Taliban's Deobandi Roots Afghanistan सावधान! तालिबान की देवबंदी जड़े
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सावधान! तालिबान की देवबंदी जड़े

Taliban's Deobandi Roots Afghanistan

अफगानिस्तान के लगभग शत-प्रतिशत मदरसे देवबंदी विचारधारा को मानने वाले हैं। ‘तालिब’ शब्द जो ‘तलबा’ से निकला है, उसका अर्थ ही होता है ‘छात्र’ और अधिकांश तालिबानी लड़ाके इन्हीं देवबंदी मदरसों के छात्र हैं। ….. इसलिए यह भारत के सभी नागरिकों का उत्तरदायित्व बनता है कि वे तालिबान के उदय से सचेत व सावधान रहें। भारत के उदार व पंथनिरपेक्ष मुसलमानों को इस्लाम की मनावीय एवं युगानुकूल छवि, व्याख्या व परिभाषा प्रस्तुत करनी होगी।… Taliban’s Deobandi Roots Afghanistan

तालिबानी आतंक, क्रूरता एवं बर्बरता की कहानी नई नहीं है। अपने अस्तित्व के प्रारंभिक वर्षों से ही निर्दोषों की हत्या, महिलाओं के उत्पीड़न, ऐतिहासिक-सांस्कृतिक प्रतीकों के विध्वंस, गैर-मुस्लिमों के साथ अमानवीय एवं अपमानजनक व्यवहार का उनका इतिहास रहा है। उनके काले कारनामों और क्रूरताओं पर पर्याप्त लेखन किया जा चुका है। उनके सामाजिक-राजनीतिक कारणों की गहन पड़ताल की जा चुकी है। विगत पाँच दशकों से अफगानिस्तान में ज़ारी हिंसा एवं आतंक पर इसे या उसे ख़ूब दोषी ठहराया जा चुका है। तालिबानियों को मिलने वाले राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण एवं समर्थन पर भी अत्यधिक प्रकाश डाला जा चुका है। परंतु जिस बात पर विद्वत जगत और विश्व-समाज एकदम मौन साध जाता है, वह है तालिबान या तालिबान जैसी शक्तियों का इस्लाम से बीज-वृक्ष का गहरा संबंध या नाता। हिंसा, कट्टरता और गैर-मुसलमानों के प्रति घृणा के बीज इस्लामिक विचारों में मूलतः समाविष्ट हैं। कुरान, हदीस और सीरा को मिलाकर शरीयत का क़ानून या इस्लाम का राज्य क़ायम करना तालिबान या किसी भी इस्लामिक सत्ता-संगठन का लक्ष्य या यों कहें कि स्वप्न होता है।

शरीयत के क़ानून में 14 प्रतिशत कुरान, 70 प्रतिशत हदीस और 16 प्रतिशत सीरा है, सीरा और हदीस को मिलाकर ही सुन्ना बनता है। यानी पैगंबर मोहम्मद की जीवनी, उनके संघर्ष, उनके सिद्धांत आदि। मुख्य बात यह है कि तालिबान या किसी भी जिहादी सत्ता-संगठन की जब बात होती है तो उसे चंद भटके हुए अंध-कट्टर लोगों का समूह बताकर सतही-सरलीकृत आकलन-विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है। उसमें यह तथ्य बड़ी चतुराई से छुपा लिया जाता है कि वस्तुतः हिंसा, कट्टरता, पृथक पहचान, बलात मतांतरण, विस्तार एवं वर्चस्व की प्रवृत्ति, दारुल हरब से दारुल इस्लाम की दिशा में निरंतर प्रयत्न , नाना प्रकार के ज़िहाद, मज़हब के लिए अनेकानेक छल-प्रपंच आदि काफ़िर-कुफ़्र पर आधारित इस्लामी सिद्धांत या मान्यताओं के मूल में बीज-रूप में मौजूद हैं।

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उनके भाईचारे में गैर-मुसलमानों के लिए रंच-मात्र स्थान नहीं है। न केवल ग़ैर-मुसलमानों के प्रति उनमें स्वाभाविक दुराव है, अपितु आपस में भी वे अधिक सच्चे, अधिक पक्के मुसलमान और इस्लामी प्रतीक-पहचान के सबसे बड़े प्रस्तोता-पैरोकार-प्रवर्त्तक को लेकर सदैव संघर्ष छेड़े रहते हैं। वे इस बात को लेकर 7 वीं शताब्दी से लगातार आपस  में ही लड़ते रहे हैं कि उनमें से इस्लाम का अधिक सच्चा योद्धा या मुजाहिद कौन है? और यही बात उनके अनुयायियों या मुरीदों में भी है। 72 से भी अधिक फ़िरक़े और उनके बीच होने वाले सतत ख़ूनी संघर्ष इसकी गवाही देते हैं। एक पंथ, एक ग्रंथ, एक प्रतीक, एक पैगंबर के अलावा उनके यहाँ अन्य कोई स्वीकार नहीं है। वे कभी मानते ही नहीं कि उनकी मान्यता से इतर सत्य एवं ईश्वर का कोई भिन्न स्वरूप भी हो सकता है। संघर्ष का मूल कारण यही है। भिन्न सोचने, भिन्न कहने की वहाँ बिलकुल स्वतंत्रता नहीं है। उनका सारा चिंतन, सारा ज्ञान छठी-सातवीं शताब्दी में कही गई बात को सत्य एवं प्रामाणिक सिद्ध करने तक सीमित है। वे एक बिंदु पर ठहर-से गए हैं। यह शोध का नहीं, अपितु मान्य विषय है कि मज़हब के नाम पर मुसलमानों ने ही मुसलमानों का ख़ून सबसे अधिक बहाया है।

मज़हबी अंधता व कट्टरता के कारण जो अपनों का गला रेतने, ख़ून बहाने में संकोच नहीं करते, उनके लिए औरों के जान की क्या क़ीमत होगी? यह अकारण नहीं है कि 7 वीं शताब्दी के मुहम्मद बिन कासिम से लेकर मुल्ला उमर व मुल्ला बारादर तक हर इस्लामिक आक्रांता या सत्ता-संगठन के स्वप्न, आदर्श, उद्देश्य, प्रकृति, प्रवृत्ति और ग़ैर-मुसलमानों के प्रति उनके दृष्टिकोण एक जैसे रहे। उनमें समय के साथ कोई परिवर्तन नहीं आया है। तथ्य और प्रमाण यही कहते हैं कि हर दूसरा इस्लामिक आक्रांता-सत्ता-संगठन पहले से अधिक क्रूर, हिंसक आक्रामक एवं आधुनिक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर अन्य मतावलंबियों एवं निरीह-निर्दोष-निःशस्त्र जनों  पर हमलावर रहा है।

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उल्लेखनीय है कि वे भले ही इस्लाम को लेकर आपस में लड़ते रहें हों, पर ‘इस्लाम ख़तरे में है’ का नारा उनके अनुयायियों को सदैव आकर्षित एवं संगठित करता है। उसे लेकर वे शीघ्र आंदोलित हो उठते हैं। ऐसे नारा लगाने वाले या आह्वान करने वाले भले ही उनके परिवेश-पृष्ठभूमि-संस्कृति से कोई नाता नहीं रखते हों, भले ही उनकी जीवन-शैली भिन्न हो, वाणी-व्यवहार भिन्न हो, पर वे अंततः उन्हीं के साथ जाएँगें, जो शरीयत का कानून या इस्लाम का राज स्थापित करने का उन्हें स्वप्न और आदर्श देते हों। हमने इराक़-ईरान-कजाकिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-बांग्लादेश-सीरिया से लेकर मुस्तफ़ा कमाल पाशा के सेकुलर तुर्की तक में यही कहानी दुहराए जाते देखी और इन सबके बावजूद यदि हम सत्य नहीं कह पा रहे तो यह धूर्त्तता, कायरता या शुतुरमुर्गी मानसिकता ही कहलाएगी।

तालिबान इस्लाम का राज्य और शरीयत का क़ानून लागू करने के लिए अफगानिस्तान में गत तीन दशकों से अधिक समय से सक्रिय है। रूस और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश वहाँ से पलायन कर गए। स्वयं अफ़गानी लोगों ने उनके समक्ष लगभग आत्मसमर्पण कर दिया। कुछ तो अपने परिजनों को छोड़कर भाग खड़े हुए। क्योंकि वे जानते हैं कि ज़िहादी कट्टरता लहू की तरह उन तालिबानी लड़ाकों की रग़ों में उतारा गया है। उन मुजाहिदीनों को भयावह ग़रीबी व भुखमरी में जीना स्वीकार है पर मज़हबी ज़िद और जुनून से बाहर निकलना नहीं। वे लड़ते रहेंगें, तब तक,  जब तक उनके कथित शरीयत का क़ानून लागू न हो जाए, जब तक दुनिया का अंतिम व्यक्ति भी इस्लाम क़बूल न कर ले! वे लड़ते रहेंगें, क्योंकि उनका विस्तारवादी-वर्चस्ववादी कट्टर इस्लामी चिंतन उन्हें लड़ने की दिशा में उत्प्रेरित करता है। मदरसों और मस्जिदों में छोटे-छोटे बच्चों के दिल-दिमाग़ में कूट-कूटकर यह (अ)ज्ञान भरा जाता है कि यदि वे मज़हब के लिए लड़ते हुए कुर्बान हुए तो माले-ग़नीमत के हिस्सेदार होंगें और मारे गए तो जन्नत में 72 हूरें उनकी प्रतीक्षा कर रही होंगीं, जो अक्षत यौवना होंगीं, जहाँ मदिरा का निर्झर प्रवाहित हो रहा होगा, जहाँ तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजन-पकवान, रसीले फल-फूल-द्रव्य से उनका स्वागत किया जाएगा। जो-जो उन्हें इस धरती पर नहीं नसीब हुआ, वह सब जन्नत में नसीब होगा। एक ही दिशा में सोचने के लिए प्रेरित-अनुकूलित कर उनकी स्वतंत्र चिंतन-मनन-विश्लेषण की चेतना कुंद कर दी गई है। मज़हबी तालीम के द्वारा बाल-वृद्ध-युवा, स्त्री-पुरुष सबमें ज़िहाद का यह ज़हरीला जुनून पैदा करने का निरंतर प्रयास किया गया है। उन्हें ज़िहाद और जन्नत का सपना थमाकर एक काल्पनिक संसार में भटकने व लड़ने-मरने के लिए छोड़ दिया गया है। अब ऐसों से भला कोई सभ्य समाज कब तक लड़ता रहेगा? प्रश्न यह है कि कितने ऐसे विद्वान या विश्लेषक हैं, जिन्होंने तालिबान की उत्पत्ति के मूल कारणों पर प्रकाश डाला? क्या मूल को छोड़कर तने-पत्ते-शाखाओं का उपचार करने से समस्या का समाधान संभव है?

यह चिंतनीय है कि तालिबान का उद्गम-स्थल भारत का देवबंद है। न केवल तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर की पूरी शिक्षा-दीक्षा देवबंद में हुई, बल्कि 1866 में मोहम्मद कासिम और राशिद अहमद गानगोही ने उत्तरप्रदेश के देवबंद में जिस दारुल उलूम नामक मदरसे की स्थापना की थी, उसका उद्देश्य ही भारत में इस्लाम के शासन व राज्य की पुनर्स्थापना था और   ध्यान रहे कि अफगानिस्तान के लगभग शत-प्रतिशत मदरसे देवबंदी विचारधारा को मानने वाले हैं। ‘तालिब’ शब्द जो ‘तलबा’ से निकला है, उसका अर्थ ही होता है ‘छात्र’ और अधिकांश तालिबानी लड़ाके इन्हीं देवबंदी मदरसों के छात्र हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि ‘गजवा-ए-हिंद’ इस्लाम का पुराना सपना है। इसलिए यह भारत के सभी नागरिकों का उत्तरदायित्व बनता है कि वे तालिबान के उदय से सचेत व सावधान रहें। भारत के उदार व पंथनिरपेक्ष मुसलमानों को आगे आकर पुरज़ोर शब्दों में तालिबान-समर्थित इस्लाम का खंडन करते हुए इस्लाम की मनावीय एवं युगानुकूल छवि, व्याख्या व परिभाषा प्रस्तुत करनी चाहिए। यदि हम उदार, प्रगत, तार्किक, सहिष्णु व वैज्ञानिक विश्व एवं सामाजिक परिवेश चाहते हैं तो हमें किसी भी मत-पंथ-सिद्धांत के मूल में व्याप्त घृणा व कट्टरता का मुखर विरोध करना होगा, उसमें सुधार और परिवर्तन की माँग तेज़ करनी होगी। इस्लामिक जगत पृथक पहचान व भिन्न अस्मिता पर जैसा विश्वव्यापी विमर्श और आंदोलन छेड़े रहता है, क्या यह समयोचित नहीं होगा कि हिंसा-कलह-आतंक से पीड़ित विश्व-मानवता के त्राण के लिए वह सुधारवादी विमर्श और अभियान चलाए? मुस्लिम-समुदाय को तो इसलिए भी यह पहल करनी चाहिए, क्योंकि उन्होंने इस हिंसा, कट्टरता, संघर्ष व आतंक की सर्वाधिक क़ीमत चुकाई है।

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