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लेफ्ट में भी राहुल की यात्रा से बैचेनी!

दक्षिण में नफरत नहीं है। विभाजन नहीं है। मगर राजनीति तो है। तमिलनाडु में वहां के मुख्यमंत्री स्टालिन ने राहुल गांधी को तिरंगा सौंपकर यात्रा की शुरूआत करवाई। वहां अच्छी तरह सारी व्यवस्थाएं देखीं। उम्मीद ऐसी ही केरल में भी थी। मगर वहां रात को रुकने पर ही हंगामा कर दिया। लेफ्ट की स्टूडेंट विंगों ने रात को रूकने वाले कंटेनरों को एक शिक्षा संस्थान के प्रांगण में खड़े नहीं होने दिया। इन्हीं कंटेनरों पर पहले भाजपा और मीडिया ने सवाल उठाए थे। उन्हें लगा कि यह आकाश से आए उड़न खटोले हैं। लेकिन जब मीडिया ने देखा, समझा तो उसे मालूम पड़ा कि यह तो देश भर में कंस्ट्रक्शन साइटों पर कामगारों के रहने के लिए बनाए अस्थाई आवास जैसे ही हैं। टिन और लोहे के।

आग लगाने को बाकी लोग कम थोड़ी थे जो सीपीएम ने भी शुरु कर दी! मुद्दा तो नफरत का है। विभाजन का है। समस्या वह गहरी है। किस राज्य में कितने दिन नहीं। और वह मैसेज एक साथ पूरे देश में जाएगा। एक राज्य या दो में नहीं। दक्षिण से उत्तर कहीं भी। कभी भारत छोड़ो का मैसेज ऐसे ही पंजाब और बंगाल से देश भर में गया था। अब भारत जोड़ो का मैसेज भी अगर दक्षिण से देश भर में फैल जाए तो बुरा क्या है। भारत की शुरूआत सैंकड़ों साल पहले विदेशों से आए यात्रियों ने दक्षिण से ही मानी थी। कन्याकुमारी भारत का अन्तिम सिरा है यह हम उत्तर वाले कहते हैं। मगर दक्षिण वालों के लिए तो भारत कन्याकुमारी से शुरू होता है। हम मुद्दत से कहते चले आए हैं कश्मीर से कन्याकुमारी तक। लेकिन अब राहुल गांधी ने भारत जोड़ो की मुहिम कन्याकुमारी से शुरू की है तो दक्षिण वाले क्यों न कहें कि भारत कन्याकुमारी से कश्मीर तक।

दक्षिण में नफरत नहीं है। विभाजन नहीं है। मगर राजनीति तो है। तमिलनाडु में वहां के मुख्यमंत्री स्टालिन ने राहुल गांधी को तिरंगा सौंपकर यात्रा की शुरूआत करवाई। वहां अच्छी तरह सारी व्यवस्थाएं देखीं। उम्मीद ऐसी ही केरल में भी थी। मगर वहां रात को रुकने पर ही हंगामा कर दिया। लेफ्ट की स्टूडेंट विंगों ने रात को रूकने वाले कंटेनरों को एक शिक्षा संस्थान के प्रांगण में खड़े नहीं होने दिया।

इन्हीं कंटेनरों पर पहले भाजपा और मीडिया ने सवाल उठाए थे। उन्हें लगा कि यह आकाश से आए उड़न खटोले हैं। लेकिन जब मीडिया ने देखा, समझा तो उसे मालूम पड़ा कि यह तो देश भर में कंस्ट्रक्शन साइटों पर कामगारों के रहने के लिए बनाए अस्थाई आवास जैसे ही हैं। टिन और लोहे के।

खैर फिलहाल उन्होंने इस विवाद को रोका तो केरल में यह नया शुरू हुआ कि इन्हें यहां खड़े नहीं होने देंगे, वहां नहीं। हालांकि इस की उम्मीद कांग्रेस को थी कि यह अड़चनें डाली जाएंगी। मगर उसे लगता था कि 30 सितंबर के बाद जब वह कर्नाटक में जाएंगे तो वहां की भाजपा सरकार यह तमाशा कर सकती है।

दरअसल इन कंटेनरों को खड़ा करने के लिए काफी जगह की जरूरत पड़ती है। करीब दो एकड़। और इतनी जगह किसी स्कूल, कालेज के ग्राउन्ड में ही मिल सकती है। करीब 60 कंटेनर हैं। जिनमें 120 परमानेंट यात्री और बाकी कुछ अतिथि यात्री रात्रि विश्राम करते हैं।

तो केरल में लेफ्ट के स्टूडेंट विंगों के विरोध के बाद इतने यात्रियों के आनन फानन में सोने की व्यवस्था करना मुश्किल हो गई। मगर राहुल ने कहा कि विवाद न किया जाए और जहां भी जैसी भी व्यवस्था हो वहां रुक लिया जाए।

यात्रा का एक हफ़्ता हो रहा है। रोज एक से एक नए विवाद खड़े किए जा रहे हैं। टी शर्ट, जूते, कंटेनर, विवेकानंद स्मारक जहां गए, वहां नहीं गए का इतना बड़ा झूठ, हर बात पर जैसा गालिब ने कहा था-

“ हर एक बात पर कहते हो तुम कि तू क्या है

तुम्हीं कहो कि ये अंदाजे गुफ्तगू क्या है!  “

मगर राहुल किसी विवाद में नहीं पड़ रहे। उनका उद्देश्य सीधा है। जोड़ो, जोड़ो। तोड़ने की बात से बचो। लेकिन सफर लंबा है। छह महीने का। बरसात से शुरू हुआ है और सर्दी खत्म खत्म होते वसंत का मौसम आ जाएगा। इतना धीरज रखना मुश्किल काम है। क्योंकि उकसाने, भड़काने वाले कामों की गति उसी रफ्तार में तेज होती जाएगी जितनी यात्रा सफल होती जाएगी। और सबसे बड़ी समस्या यह है कि अभी तक कांग्रेस सोच रही थी कि नफरत फैलाने वाले, समाज में विभाजन करने वाले ही उसका विरोध करेंगे। मगर सीपीएम के अप्रत्याशित विरोध से वह हैरान रह गई।

कांग्रेस लेफ्ट को अपना स्वाभाविक सहयोगी मानती है। अभी यात्रा शुरू होने से पहले इसके मुख्य संयोजक दिग्विजय सिंह ने कहा कि हम लेफ्ट की तरफ झुके हुए मध्यमार्गी पार्टी हैं। लेफ्ट आफ सेन्टर पार्टी। अभी बंगाल में कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर ही विधानसभा चुनाव लड़ा था। हालांकि गत दोनों की बुरी हुई। मगर कांग्रेस जहां भी मौका होता है लेफ्ट के प्रति दोस्ताना रवैया रखती है।

अभी इसी केरल में राहुल के लोकसभा क्षेत्र वायनाड में सीपीएम की छात्र इकाई एसएफआई के सदस्यों ने उनके आफिस में तोड़फोड़ की थी। मगर राहुल ने कहा था बच्चे हैं। मैंने उन्हें माफ कर दिया। याद हो कि राहुल के इसी वीडियो में जालसाजी करके यह डाल दिया गया कि राहुल ने उदयपुर में की गई नृशंस हत्या के हत्यारों का माफ कर दिया। वह तो कांग्रेस में नई मीडिया टीम आ गई थी। नहीं तो यह भी उसी तरह स्थापित हो जाता जैसे आलू से सोना बनाने का राहुल का नकली वीडियो कांग्रेस की मीडिया डिपार्टमेंट की कुछ लापरवाही, कुछ मिलीभगत और ज्यादा अयोग्यता की वजह से हो गया था।

मगर खैर नई टीम पढ़ी लिखी है और पार्टी के प्रति वफादार तो तत्काल उसका खंडन किया गया। जिस टीवी ने यह वीडियो दिखा दिया था उस जी टीवी को माफी मांगना पड़ी। और भी एंकर पत्रकारों को अपने झूठे ट्वीट डिलीट करना पड़े।

बहरहाल तो बात यहां से शुरू हुई थी कि छह महीने की यात्रा इतना बड़ा देश कहां जाना है कहां रूकना है यह तय करना यात्रा करने वाले के लिए ही मुश्किल है तो दूसरे लोग इसे कैसे तय कर सकते हैं? मगर कभी कभी ऐसा होता है कि जिन्हें आप ज्यादा समझदार, स्वाभाविक मित्र समझते हैं वे भी गुस्सा हो जाते हैं। सीपीएम की केरल इकाई अगर यह आपत्ति करती तो फिर भी ठीक था कि हमारे यहां 18 दिन और यूपी में केवल दो दिन। मगर पार्टी की केन्द्रीय इकाई ने दिल्ली से किया तो आश्चर्यजनक है। यह बात सबको मालूम है कि पार्टी में हमेशा से कांग्रेस विरोधी लोग रहे हैं। और अन्ना के आंदोलन से लेकर वीपी सिंह का समर्थन और जय प्रकाश नारायण जिन्होंने यह कहा था कि अगर संघ साम्प्रदायिक है तो मैं भी हूं का साथ दिया था। मगर ये सब इतिहास के ऐसे पन्ने है जिन्हें खोलने से कोई फायदा नहीं।

विवाद से बड़ा सवाल यह है कि जब जब दोनों लेफ्ट और कांग्रेस साथ आए तो बड़े काम हुए। जनहित के। इन्दिरा गांधी का समर्थन किया तो बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं का प्रिवीपर्स, प्रिवलेज खत्म करना। 2004 से 2009 तक मनरेगा, किसानों की कर्ज माफी, महिला बिल जैसे क्रान्तिकारी काम हुए। मगर उसी दौरान दोनों न्यूक डील पर भी उलझे। अलग हुए। और 2014 में सब बुरी तरह हारे। फिर 2019 में वही कहानी दोहराई गई।

क्या उत्तर प्रदेश में हालात सुधारने की जिम्मेदारी दूसरी पार्टियों की नहीं है?  कांग्रेस ने तो अपनी सबसे प्रभावशाली जनरल सैकेट्री प्रियंका गांधी को वहां लगाया। पिछले तीन साल में उन्होंने वहां बहुत मेहनत की। खुद राहुल ने 2007 के विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक वहां लगातार काम किया। हाथरस जहां जाते हुए उन्हें धक्के देकर गिराया गया। प्रियंका ने कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए अपने हाथों पर लाठियां रोकीं। लखीमपुर जहां अभी प्रियंका गिरफ्तार की गईं। उससे पहले सोनभद्र में आदिवासियों के नरसंहार के बाद जब प्रियंका वहां जा रही थी तो गिरफ्तार हुई, मगर लखीमपुर की तरह मिले बिना वापस नहीं आईं। तो यह सब जगह कहां थीं? उत्तर प्रदेश में नहीं थीं?

कोई भी पार्टी या नेता यूपी में राहुल और प्रियंका से ज्यादा सक्रियता बता दे? संभव नहीं है। मगर यह बहस का मुद्दा नहीं है। समस्या यह है कि यूपी की समस्या इतनी गंभीर और जटिल है कि वहां ये सारे उपाय काम नहीं कर रहे हैं। जाति की राजनीति के बाद धर्म की राजनीति ने वहां ऐसा शिकंजा कसा है कि वहां यात्रा के दिन बढ़ाने से फिलहाल कुछ होने वाला नहीं है। हां बाधाएं ऐसी डाली जाएंगी कि यात्रा की गति कमजोर हो जाए। और जो सकारात्मक माहौल बन रहा है वह तनाव से घिर जाए।

राहुल की यात्रा एक पाजिटिव सोच की यात्रा है। उसे भाजपा हर हाल में डिरेल करना चाहती है। लेकिन अगर ऐसे में उसे दूसरे विपक्षी दलों का भी अप्रत्यक्ष या अनजाने में समर्थन मिल जाएगा तो यह तोड़ो की जीत और जोड़ोकी हार होगी।

हार राहुल की नहीं होगी। उस विश्वास की होगी जिसे लेकर राहुल यात्रा पर निकले हैं।

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