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संघ की ‘पहली प्रयोगशाला’ पर गांधी परिवार की नजर..!

संघ की पहली प्रयोगशाला माने जाने वाले मध्य प्रदेश पर क्या गांधी परिवार की नजर टिक गई है.. जिस मोर्चे पर राहुल प्रियंका और कांग्रेस लड़ती हुई नजर आ रही क्या मध्यप्रदेश उसे एक नया रास्ता दिखा सकता है..

मध्यप्रदेश संघ की पहली प्रयोगशाला इसलिए भी है क्योंकि 1925 में संघ के गठन के समय मध्यप्रदेश का बड़ा हिस्सा तबके सेंट्रल प्रोविंस का भाग था.. सरसंघचालक रहे डा. हेडगेवार, बालासाहब देवरस और भुस्कुटे जी का कार्यक्षेत्र भी जबलपुर, बालाघाट, टिमरनी आदि रहा । देश के दूसरे राज्यों की तुलना में कभी अविभाजित मध्य प्रदेश रहते जनसंघ के सबसे ज्यादा विधायक जीत कर आए थे.. यहां संघ ने वनवासी कल्याण परिषद के जरिए जनजाति वर्ग पर अपनी पकड़ मजबूत बनाएं जिसका फायदा जनसंघ और भाजपा को चुनाव में मिला.. संघ के दूसरे अनुषांगिक संगठनों में भी विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई.. कुशाभाऊ ठाकरे जी ,सुदर्शन जी , भैया जी जोशी , सुरेश सोनी की कर्म भूमि भी यही क्षेत्र रहा.. गांधी परिवार की मध्यप्रदेश पर कुछ अलग नजर तो आखिर क्यों यह सवाल इसलिए क्योंकि भारत जोड़ो यात्रा पर निकले राहुल गांधी के इस पड़ाव पर यदि उनकी बहन कांग्रेस की महासचिव और नेहरू गांधी परिवार के एक और ग्लैमरस चेहरे प्रियंका गांधी की भी एंट्री इसी मध्य प्रदेश में होती है.. वह भी तब जब यात्रा दक्षिण भारत से होती हुई महाराष्ट्र की सीमा से निकलकर निमाड़ -मालवा क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी .. यह पहला मौका होगा जब नेहरू- गांधी परिवार के बाहर पार्टी को लंबे अरसे बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर मल्लिकाअर्जुन खड़गे भी राहुल के साथ पहली बार डॉक्टर अंबेडकर की जन्मस्थली महू में एक सभा के मंच पर नजर आने वाले हैं..

सोनिया गांधी के कर्नाटक में इस यात्रा का हिस्सा बनने के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे और राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका राहुल के साथ कदमताल कर रहे होंगे.. प्रियंका गांधी अपने पति रॉबर्ट वाड्रा और पुत्र रेहान के साथ यहां पहुंची.. इस यात्रा को अभी तक भले ही चुनावी एजेंडे और वोट मांगने से जोड़कर देखने पर पार्टी नेतृत्व स्पष्टीकरण देता रहा.. लेकिन महाराष्ट्र की धरती से यात्रा के अंतिम दौर में सावरकर का मुद्दा जोर-शोर से उठाने वाले राहुल अब खुलकर मध्यप्रदेश में भी पॉलीटिकल एजेंडा सेट करते हुए देखे जा सकते हैं.. चाहे वह उनका उद्बोधन उसकी टाइमिंग स्थान विशेष पर वनवासी- आदिवासी की असली नकली और पहला अधिकार की बहस हो या डॉ अंबेडकर किस संविधान निर्माण और उसमें कांग्रेस की भूमिका की याद दिलाना ही क्यों न हो.. राहुल ने समय परिस्थितियां और माहौल में खुद को वेशभूषा के साथ बदल लेने की लाइन को अपना लिया है ..जो खासतौर से आदिवासी रंग में रंगे नजर आने लगे है.. तो नफरत की राजनीति से देश को बचाने के साथ अपनी और कांग्रेस की चिंता किसान, दलित वर्ग के साथ बेरोजगारी से त्रस्त युवा के भविष्य पर जता रहे है.. मध्य प्रदेश के 2 ज्योतिर्लिंग ओमकारेश्वर और महाकाल के दर्शन के साथ राहुल ऐतिहासिक पौराणिक महत्व को रेखांकित करने वाली मां नर्मदा जिसे मध्य प्रदेश की जीवन रेखा भी कहा जाता उसमें भी स्नान करेंगे.. अभी तक भारत जोड़ो यात्रा का पड़ाव बन चुके दूसरे राज्यों की तुलना में कांग्रेस की बदलती रणनीति कुछ सवालों के साथ सोचने को मजबूर करती है..

बढ़ती दाढ़ी के बीच माथे पर लाल टीका क्या हिंदुत्व की सियासत के लिए संतुलन बनाने की कोशिश या फिर समझदारी राहुल पूरी तरह सतर्क और सजग नजर आ रहे हैं.. जब देश की नजर गुजरात हिमाचल विधानसभा चुनाव और उसके परिणामों पर आकर टिक गई है.. चर्चा यह भी शुरू हो चुकी है कि कांटे के मुकाबले के चर्चा के बावजूद गुजरात और हिमाचल यदि भाजपा जीतने में सफल रही तो क्या राहुल की यात्रा पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया जाएगा.. तब बड़ा सवाल कश्मीर तक पहुंचने से पहले क्या कांग्रेस से ज्यादा नेहरू गांधी परिवार एक नई सोच के साथ नई संभावनाएं मध्यप्रदेश में तलाशने में जुट चुका है.. इलाहाबाद से लेकर फूलपुर ,सुल्तानपुर, अमेठी, रायबरेली को अपना चुनावी क्षेत्र बनाते रहे इस परिवार ने समय-समय पर वायनाड से पहले बेल्लारी यानी दक्षिण का भी रुख किया है.. तो यहीं पर यह सवाल खड़ा होना लाजमी है क्या गांधी परिवार मध्यप्रदेश में अपने लिए नई जमीन तलाश रहा है.. जिससे नई पीढ़ी के नवनिर्माण में प्रियंका का चेहरा मध्यप्रदेश में स्थापित कर कांग्रेस नई संभावनाएं तलाश सके.. जिसने हमेशा संघ को निशाने पर लिया और उस संघ के लिए मध्यप्रदेश पहली प्रयोगशाला माना गया.. लगातार मोदी शाह, और कुछ उद्योगपति के साथ संघ को अपने निशाने पर लेने वाले राहुल गांधी क्या चुनावी चुनौतियों को गंभीरता से नहीं ले रहे..या फिर नेहरू गांधी परिवार से संगठन को बाहर निकाल कर राहुल अब मध्य प्रदेश से एक साथ कई सियासी हित साधने की जुगत में है.. स्पष्टता और जरूरी रणनीति के अभाव में यह दूर की कौड़ी.. फिर भी सवाल क्या प्रियंका गांधी देश के दिल ह्रदय प्रदेश मध्य प्रदेश से चुनाव लड़ कर दूरगामी सियासी हित साधने की संभावनाओं को तलाश रही है.. सड़क पर भीड़भाड़ .. हो हल्ला नई तस्वीरों के साथ जोश खरोश और बदलते माहौल में क्या यह प्रियंका का साइलेंट मूव है.. क्योंकि बदलते राजनीतिक परिदृश्य में इस परिवार के लिए उत्तर प्रदेश में लगातार चुनौती बढ़ती जा रही है..

जहाँ प्रियंका की मेहनत के अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सके.. राहुल गांधी पहले ही वायनाड से चुनाव लड़ने को मजबूर हुए वह बात और उनका यह प्रयोग सफल भी रहा.. चुनाव जीतने के बाद दक्षिण भारत में भारत जोड़ो यात्रा के जरिए राहुल ने एक नई बिसात जरूर बिछाई है.. जब कई राज्यों जिसमें उत्तर प्रदेश बिहार जैसे राज्य शामिल जहां क्षेत्रीय दल कॉन्ग्रेस को पैर नहीं जमाने दे रहे .. तो दूसरे हिंदी भाषी क्षेत्र में मोदी- शाह के गुजरात से उन्हें चुनौती देने का फिलहाल सवाल ही खड़ा नहीं होता.. मोदी को भी गुजरात से बाहर निकलकर उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ना पड़ा तभी माहौल बना था.. ऐसे में कांग्रेस के लिए जहां ज्यादा संभावनाएं उसमें मध्य प्रदेश जहां भाजपा संघ के साथ सीधे दो-दो हाथ करने से पहले कांग्रेस के लिए पार्टी के अंदर से चुनौतियां अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.. इसके अलावा छत्तीसगढ़ जहां उसकी सरकार स्थिर है.. लेकिन यह छोटा राज्य बड़ा मकसद हासिल करने में निर्णायक भूमिका शायद नहीं निभा सकता.. राजस्थान में कांग्रेस ने अपनी मजबूती साबित की है लेकिन जातीय समीकरण और पार्टी के अंदर पुरानी नई पीढ़ी की टकराहट शायद ही राहुल प्रियंका की प्राथमिकता में शामिल हो पाए.. रह रह कर अशोक गहलोत और सचिन पायलट की तनातनी सामने आती रही है.. गहलोत समर्थकों ने तो हाईकमान उनके पर्यवेक्षक को भी चुनौती दे दी थी.. दिल्ली, हिमाचल जैसे राज्यों की तुलना में भी मध्य प्रदेश वह राज्य जहां कई छोटे क्षेत्रीय दलों की सक्रियता के बावजूद कांग्रेस की मतदाताओं के बीच पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. गुजरात में गोधरा के बाद ध्रुवीकरण और कट्टर हिंदुत्व की राजनीति का तोड़ कांग्रेस चाह कर भी नहीं तलाश पाई है.. तो राम मंदिर आंदोलन के साथ उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व पर सियासत ने भाजपा को एक नई ऊंचाई दी है .. चर्चित गुजरात मॉडल की चर्चा से पहले संघ की पहली प्रयोगशाला मध्य प्रदेश को ही माना जाता रहा है ..जहां संघ से लेकर जनसंघ और भाजपा ने विचारधारा की लड़ाई को सकारात्मक तौर पर मजबूत संगठन और कैडर के दम पर पार्टी को हमेशा नई दिशा दी..मध्य प्रदेश ने इंदिरा -संजय गांधी के युग में कमलनाथ को आदिवासी बाहुल्य छिंदवाड़ा क्षेत्र में ना सिर्फ ठिकाना भी दिया..

बल्कि मध्य प्रदेश की राजनीति में वो किंगमेकर से किंग भी बनाए गए..29 लोकसभा सीटों वाले मध्यप्रदेश में कमलनाथ के बाद पार्टी को अभी भी नए युवा चेहरे की तलाश है.. जो ज्योतिरादित्य सिंधिया की कमी की भरपाई कर सके.. आदिवासी वोट बैंक पर इंदिरा, राजीव, सोनिया युग में लंबे समय तक कांग्रेस की मजबूत पकड़ साबित होती रही.. राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते कांग्रेस का 15 साल का सियासी वनवास भी यदि खत्म हुआ तो उसमें आदिवासी मतदाताओं ने बड़ी भूमिका निभाई थी.. राहुल गांधी से लेकर प्रियंका गांधी इसी आदिवासी समुदाय पर पार्टी की प्रभावी पकड़ को गलती सुधार के साथ और दुरुस्त कर लेना चाहते हैं.. राहुल गांधी का टंट्या भील की समाधि पर जाना और आदिवासियों को यह कहकर समझाइश देना कि वह देश के असली मालिक है .. भगवाधारी जिन्हें वनवासी बताकर उन्हें जंगल तक सीमित करना चाहते है.. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का आदिवासियों के बीच तीर कमान संभालकर निशाना लगाना, परंपरा, रीति रिवाज की याद ताजा कर आत्मीय रिश्तो और भरोसे को मजबूत करने की कवायत ही मानी जा रही.. जो प्रचार प्रसार के मोर्चे पर फिलहाल मीडिया की हेड लाइन और कवरेज के लिए फोटो सेशन की जरूरी रणनीति का भले ही हिस्सा माना जा रहा .. फिर भी कॉन्ग्रेस के सियासी संदेश दूर तक पहुंचाने की उनकी कोशिश को भी नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता.. यह कहने वाले भी खूब मिल जाएंगे कि फिलहाल नित नई चुनौतियों के बीच ये नई संभावनाएं कांग्रेस के लिए बहुत दूर की कौड़ी साबित हो सकती है.. लेकिन इस सच को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि गांधी परिवार को उत्तर प्रदेश से बाहर एक ऐसे राज्य की तलाश है.. जहां क्षेत्रीय दलों से हटकर उसका सीधा मुकाबला भाजपा और संघ से हो.. 2024 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस चुनौती से निपटने का जोखिम लेने की राहुल प्रियंका की मंशा से इनकार नहीं किया जा सकता.. जिस मध्यप्रदेश ने संघ को सरसंघचालक के तौर पर सुदर्शन से लेकर सह सरकार्यवाह भैया जी जोशी, सुरेश सोनी जैसे राष्ट्रीय पदाधिकारी दिए..

जहां राजमाता विजय राजे सिंधिया से लेकर संगठन शिल्पी के तौर पर कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल और प्रधानमंत्री के तौर पर देश संभालने वाले अटल बिहारी बाजपेई से लेकर उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान जैसे जन नेताओं ने समय-समय पर मध्य प्रदेश को एक नई ऊंचाई दी.. मध्यप्रदेश में मोदी शाह से निपटने से पहले कांग्रेस के नेता और राष्ट्रीय नेतृत्व को शिवराज से निपटना होता है.. जहां भाजपा में शिवराज फेक्टर 2018 छोड़ दे तो कांग्रेस पर भारी साबित होता रहा.. यहां भाजपा पर सरकार नहीं चला पाने अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने का आरोप लगता रहा है.. लेकिन सेकुलर शिवराज ने समय के साथ चुनौतियों को चिन्हित कर अपनी मेहनत विनम्रता, बेहतर मैनेजमेंट और जन हितेषी नीतियों के दम पर सरकार में रहते सरकार फिर बनाई.. चाहे अटल आडवाणी का योग हो या मोदी शाह की बदलती भाजपा या फिर संघ की अपेक्षाएं और महत्वाकांक्षी अपनी पार्टी के नेता सभी को साध कर शिवराज ने अपनी लाइन आगे बढ़ा कर एक नई नजीर पेश की है.. इस मध्यप्रदेश में कांग्रेस के रविशंकर शुक्ल और डीपी मिश्रा से लेकर श्यामाचरण शुक्ल, विद्याचरण शुक्ल प्रकाश चंद्र सेठी के बाद अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह जैसे महारथियों ने लंबे समय तक सरकार चलाई और पार्टी को ताकत दी…..

यहां ढलती उम्र में कमलनाथ जैसे नेता के पास भले ही कांग्रेस के सारे सूत्र हो ..जिन्होंने राहुल गांधी की यात्रा को मध्यप्रदेश में यादगार साबित करने का संकल्प भी लिया है.. लेकिन 2023 और 2024 के बाद कांग्रेस के नाथ का विकल्प तलाशने और तराशने का काम भी इस यात्रा के साथ काम शुरू हो चुका है.. भले ही दिग्विजय सिंह और कमलनाथ की केमिस्ट्री राहुल गांधी के साथ उनकी मजबूत नजर आ रही हो.. लेकिन भविष्य की कांग्रेस के लिए जरूरी नए युवा चेहरों की पहचान का काम भी इस यात्रा के साथ आगे बढ़ सकता है.. दिग्विजय सिंह की राहुल गांधी के इर्द-गिर्द मध्य प्रदेश के नेता और कार्यकर्ता की जमावट कमलनाथ पर उनको भारी साबित करती है.. कमलनाथ की स्वीकार्यता के कारण दूसरे कई और क्षत्रपों सुरेश पचौरी ,अजय सिंह, अरुण यादव कांतिलाल भूरिया को भी एक चुनाव और लड़ने का मौका मिल चुका है.. मध्य प्रदेश का मिजाज कुछ अलग जहां आज भी महानगरों में भाजपा की मजबूत जड़ों के कारण कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और कांग्रेस में रहते ज्योतिरादित्य जैसे नेता भी कांग्रेस के लिए महानगर से दूर अपनी संभावनाओं को तलाशने को मजबूर हो चुके हैं..

कमलनाथ ने छिंदवाड़ा को स्थानीय ठिकाना बनाकर पहले केंद्र की राजनीति लंबे समय तक की और अब मध्य प्रदेश छोड़ने को तैयार नहीं है.. ऐसे में गांधी परिवार खासतौर से प्रियंका गांधी के लिए नए लोकसभा क्षेत्र की तलाश यदि इस यात्रा के साथ शुरू हो जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.. समय-समय पर कांग्रेस के नेता प्रियंका को मध्य प्रदेश से राज्यसभा में भेजे जाने के साथ लोकसभा चुनाव लड़ने की मांग भी करती रहे.. ऐसे में राहुल गांधी के साथ मध्यप्रदेश की धरती से प्रियंका का यात्रा के दौरान कदमताल एक नया सवाल खड़ा कर चुका है..क्या नेहरू गांधी परिवार कांग्रेस के परंपरागत आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए प्रियंका को नया चेहरा बनाकर चुनाव में सामने लाया जा सकता है.. मोदी – शाह के साथ योगी के कट्टर हिंदुत्व के चलते उत्तर प्रदेश में जब अखिलेश की समाजवादी पार्टी से लेकर मायावती की बसपा तक कांग्रेस से रिश्तो की कड़वाहट सियासी प्रतिद्वंदिता को जब नई धार दे रही है .. जहां लोकसभा चुनाव से पहले राम मंदिर निर्माण का काम पूरा होकर भव्य मंदिर का उद्घाटन देश के साथ उत्तर प्रदेश की राजनीति को एक नई दिशा दे सकती.. तब क्या गांधी परिवार का नया चेहरा प्रियंका को चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाने के लिए यदि एक नए सुरक्षित ठिकाने के साथ लोकसभा सीट की दरकार होगी तो क्या वह मध्य प्रदेश की कोई सीट होगी.. जो बदलती परिस्थितियां और नई चुनौती के बीच प्रियंका को परंपरागत उत्तर प्रदेश की सीट से बाहर एक नए राज्य में नई संभावनाएं तलाशने को मजबूर करेगी.. संघ से सीधे दो-दो हाथ करने को अपनी पहली प्राथमिकता बना बैठे राहुल गांधी के लिए भी मध्य प्रदेश से इस वैचारिक लड़ाई को लड़ते हुए अभी भी देखा जा सकता है..

जहां दिग्विजय सिंह जैसे नेता जोश में कहीं ना कहीं ध्रुवीकरण की स्थिति निर्मित कर भाजपा को फायदा पहुंचाते रहे.. सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पर उम्र हावी होने के साथ जब नेता पुत्र खासतौर से जयवर्धन से लेकर नकुलनाथ अपने क्षेत्र विशेष तक सिमट कर रह जाएंगे.. तब क्या कांग्रेस के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए क्या गांधी परिवार मध्य प्रदेश को लेकर कोई नई स्क्रिप्ट सामने लाएगा.. जहां और दूसरे राज्यों के मुकाबले चुनौती कम हो सकती है.. कांग्रेस का आदिवासी नेतृत्व सक्षम लेकिन अपने क्षेत्र विशेष तक सीमित होकर रह जाता है.. ऐसे में गांधी परिवार की नई पीढ़ी संघ की पहली प्रयोगशाला माने जाने वाले मध्यप्रदेश में एक नए प्रयोग वह भी जोखिम के साथ आगे क्या आगे बढ़ सकता है.. भारत जोड़ो यात्रा के जरिए ही सही राहुल और प्रियंका के कदमताल और जल्द पार्टी के दलित नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष मलिकार्जुन खडेगे की एंट्री इस बात का संदेश देने के लिए काफी है कि कांग्रेस मध्य प्रदेश में नई संभावनाएं तलाश रही है.. 2018 विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के हौसले बुलंद है और नेताओं कार्यकर्ताओं को भरोसा है कि राहुल की भारत जोड़ो यात्रा पार्टी को एकजुट कर 2023 में भाजपा को कड़ी चुनौती देने के लिए तैयार हो रही है.. फिर भी लाख टके का सवाल क्या भारत जोड़ो यात्रा के दौरान गांधी परिवार मध्य प्रदेश में चुनावी राजनीति और दूसरे मकसद से आगे अपने खास तौर से प्रियंका के लिए नई जमीन तलाशने में क्या रुचि लेगा.. यात्रा के राजस्थान में प्रवेश करने के पहले मुख्यमंत्री और गुजरात के प्रभारी अशोक गहलोत के निशाने पर सचिन पायलट उस वक्त आए जब वह मध्यप्रदेश की धरती पर राहुल गांधी से मिलते.. राहुल गांधी जब मध्य प्रदेश से ही अपनी पार्टी कांग्रेस के भ्रष्ट विधायकों के करोड़ों में बिके जाने का गंभीर आरोप लगाते हैं ..तब अशोक गहलोत सीधे तौर पर पायलट समर्थकों को गद्दार साबित कर एक नई बहस शुरू करते हैं.. कमलनाथ – दिग्विजय सिंह की पुरानी जोड़ी की से सफलता ही माना जाएगा कि राहुल की भारत जोड़ो यात्रा में वह प्रियंका गांधी को शामिल कराने में सफल रहे.. तो क्या 2024 आते आते प्रियंका के मध्य प्रदेश की किसी सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ने की संभावनाएं और बलवती होती जाएगी..

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