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राज के राजद्रोह कानून पर रोक

supreme court

गांधीजी यहां तक कह जाते हैं – “अगर हमारे राजकर्ता जो कर रहे हैं आपकी राय में वह गलत है तो आप कर्तव्य के तौर पर उसका विरोध करते हुए कह, व सुना सकते हैं। फिर बेशक वे मानें की आप राजद्रोह कर रहे है। आपको उसके संकट की शक्ति सहने के साथ राजद्रोह करने को कहूंगा। फिर उसके परिणाम सहने के लिए भी तैयार रहना होगा।“ 

आज न तो राज है न ही कोई राजा। न राजतंत्र है और न ही राजशाही। राज पच्छत्तर साल पहले श्रीमुख हो गया था। आज लोक का तंत्र है और प्रधान सेवक हैं। मगर अंग्रेजों द्वारा भारतीय दंड संहिता में लाया गया राजद्रोह कानून चलता आ रहा था। राज के द्वारा बनाई गई न्याय व्यवस्था अभी तक राजद्रोह कानून के होने का औचित्य ढूंढ रही थी। तब जब हिंदुस्तान में स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। सरकार के ढीलम-ढाल रवैए के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए राज के इस राजद्रोह कानून पर रोक लगा दी है। देश अब राजतंत्र के कानून से स्वतंत्र हुआ है। लेकिन देश की सत्ता क्या जनता पर राज करने की लालसा से मुक्त  हो सकती है?

जनता पर राज करना ही सत्ताधीशों का ध्येय रहा है। जनता को वोट बैंक मानकर, उनको फिर से अपनी सत्ता के लिए झोंकना और चलाना ही राजनीति का नया तरीका है। सत्ताएं अपने हिसाब से इस कानून का इस्तेमाल करती आ रही थी। कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस पर रोक लगाने की अपनी मंशा बता दी थी। सरकार टालमटोल कर रही थी। विधायिका के सामने इसकी समीक्षा करने का आग्रह कर रही थी। आज थोपे जा रहे देशभक्ति के महौल में इस राज से आए राजद्रोह कानून का दुरूपयोग बढ़ रहा था। सरकार की कोशिश थी कि विधायिका कानून की फिर से समिक्षा करे। और कानून पर रोक टाली जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट पर भी जनता के हित में फैसला लेने की जवाबदेही थी।

महात्मा गांधी ने हिंदुस्तान को अंग्रेजों से स्वतंत्र कराने की आशा के साथ हिंदुस्तान के लोगों की सामाजिक, रचनात्मक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता की आशा बनाई थी। हर हिंदुस्तानी अपने कर्तव्य समझते हुए अपने को अभिव्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हो। गांधीजी ने ही याद दिलाया था कि कोई भी कानून नहीं कहता कि आपको ऐसा करना ही होगा। कानून तो सिर्फ यह कहते हैं कि अगर आप ऐसा नहीं करते तो आपको सज़ा होगी। इसलिए कोई भी कानून अगर गलत लगता है तो उसका विरोध जोश में, सज़ा भुगतने के होश के साथ होना ही चाहिए।

गांधी जी ने राजद्रोह कानून के सख्त विरोध में यंग इंडिया में लिखा था – “मैंने माना है कि कानून का स्वेच्छा से पालन करना हमारा कर्तव्य हैः मगर करते हुए मैंने देखा है कि ये कानून जब असत्य पोसने लगते हैं तो इनको न मानने का भी हमारा कर्तव्य बनता है।“ आगे तो गांधीजी यहां तक कह जाते हैं – “अगर हमारे राजकर्ता जो कर रहे हैं आपकी राय में वह गलत है तो आप कर्तव्य के तौर पर उसका विरोध करते हुए कह, व सुना सकते हैं। फिर बेशक वे मानें की आप राजद्रोह कर रहे है। आपको उसके संकट की शक्ति सहने के साथ राजद्रोह करने को कहूंगा। फिर उसके परिणाम सहने के लिए भी तैयार रहना होगा।“

राजद्रोह कानून सत्तरहवीं शताब्दी के इंग्लैंड में लाया गया था। कानून राजा और राज्य को जनता के विरोध और आंदोलन से बचाने के लिए था। फिर अंग्रेजों ने अपना राज चलाए रखने के लिए हिंदुस्तान की जनता पर राजद्रोह कानून थोपा। पहले गोपालकृष्ण गोखले और फिर गांधी तक को इसमें सजा सुनाई गयी थी। सन् 1947 में स्वतंत्र होने, और राजतंत्र खत्म होने के बाद भी कानून को अपने अपने अनैतिक कारणों से सरकारें चलाती आ रही थीं। सांप्रदायिक होते समय में इसका इस्तेमाल बढ़ता ही रहा है। सभ्य समाज के सेवाभावी वकीलों का दबाव सत्ता और सुप्रीम कोर्ट पर बढ़ता ही गया।

सवाल है कि क्या हिंदुस्तान में 162 साल पहले बनी भारतीय दंड संहिता से पहले न्याय नहीं होता था? तो फिर इस देशभक्ति विरोधी राजद्रोह कानून पर फैसले में पच्छत्तर साल क्यों लगे? सुप्रीम कोर्ट और सरकार दोनों को साधुवाद। देर आए, मगर दुरूस्त ही आए।

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