‘विधानसभा’ अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के भंवर में उल्झी ‘भाजपा’

छत्तीसगढ़ के विभाजन के साथ मध्यप्रदेश की विधानसभा में अध्यक्ष के लिए यदि विंध्य क्षेत्र का लंबे समय तक दबदबा रहा तो फिर महाकौशल ने भी अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज कराई। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी लंबे समय तक कांग्रेस कार्यकाल में यदि श्रीनिवास तिवारी के पास रही …तो भाजपा कार्यकाल में महाकौशल से जुड़े ईश्वरदास रोहाणी ने इस पद को संभाल कर एक अलग छाप छोड़ी ।

इससे पहले विंध्य क्षेत्र से श्रीनिवास तिवारी के अलावा रामकिशोर शुक्ल और गुलशेर अहमद तो महाकौशल से एनपी प्रजापति और ईश्वरदास रोहाणी यह दायित्व निभा चुके हैं.. भाजपा की पिछली शिवराज सरकार रहते मध्य भारत से सीता शरण शर्मा ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया ….कमलनाथ सरकार में जिस अध्यक्ष की कुर्सी पर एनपी प्रजापति बैठे ..उसके लिए सरकार बनाने के साथ भाजपा को एक स्वीकार्य नेता की दरकार है।

दरअसल मध्यप्रदेश के तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रम में उलटफेर के साथ कई चौंकाने वाले फैसले सामने आ चुके.. भाजपा इस बार विधानसभा अध्यक्ष के साथ उपाध्यक्ष को लेकर राजनैतिक भंवर से निकलने की जुगत में है.. शिवराज मंत्रिमंडल के विस्तार के साथ उपचुनाव की चुनौती को ध्यान में रखते हुए भाजपा सोशल इंजीनियरिंग के अलावा गुटीय और क्षेत्रीय समीकरण दुरुस्त अपनी ओर से कर चुकी है.. यदि अनुसूचित जाति जनजाति का कोई अनुभवी नेता विधानसभा अध्यक्ष के लिए नहीं मिला तो अध्यक्ष की कुर्सी पर बड़ा फैसला सीता शरण शर्मा और केदार शुक्ला के बीच होना है.. संतुलन बनाने के लिए विधानसभा उपाध्यक्ष की कुर्सी बुंदेलखंड ,महाकौशल या फिर विंध्य के खाते में जा सकती है.. जातीय और क्षेत्रीय समीकरण के साथ अनुभवी और युवा से ज्यादा विधानसभा की संख्या गणित और दूसरी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भरोसेमंद चेहरे की तलाश में भाजपा जुटी हुई है..विधानसभा सत्र के नजदीक आते ही कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया कि नेता प्रतिपक्ष की भूमिका पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ही निभाएंगे।

कमलनाथ प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी है … कांग्रेस की रणनीति उप चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी में इन दोनों महत्वपूर्ण पदों पर मतभेद सामने नहीं आने देने की है ..इससे पहले भाजपा कैबिनेट के गठन और मंत्रियों को विभाग सौंपकर सरकार अपनी राजनीतिक जमावट को दिशा दे चुकी है.. अब मंत्री नहीं बन पाए कुछ विशेष नेताओं की नजर विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की कुर्सी पर टिक गई.. जिसकी गुत्थी सुलझना बाकी है .. क्योंकि अध्यक्ष का महत्व वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम को देखते हुए पहले ही बढ़ चुका है.. कमलनाथ सरकार के रहते अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद पर कांग्रेस ने अपना कब्जा जमा कर सियासी संदेश दिया था ..ऐसे में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही शिवराज और महाराज भी इन दोनों महत्वपूर्ण पदों पर कांग्रेस के लिए कोई गुंजाइश छोड़ने वाले नहीं।

विधानसभा के अंकगणित और उपचुनाव चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भाजपा को एक अनुभवी विधानसभा अध्यक्ष की दरकार रहेगी.. तो उसे पार्टी के अंदर क्षेत्र और जातीय समीकरणों को भी ध्यान में रखते हुए फैसला लेना होगा.. कमलनाथ के मुख्यमंत्री रहते भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष के लिए एमपी प्रजापति के खिलाफ अनुसूचित जाति के जगदीश देवड़ा और महिला आदिवासी हिना कावरे के खिलाफ उपाध्यक्ष के लिए विजय शाह को आदिवासी चेहरा के साथ चुनाव मैदान में उतारा था.., यह दोनों नेता शिवराज कैबिनेट का हिस्सा बन चुके ..उस वक्त कांग्रेस ने उपाध्यक्ष पद भी भाजपा को नहीं देकर परंपराएं पीछे छोड़ दी थी ..भाजपा ने कैबिनेट का गठन और विभागों वितरण को लेकर कई दौर की जो लंबी एक्सरसाइज की थी …उस वक्त अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए संभावनाओं पर विचार जरूर किया होगा … लेकिन पार्टी ने अभी तक इस महत्वपूर्ण पद के लिए अपने पत्ते नहीं खोले।

कैबिनेट के गठन के साथ अंतिम दौर में मंत्रियों के तौर पर विधायकों को एडजस्ट किए जाने के बाद अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए अभी तक किसी एक नाम पर सहमति नहीं बन पा ना चर्चा का विषय बना हुआ है.. कयासबाजी के बीच गिने-चुने चेहरे ही दौड़ में शामिल है.. पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सीताशरण शर्मा को कैबिनेट में शामिल नहीं किए जाने के कारण उनका दावा बरकरार है …अनुभव के कारण मुख्यमंत्री, भाजपा संगठन और संसदीय मंत्री तीनों मोर्चे पर उनके नाम पर सहमति बन सकती है… बशर्ते आदिवासी और दलित चेहरे की जरूरत से भाजपा बाहर निकले.. कैबिनेट में भले ही ब्राह्मण समाज के तीन मंत्री जगह पा चुके हैं लेकिन भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री भी ब्राह्मण ही है.. इसके साथ ही यदि मंत्रिमंडल को ध्यान में रखते हुए असंतुलन को दूर करने की आवश्यकता भाजपा को महसूस हुई.. तो उसे विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए विंध्य क्षेत्र से लेकर महाकौशल पर नजरें जरूर दौड़ाना होगी ..यदि उप चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस गुत्थी को समझाने की कोशिश की तो फिर बुंदेलखंड से लेकर मालवा पर भी गौर करना होगा।

मंत्रीमंडल में 8 क्षत्रिय 3 ब्राह्मण 11 ओबीसी चार चार अनुसूचित जाति जनजाति के साथ चार महिला मंत्री बनाई जा चुकी है.. भाजपा में यदि किसी ब्राह्मण के नाम पर ही सहमति बनाना पड़े तो सीताशरण शर्मा के साथ केदार शुक्ला और राजेंद्र शुक्ला जो मंत्री नहीं बन पाए इनके नाम पर भी उसे विचार जरूर करना होगा… इस क्षेत्र से आदिवासी महिला मीना सिंह ओबीसी रामखेलावन पटेल मंत्री बनाए गए.. लेकिन कई दिग्गज नेता इस दौड़ से बाहर हो गए थे… केदार शुक्ला खुद राजेंद्र शुक्ला का विरोध कर पार्टी बन चुके हैं.. लेकिन वो योग्यता अनुभव और वरिष्ठता के मापदंड सीता शरण का विकल्प साबित हो सकते हैं ..यदि इसी क्षेत्र के ही गिरीश गौतम ,नागेंद्र सिंह नागौद ,नागेंद्र सिंह गुड़ का समर्थन हासिल हुआ तो फिर केदार विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंच सकते हैं… जिस तरह राजेंद्र शुक्ल को कैबिनेट से दूर रखा गया उसके बाद उन्हें भी नाराज नहीं किया जा सकता।

विंध्य क्षेत्र से आदिवासी नेता कुंवर सिंह टेकाम जो शिवराज के प्रदेश अध्यक्ष रहते उनके टीम में महामंत्री थे और अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं का नाम भी चर्चा में जरूर आएगा… विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए विंध्य के बाद महाकौशल का दावा भी बनता है ..जहां से सबसे वरिष्ठ नेताओं में शुमार अजय विश्नोई के विवादित ट्वीट उनकी दावेदारी को कमजोर साबित कर सकते हैं.. महाकौशल के इस तेज तर्रार नेता के विद्रोही तेवरों को देखते हुए विधानसभा अध्यक्ष के नाम सहमति बनाना फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आती है ..तो मंत्री नहीं बन पाए गौरीशंकर बिसेन से लेकर नंदनी मरावी पूर्व विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी के पुत्र विधायक अशोक रोहाणी का नाम भी चर्चा में है.. सवाल क्या इस क्षेत्र से विधानसभा उपाध्यक्ष के लिए भाजपा गंभीर होगी.. जहां उपचुनाव की कोई मजबूरी नहीं है।

लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के प्रभाव वाले महाकौशल में भाजपा की मौजूदगी प्रभावी तौर पर दर्ज हो सकती है.. मालवा क्षेत्र से आधे दर्जन से ज्यादा लोगों पर मंत्री बनाए जाने के बाद विधानसभा उपाध्यक्ष के लिए यशपाल सिसोदिया का नाम गौर करने लायक है.. विधानसभा अध्यक्ष की तालिका में उनका नाम सबसे ऊपर रहा है.. संसदीय ज्ञान भी दूसरे विधायकों की तुलना में उनके पास ज्यादा है.. सीताशरण और केदार शुक्ला में से कोई अध्यक्ष बनता है और अनुसूचित जाति जनजाति का कोई योग्य चेहरा यदि भाजपा नहीं तलाश पाई तो यशपाल पर सहमति बन सकती है.. पार्टी के अंदर उनकी गिनती निष्ठावान समर्पित और मुख्यमंत्री के भरोसेमंद नेता के तौर पर होती है.. लेकिन इनका ठाकुर समाज का होना जिससे सबसे ज्यादा मंत्री बनाए गए हैं ..राह में रोड़ा साबित हो सकता है ..इस मालवा क्षेत्र से भाजपा को स्वर्गीय भेरूलाल पाटीदार के तौर पर अंतिम बार उपाध्यक्ष मिला था तो निमाड़ क्षेत्र से बृज मोहन मिश्रा इस जिम्मेदारी को निभा चुके हैं ..शिवराज मंत्रिमंडल में बुंदेलखंड का दबदबा साफ देखा जा सकता है।

लेकिन विधानसभा उपाध्यक्ष के लिए यदि पार्टी को किसी अनुसूचित जाति के नेता की तलाश होगी.. तो सागर जिले के प्रदीप लारिया पर भी पार्टी विचार गंभीरता के साथ कर सकती है.. लेकिन इसे उपचुनाव में जीत के लिए जरूरी सोशल इंजीनियर से जोड़ कर देखा जाएगा.. बुंदेलखंड के ही टीकमगढ़ जिले से इसी वर्ग विशेष से जुड़े पूर्व मंत्री हरिशंकर खटीक का नाम भी दौड़ में माना जा सकता.. लेकिन इस क्षेत्र के कई दूसरे कांग्रेस विधायकों के भाजपा में संपर्क में होने के कारण नई स्क्रिप्ट जो उपकृत करने से जुड़ा फैसला पार्टी सोच समझकर ही लेगी.. ग्वालियर चंबल क्षेत्र का मंत्रिमंडल में एकतरफा प्रतिनिधित्व जहां उपचुनाव होना है.. उस क्षेत्र से अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए किसी नाम पर विचार की संभावना कम ही नजर आती है।

भोपाल और आसपास के जिले से सबसे बड़ा नाम सीताशरण शर्मा का ही माना जा रहा ..यदि सीताशरण को अध्यक्ष बनाया गया तो फिर विंध्य के ब्राह्मण नेता केदार शुक्ला के लिए उपाध्यक्ष की कुर्सी भी बहुत दूर नजर आएगी .. क्योंकि दोनों ब्राह्मण समुदाय से जुड़े ..यही वह गुत्थी है जिसे भाजपा सुलझाने में जुटी है ..मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष ,संगठन महामंत्री इस पर लगातार विचार विमर्श कर रहे तो संसदीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा को भरोसे में लेकर फैसला भाजपा को लेना ही होगा ..कुल मिलाकर 20 जुलाई से शुरू होने जा रहे विधानसभा सत्र से पहले 18 /19 जुलाई तक भाजपा को अध्यक्ष के साथ उपाध्यक्ष के नाम पर सहमति बनाकर अपनी रणनीति को अंतिम रूप देना ही होगा।

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