बिहारः जनता ने जीताना चाहा पर विपक्ष फेल!

चुनावों के नतीजे दिलचस्प और गंभीर मायनो के होते जा रहे हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक बिहार में बिहार में दो-पांच सीटों के फर्क से फैसला होता लगता है।  उधर मध्य प्रदेश के 28 सीटों के उप चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ने बेहतरीन प्रदर्शन करतेहुए कमलनाथ के दोबारा मुख्यमंत्री बनने की हसरतों को चकनाचूर कर दिया है। चौहान ने एक तीर से दो शिकार किए हैं। एक तरफ अपनी गद्दी बरकरार रखी दूसरी तरफ पूरा चुनाव खुद लड़कर ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी बैकफुट पर ला दिया।

बिहार का चुनाव इन पंक्तियों के लिखने तक फंसा हुआ है। जितने लोग उतने भाष्य! लेकिन कुछ चीजें स्पष्ट हैं। एक, अब बिहार में भी भाजपा की स्थिति बहुत मजबूत हो गई है। दो, अब जेडीयू समाप्त प्राय है, जो थोड़ी मिल सीटें रही हैं वेभाजपा से गठबंधन के कारण आ रही हैं, नीतीश का अवसरवाद उन्हें और उनकी पार्टी को ले डूबेगा। तीन, आरजेडी ने अच्छा प्रदर्शन किया मगर इतना बड़ा चुनाव एक अकेले तेजस्वी के बस का नहीं था। चार, कांग्रेस पिछली हारों से कुछ नहीं सीख रही है, बेमतलब 70 सीटें लेकर उसने उन सीटों पर महागठबंधन के दूसरे घटकों के चुनाव जीतने की संभावनाओं को धूमिल किया।

पांच, लेफ्ट ने बहुत अच्छा प्रदर्शन करके बिहार में फिर अपनी स्थिति मजबूत कर ली, जिसकी धमक बंगाल तक जाएगी। छह, चिराग पासवान कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाए, नीतीश के वोट काटने से जो छवि बनी है वह नकारात्मक है, उन्हें लोग अब कम गंभीरता से लेंगे। सात और आखिरी बात, औवेसी अपनी खेल में कामयाब हुए, महागठबंधन को जा रहा मुस्लिम वोट का बड़ा हिस्सा काटकर उन्होंने भाजपा को निर्णायक फायदा पहुंचाया।

यह सात मोटी मोटी बातें हैं जो बिहार के बहुत धीमी गति से आ रहे रुझानों से उभर कर सामने आई हैं। अभी कौन सरकार बनाएगा, कौन किसके साथ रहेगा या नया मौका तलाश करेगा कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन सबसे मजबूती के साथ उभरी भाजपा के पास सबसे ज्यादा विकल्प हैं। मगर यहां इससे भी बड़ा सवाल यह है कि पिछले चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी रही आरजेडी कैसे पिछड़ गई। उसका जैसा माहौल बताया जा रहा था। एक्जिट पोल में उसके नेतृत्व में सरकार बनते दिखाई जा रही थी वैसा क्यों नहीं हो पाया? आंकड़े और उनका विश्लेषण अभी कई नई व्याख्याएं करेंगे। मगर जो त्वरित विश्लेषण के लिए समझ में आता है वह यह कि जमीन पर आरजेडी का रोजगार, शिक्षा, युवा जैसा मुद्दा उतना नहीं पहुंच पाया जितना भाजपा का हिन्दु मुसलमान प्रचार।

देश के लिए यह अच्छा हो या बुरा यह अलग बात है मगर यह फिर साबित हुआ कि भाजपा के भावुक मुद्दों का तोड़ अभी भी विपक्षी दल नहीं खोज पाए हैं। भाजपा का प्रचार तंत्र बाकी सारे मुद्दों को किनारे कर देता है।बिहार में तेजस्वी की सभाओं में आ रही हजारों की भीड़ कोई ला नहीं रहा था। वे स्वयंस्फूर्त थी। और इसमें हर जाति धर्म के लोग  रहे थे। मगर ये लोग मतदान की तारीख तक अपना मन बनाए रखने में कामयाब नहीं हो पाए। प्रधानमंत्री मोदी का जंगलराज का युवराज जुमला लोगों पर असर कर गया। खासतौर से जो सवर्ण जातियों के युवा महागठबंधन की तरफ मुड़ रहे थे उन्हें बार बार जगंलराज कह कह कर रोकने में भाजपा को सफलता मिली। यह प्रचारतंत्र की एक और बड़ी जीत है। तेजस्वी ने अपने आपको पूरी तरह आरोप प्रत्यारोपों से दूर रखा। किसी आरोप का जवाब नहीं दिया। जबर्दस्त मेहनत की। एक दिन में 20- 20 सभाएं तक कीं। लेकिन अपनी शानदार बैटिंग के बावजूद मैच फिनिशर नहीं बन पाए।

दूसरे एंड से जो सपोर्ट उन्हें महागठबंधन के दूसरे सबसे बड़े पार्टनर कांग्रेस से मिलना था वह नहीं मिल सका। सबसे खराब स्ट्राइक रेट कांग्रेस का रहा। पिछले तीस सालों से जमीन से जो संगठन गायब है उसका खामियाजा एक बार फिर कांग्रेस को भुगतना पड़ा। पटना में बैठे तीन चार बड़े नेता दूरदराज के इलाकों में कभी नहीं गए। जो उनसे आकर मिल लेता है उसे ही वे मजबूत कांग्रेसी समझ लेते हैं। इसी तरह दिल्ली के नेता भी राज्य मेंकांग्रेस की खराब स्थिति के कारणों के बारे में कुछ नहीं जानते। हर बार दुरूस्त करने की बात होती है, मगर बीमारी क्या है यह पता नहीं।

कांग्रेस प्रेस कान्फ्रेंसों से चुनाव जीतना चाह रही थी। टिकट बिकने के आरोप इस बार भी लगे। मगर उससे भी गंभीर यह बात है कि तीस साल से बिहार में समझौते करके लड़ रही कांग्रेस को अभी तक ठीक चुनावी समझौता करना नहीं आया। सत्तर सीटें लेकर बहुत खुश थी। जबकि आरजेडी के जानकार नेताओं से लेकर कांग्रेस के शुभचिंतक भी यह कह रहे थे कि संख्या बढ़ाने से कोई फायदा नहीं है। जीतने वाली सीटें लो, चाहे कम मिलें। मगर कांग्रेसियों का आरोप है कि ज्यादा सीटें इसलिए लीं ताकि बेच सकें। कांग्रेस को ज्यादा सीटें देने की

वजह से कुछ छोटी पार्टियां जैसे हम को आरजेडी एडजस्ट नहीं कर पाई और अब उनका अच्छा प्रदर्शन बता रहा है कि महगठबंधन से कैसी गलती हुई। लेफ्ट जिसकी जीत की स्ट्राइक रेट सबसे अच्छी है उसे भी कांग्रेस की जिद की वजह से अपने प्रभाव वाली कई सीटों पर दावा छोड़ना पड़ा।

बिहार के चुनाव विपक्ष के लिए एक आशा बनकर आए थे। मगर एक बार फिर सपना टूटता दिख रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह के इस समय में दो चार सीटों के बहुमत से सरकार नहीं बन सकती। और अगर बन भी जाए तो वह मध्य प्रदेश की तरह रह नहीं सकती। बड़ा मार्जन केवल सरकार बनाने के लिए ही जरूरी नहीं है बल्कि विपक्ष का मारल बूस्ट करने के लिए भी जरूरी है। विपक्ष में अगर यह भावना आ गई कि इनसे जीतना मुश्किल है तो यह लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक बात होगी।

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