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साहित्य में प्रेमचंद पर हमले लगातार!

Attacks on Premchand literature

हिन्दी में प्रेमचंद से बड़ा लेखक कौन है? इस पर बड़ी बहस बन सकती है। लेकिन अगर इसे इस तरह देखें कि हिन्दी में प्रेमचंद से ज्यादा हमले किस पर होते हैं, तो कोई विवाद नहीं होगा। एक ही नाम आएगा। प्रेमचंद का। अपने लेखन के दौरान से ही आज तक ऐसा कोई आरोप नहीं है जो उन पर नहीं लगा हो। Attacks on Premchand literature

क्यों? यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण है। वह इसलिए कि प्रेमचंद जनता के लेखक थे। गरीब, कमजोर, शोषित लोगों की आवाज। तो जाहिर है कि जो भी गरीब, कमजोर के शोषण में अपना या अपने समुदाय का, वर्गीय हित देखता है वह प्रेमचंद के खिलाफ होगा। तो जिसका बड़े लोगों द्वारा, समर्थ लोगों के द्वारा जितना विरोध वह उतना ही बड़ा लेखक।

राजनीति में जैसे गांधी और नेहरू का चरित्र हनन किया जाता है। वैसे ही साहित्य में प्रेमचंद का। हर साल खासतौर पर उनकी जयंती, पुण्य तिथि के मौके पर कोई न कोई शिगुफा उछाल दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि उन्हें याद नहीं किया जाता। दोनों मौकों पर साहित्यकारों से लेकर नेता तक उन्हें खूब श्रद्धाजंलियां देते हैं। मगर वे सब रस्मन और भावुक होती हैं। प्रेमचंद का मतलब समझने की ज्यादातर लोग कोशिश नहीं करते। नेहरू समझते थे। मिलते थे। उन्होंने अपनी मशहूर किताब “ लेटर्स फ्राम अ फादर टू हिज डाटर “ का हिन्दी अनुवाद प्रेमचंद से ही करवाया था। “ पिता के पत्र पुत्री के नाम “ से।

वे सारे पत्र नेहरु के लिखे हुए थे, बेटी इन्दिरा के नाम। लेकिन अब एक पत्र के बहाने ही जो कथित रूप से प्रेमचंद का बताया जा रहा है उन्हें महिला विरोधी घोषित किया जा रहा है। वैसे तो हर साल इस जाली पत्र की बात की जाती है। मगर उसका प्रचार करने वाले अधिकतर दक्षिणपंथी लोग होते हैं। जिनका प्रेमचंद विरोध जग जाहिर है। मगर इस बार एक लेखिका और कुछ लिबरल लोगों ने भी उस फर्जी पत्र के बहाने प्रेमचंद को स्त्री विरोधी घोषित करने की मुहिम चला दी। हिन्दी साहित्य में और हिन्दी भाषी समाज में जो इतनी महिला विरोधी सोच भरी पड़ी है, उसके खिलाफ बोलने के बदले वे एक ऐसे लेखक को निशाने पर ले रहे हैं जिसने जिन्दगी भर हाशिए पर पड़े लोगों पर लिखा। खुद आज से 116 साल पहले 1906 में बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया। क्या वे महिला समानता, सम्मान, शिक्षा के विरोधी हो सकते हैं? शिवारानी देवी को शादी के बाद पढ़ाया, बीए तक।

लेकिन इसे हिन्दी भाषी समाज के अन्तरविरोध कहें, कुंठित स्वभाव कहें या कुछ नया कहकर चमकना चाहना कि प्रेमचंद जिसने हिन्दी साहित्य को सबसे ज्यादा समृद्ध, आधुनिक मूल्यों से जोड़ा, प्रतिगामी मूल्यों से लड़े उन्हीं पर कभी महिला विरोधी तो कभी दलित विरोधी होने के आरोप लगा दिए जाते हैं।

फिलहाल बात जिस पत्र के बहाने प्रेमचंद को महिला शिक्षा विरोधी साबित करने की हो रही है। उस पत्र को उनके बेटे अमृत राय के संकलन चिट्ठी – पत्री में संकलित बताया गया है। लेकिन यह पत्र अमृत राय के संकलन में है ही नहीं। तो फिर इस पत्र का उल्लेख कैसे हो रहा है। यह दरअसल प्रेमचंद को हिन्दुत्ववादी साबित करने की कोशिश में मुद्दत से लगे कमल किशोर गोयनका ने अपनी किताब में छापा है।

गोयनका दावा करते हैं कि उन्होंने इसे प्रेमचंद का अप्राप्य पत्रों, साहित्य से खोजा है। मगर प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी, दोनों लेखक पुत्रों श्रीपत राय और अमृत राय के लिखे में कहीं इसका जिक्र नहीं है। यह हिन्दी में ही हो सकता है। क्या कोई कल्पना कर सकता है कि बांग्ला में रवीन्द्र नाथ टेगौर के बारे में कोई भ्रामक तथ्य रख दे। या तमिल के, मलयालम के किसी बड़े लेखक के बारे में? अंग्रेजी में शेक्सपियर के बारे में?

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मगर हमारे यहां हिन्दी जगत में सब संभव है। अभी कुछ समय पहले ही नामवर सिंह के बारे में उनकी जीवनी कहकर एक किताब आई थी। जिसमें उन्हें आरएसएस का सदस्य बता दिया गया था। बाद में लेखकों, लेखक संगठनों के बहुत विरोध करने के बाद उस किताब को वापस लिया गया। और सही करके फिर छापा गया। नामवर सिंह कोई मामूली हस्ती नहीं थे। हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष थे। आप कह सकते हैं जीते जी किवंदंती। मगर उनके बारे में भी गलत सुनकर, जानकर वह तथ्य लिख दिया जो कामन सेंस से भी समझ में आता है कि ऐसा नहीं हो सकता। वे घोषित रुप से प्रगतिशील थे। प्रगतिशील लेखक संघ( प्रलेस) के अध्यक्ष रहे थे। जबकि प्रेमचंद ने 1936 में इसकी स्थापना के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। उनका उस सम्मेलन में दिया वक्तव्य ही बाद में (प्रलेस) का घोषणा पत्र बना।

अभी तक इस विवाद पर प्रलेस का कोई बयान नहीं आया है। बाकी लेखक संगठनों का भी नहीं दिखा है। हमें याद है जब नामवर का विवाद हुआ था तब भी प्रलेस का कोई बयान नहीं आया था। हम इस पर लगातार लिख रहे थे तो इसके कार्यकारी अध्यक्ष जावेद अली को हमने फोन किया था। फिर प्रलेस ने नामवर को आरएसएस

का सदस्य बताने की निंदा करते हुए एक विस्तृत बयान भेजा था। जावेद अली अब नहीं रहे। उनकी सक्रियता और संघर्ष की याद आती है। कभी खूब सक्रिय रहने वाले लेखक संगठन भी अब कमजोर हुए हैं। विभाजन ने उन्हें और कमजोर किया है। प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जसम (जन संस्कृति मंच) तो प्रमुख हैं हीं। दलित लेखक संघ और कई अन्य लेखक संघ भी बन गए हैं। मगर पहले जो काम अकेला प्रगतिशील लेखक संघ कर लेता था उसका दसवां हिस्सा भी यह सब मिलकर नहीं कर पा रहे हैं।

अपने सबसे बड़े लेखक प्रेमचंद की प्रतिष्ठा को ही नहीं बचा पा रहे हैं। गोयनका का अजेंडा जारी है। और विडंबना यह कि उन्हें हिन्दी के सारे बड़े प्रकाशकों ने छापा है। उन्होंने भी जो खुद को प्रगतिशील कहते हैं।

किताबों के स्टोर प्रेमचंद पर गोयनका की संकलित की गई किताबों से भरी पड़ी हैं। गूगल का भी यही हाल है। लायब्रेरियों में भी खरीद उसी की होती है। नतीजा यह है कि अभी एक पत्रकार ने प्रेमचंद का हिन्दू मन लिख दिया।

यहां यह विडंबना देखिए कि अंग्रेजी राज के खिलाफ लड़ने वाले, अंग्रेजों के विरोध में अपनी सरकारी नौकरी छोड़ देने वाले, पत्नी शिवारानी के सत्याग्रह करते हुए जेल चले जाने पर कहने वाले कि कैसा दुर्भाग्य है कि अस्वस्थ होने के कारण यह मौका मुझे नहीं मिला प्रेमचंद को दलित विरोधी, महिला विरोधी, प्रोपोगंडा करने वाले, ब्राह्मण विरोधी, हिन्दू विरोधी, जातिवादी क्या क्या नहीं कहा गया? ऐसा होता कृतज्ञ समाज? या हम कृतघ्न समाज हैं। और ऐसा हाशिए के लोगों ने छुटपुट साहित्यकारों ने नहीं कहा। रामचन्द्र शुक्ल और नंद दुलारे वाजपेयी जैसे बड़े आलोचकों ने भी प्रेमचंद को प्रचारक, समाज सुधारक कहकर लेखक छोटा बताने की कोशिश की है।

दूसरी तरफ दक्षिणपंथी शक्तियां है। जो उन्हें अपनी तरफ खींचने की कोशिश करती है। मगर यह भूल जाती है कि भाजपा के पहले प्रधानमंत्री बनने के साथ ही प्रेमचंद को कोर्स से निकाल दिया गया था। वाजपेयी मंत्रिमंडल की सदस्य सुषमा स्वराज ने संसद में इस मुद्दे को उठाए जाने पर बड़े विद्रुप से कहा था कि क्या प्रेमचंद ही एकमात्र लेखक बचे हैं?

प्रेमचंद क्या थे? इसे गुरुदेव टेगौर ने समझा था। उनकी मृत्यु पर हिन्दी समाज को संबोधित करते हुए कहा था कि तुम्हें एक आदमी मिला था। जो वास्तव में तुम्हारी भाषा की शक्ति पहचानता था। ईश्वर ने उसे छीन लिया। तुम्हारी भाषा में बड़ी शक्ति, बड़ी संभावना है।

लेकिन इतने सालों बाद हमें लगता है कि हमारी भाषा में विवाद की, हमारे लेखकों में कीचड़ उछालने की बड़ी शक्ति, अनंत संभावना है। अभी गीताजंलि श्री को भारतीय भाषाओं में पहला अंतरराष्ट्रीय बुकर सम्मान मिलने पर कितना दुराग्रह सामने आया है। हिन्दी लेखिका हैं। हिन्दी के लिए गौरव की बात है। मगर उनके लिखे पर इतने सवाल उठाए गए और अब तो पुलिस रिपोर्ट, मुकदमे की धमकियां भी आईं कि उन्होंने अपनी किताब पर बातचीत के कार्यक्रम ही रद्द कर दिए। अभी आगरा में होने वाला उनका सम्मान समारोह स्थगित करनापड़ा।

है ना मजेदार! अन्तरराष्ट्रीय बुकर से उन्हें सम्मान मिल रहा है लेकिन हम उन्हें सम्मानित नहीं कर सकते।

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