिक केंद्र या श्रद्धास्थल पर गए हैं तो ऐसा पहली बार तो नहीं हुआ है? क्या वे 2015 में ढाकेश्वरी देवी के मंदिर नहीं गए थे? तब तो कोई चुनाव नहीं था? यदि वे मतुआ महासंघ के संस्थापक हरिचंद ठाकुर के ओराकांडी स्थित मंदिर और सतखीरा के ईश्वरपुर स्थित जेशोरेश्वरी (यशोरेश्वरी) काली मंदिर गए तो इस पर आपत्ति एवं हायतौबा क्यों? क्या इसके सामाजिक-सांस्कृतिक महत्त्व व निहितार्थ नहीं? क्या यह दोनों मुल्कों के लोगों के रिश्ते को बेहतर बनाने में सहायक नहीं?

आश्चर्य है कि निजी आस्था एवं मान्यता के नाम पर चरित्र एवं औचित्य का प्रमाणपत्र बाँटने वाले लोग भी प्रधानमंत्री के हर निर्णय पर सवाल खड़े करते हैं। उन्हें राजनीतिक चश्मे से देखे बिना रह नहीं पाते। क्या भाषा, कला, संगीत, साहित्य, संस्कृति, श्रद्धा, आस्था जैसे विषयों एवं केंद्रों को अकारण राजनीति में घसीटना उचित होगा? क्या प्रधानमंत्री केवल किसी एक दल के प्रतिनिधि होते हैं, पूरे देश और सवा सौ करोड़ देशवासियों के नहीं? क्या द्विपक्षीय संबंधों में प्रगाढ़ता लाने के लिए दोनों देशों के मध्य सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक स्तर पर समझौते-संबंध अनुचित हैं? क्या राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और बंगबंधु मुजीबुर रहमान की स्मृति में साझे कार्यक्रम प्रशंसनीय नहीं? क्या बांग्लादेश की आज़ादी की स्वर्ण-जयंती, बंगबंधु की जन्म-शताब्दी जैसे तमाम पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों को प्रधानमंत्री मोदी की चुनावी योजनाओं से जोड़कर देखना उतावलापन व अदूरदर्शिता नहीं? क्या इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए उन्होंने दोनों देशों के साझे सपनों-संघर्षों, सामूहिक पीड़ा-आनंद को स्वर नहीं दिया?

सच यही है कि प्रधानमंत्री की इस यात्रा से दोनों देशों के आपसी संबंधों में सुधार होगा, बहुविध हितों को पोषण मिलेगा, लोकतांत्रिक मूल्यों को मज़बूती मिलेगी, कला-भाषा-साहित्य एवं संस्कृति के तल पर साझेदारी बढ़ेगी, सीमावर्त्ती क्षेत्रों में आतंकवादी वारदातों में कमी आएगी, सीमाओं के आर-पार अवसर की ताक में घात लगाकर बैठीं कट्टरपंथी ताक़तों पर प्रभावी अंकुश लगेगा,  शांत-स्थिर-अपराधमुक्त सीमा-प्रबंधन को बल मिलेगा, सीमा पर असैनिक लोगों के जान-माल की हिफाज़त होगी, भूमि-पानी-आसमान में सहयोग और संयोजकता को बढ़ावा मिलेगा, रोहिंग्या मुसलमानों एवं घुसपैठियों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद व गतिरोध समाप्त होगा, नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर भ्रम एवं संशय दूर होगा।

यात्रा को लेकर कयासों एवं अफ़वाहों को हवा देने की बजाय दोनों देशों के मध्य मैत्री, सौहार्द्र एवं सहयोग पूर्ण संबंध स्थापित करने के लिए अनुकूलता निर्मित करने का चौतरफा प्रयास अधिक जिम्मेदारी भरा कदम होगा। प्रधानमंत्री या कोई भी पदेन व्यक्ति विदेशी धरती पर देश के प्रतिनिधि होते हैं, दल या संगठन के नहीं। इसलिए उन पर राजनीतिक टीका-टिप्पणी अच्छी नहीं होती। और वैसे भी सबसे अच्छी राजनीति वह है, जिसमें दलगत हितों से अधिक देशहित को प्रश्रय एवं वरीयता मिले।

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