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भाजपा को हिलाना है तो बिहार जैसे झटके और…

नीतीश कुमार इस बार नए रूप में सामने आए हैं। शायद प्रायश्चित्त के कारण। अपनी आखिरी पारी में वापस सम्मान, गरिमा और विश्वसनीयता पाने के लिए। वे रामविलास पासवान और मायावती की तरह अपने लोगों के विश्वासघाती बनकर इतिहास में जाना नहीं चाहते। सामाजिक न्याय के सिद्धांत से ही वे दूसरे अन्य पिछड़े और दलित नेताओं की तरह आगे बढ़े। लेकिन पासवान और मायवती की तरह केवल सत्ता, सुरक्षा और सुविधा के जाल में फंस गए।…नीतीश का यही ह्रदय परिवर्तन है। इसका दूसरा बड़ा उदाहरण यह है कि उन्होंने तेजस्वी पर नौकरियों को लेकर हो रहे हमलों को खुद आगे बढ़कर अपने ऊपर ले लिया। 15 अगस्त को कह दिया कि दस लाख नौकरियों के साथ, दस लाख रोजगार के भी नए अवसरों का सृजन करेंगे।

बिहार एक बड़ा झटका था। विपक्ष अगर एक दो झटके ऐसे और मार दे तो प्रधानमंत्री मोदी की हैट्रिक का सपना हिल सकता है। चुनाव, सरकार बदलना ऐसी चीजें हैं, जिन्हें मीडिया चाहकर भी नहीं छिपा सकता। या यूं कहना चाहिए कि छिपाने की हिम्मत भी नहीं कर पाता। वह नेहरू को छुपाने की कोशिश कर सकते है। अभी की एक बेशर्म एंकर ने नेहरू के सामने खड़े होकर टीवी का प्रोमो बनाया। वह तो शुक्र है कि अब कांग्रेस का नया मीडिया डिपार्टमेंट इन चीजों को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करता। फौरन कड़ा विरोध करता है। तो उस चैनल को वह प्रोमो वापस लेना पड़ा। नहीं तो 15 अगस्त 1947 के दिन का वह वीडियो चल ही गया था। जिसमें एंकर लगातार अपनी पीठ के पीछे नेहरू को छुपाने की कोशिश करती रही।

अब मीडिया को और जिसके इशारे पर वे चल रहे हैं उन्हें कौन बताए कि नेहरू को तो पीठ के पीछे क्या पहाड़ के पीछे भी नहीं छिपाया जा सकता। वह विश्व नेता थे। पिछले सौ साल के दुनिया के दस बड़े नेताओं में एक। खैर, मगर जैसा ऊपर लिखा कि इसकी वे कोशिश तो कर सकते हैं। करते ही रहते हैं। आजादी की 75 वीं सालगिरह के कई फोटों में से नेहरू को हटा दिया।

लेकिन राजनीतिक परिवर्तन ऐसी चीज है जिसे वे छुपाने की सोच भी नहीं सकते। वह सूरज की तरह सामने दिखता हैं। अभी झूठ का ऐसा बोलबाला नहीं हो पाया कि कह दें कि बिहार में नीतीश आरजेडी के साथ गए ही नहीं। या सिर्फ इतना बताकर रह जाएं कि नीतीश मुख्यमंत्री थे। मुख्यमंत्री हैं। बाकी किसके साथ हैं, किसके नहीं इससे तुम्हें ( जनता को) क्या मतलब? उन्हें हंसते या रोते यह बताना पड़ रहा है कि वे लालू और तेजस्वी के साथ गए। मध्यमवर्गीय मानसिकता वाला मीडिया सबसे ज्यादा नफरत लालू और अब तेजस्वी यादव से करता है। इसीलिए उनके उप मुख्यमंत्री पद की शपथ की गूंज अभी हवा से खत्म भी नहीं हुई थी कि मीडिया दस लाख नौकरी, दस लाख नौकरी का कोरस गाने लगा।

नीतीश कुमार इस बार नए रूप में सामने आए हैं। शायद प्रायश्चित्त के कारण। अपनी आखिरी पारी में वापस सम्मान, गरिमा और विश्वसनीयता पाने के लिए। वे रामविलास पासवान और मायावती की तरह अपने लोगों के विश्वासघाती बनकर इतिहास में जाना नहीं चाहते। सामाजिक न्याय के सिद्धांत से ही वे दूसरे अन्य पिछड़े और दलित नेताओं की तरह आगे बढ़े। लेकिन पासवान और मायवती की तरह केवल सत्ता, सुरक्षा और सुविधा के जाल में फंस गए।

जो लोग लालू प्रसाद यादव को जाने कितने बार समाप्त घोषित कर चुके हैं। उन्हें एक बार फिर आश्चर्य से देखना पड़ा कि नीतीश सर्वशक्तिमान मोदी को छोड़कर उनके पास आए। ये लालू की ताकत नहीं यह उनकी लगातार सामाजिक न्याय में बनी आस्था की ताकत है। लालू ने 2015 में सोनिया गांधी के रोजा अफ्तार पार्टी में हमसे कहा था कि मोदी को केवल सामाजिक न्याय ही हरा सकता है। हम खड़े होकर बात कर रहे थे। पास की ही मुख्य टेबल पर सोनिया विपक्ष के कई बड़े नेताओं से घिरी बैठी थीं। लालू तो लालू हैं। सोनिया की तरफ इशारा करके बोले कि मगर ये मानेंगी नहीं!

सोनिया पोलिटिकली बहुत इन्टेलिजेंट हैं। आंख और कान की भी बहुत तेज हैं। निगाह लालू जी पर थी। बिहार चुनाव होने वाले थे। सुन लिया। बोलीं। क्या… क्या? लालू जी हंसे। बोले बताएंगे। बताएंगे। और लालू ने 2014 की मोदी जी की जीत का रथ 2015 में ही बिहार में रोक दिया था। महागठबंधन बनाकर। उसे मुलायम और अखिलेश यूपी में लागू नहीं कर पाए। नतीजा 2017 और 2022 दोनों हारे। फर्क देखिए। बिहार में 2015 लालू जीते। 2020 में आरोप है कि रिजल्ट के दौरान कई जीती हुई सीटों पर कम अंतर से हरा दिया गया। खैर जो भी हो मगर दो साल में वह हार भी जीत में बदल गई।

बिहार और यूपी की राजनीतिक, सामाजिक परिस्थितयों में काफी साम्य है। मंडल का सबसे ज्यादा असर यहीं हुआ। लेकिन जहां बिहार में लालू ने अपना आधार बनाए रखा वहीं यूपी में मुलायम, अखिलेश, मायावती ने खो दिया। नीतीश की वापसी का यही कारण है कि वहां सामाजिक न्याय की ताकतें लालू के साथ हैं। नीतीश ने बहुत कोशिश कर ली मगर वे उन्हें भाजपा की तरफ शिफ्ट नहीं करा पाए।

नीतीश अपनी इस नाकामी को जानकर हताश या दुखी होकर वहां से आए। मगर अच्छी बात है कि अपनी अति महत्वाकांक्षाओं को वहीं छोड़ आए। उनके आते ही मीडिया ने एक नया गेम खेला। विपक्ष में भ्रम फैलाने के लिए उन्हें विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताना शुरू कर दिया। मगर नीतीश ने फौरन इसका खंडन करते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं। यह पहली बार है कि मीडिया की किसी झूठी कहानी की हवा इतनी जल्दी निकली हो। राहुल गांधी उम्मीदवार नहीं हैं यह बताने के लिए मीडिया विपक्ष की तरफ से ऐसे कई नाम चलाता रहा है। मगर इस बार नीतिश ने केवल यह साफ किया कि वे उम्मीदवार नहीं हैं। बल्कि इससे आगे बढ़कर यह भी कहा कि वे विपक्ष की एकता के लिए काम करेंगे।

नीतीश का यही ह्रदय परिवर्तन है। इसका दूसरा बड़ा उदाहरण यह है कि उन्होंने तेजस्वी पर नौकरियों को लेकर हो रहे हमलों को खुद आगे बढ़कर अपने ऊपर ले लिया। 15 अगस्त को कह दिया कि दस लाख नौकरियों के साथ, दस लाख रोजगार के भी नए अवसरों का सृजन करेंगे। यह बहुत बड़ी घोषणा है। 15 अगस्त पर किसी मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री ने नहीं की। जुमलेबाजियों के बीच ऐसी ठोस घोषणा करके नीतीश ने बता दिया कि वे अब पूरी तरह तेजस्वी और आरजेडी के साथ खड़े हुए हैं।

नीतीश के इसी रोल को अब आगे बढ़ाने की जरुरत है। उन्होंने जो विपक्ष की एकता के लिए काम करने को कहा है उसे धरातल पर उतारना होगा। शपथ तो उन्होंने और तेजस्वी ने जल्दी जल्दी में ले ली थी। मगर अब सब विपक्षी दलों को पटना बुलाकर एक बड़ा विपक्षी सम्मेलन करने की जरूरत है। बिहार से मैसेज बहुत तेज जाता है। खासतौर से परिवर्तन का। विपक्षी एकता का।

नीतीश ने जो झटका दिया है। वह जड़ जमा चुके दरख्त को है। केवल एक झटके से काम नहीं चलेगा। ऐसे ही लगातार देने होंगे। मूल बात सब विपक्षियों को समझना होगी कि आपस में किसी की हार जीत से कोई खास फर्क नहीं पड़ता। लेकिन अगर मोदी जी 2024 में तीसरी बार आ गए तो फिर देश में विपक्ष की हर पार्टी के लिए सिवाय मायावती बनने के और कोई रास्ता नहीं बचेगा।

इस साल दो राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। दोनों राज्यों गुजरात और हिमाचल में कांग्रेस ही मुख्य पार्टी है। स्थिति अच्छी भी है। मगर अभी हिन्दु मुसलमान तेज किया जाएगा। ओवेसी को आग में घी डालने के लिए बुलाया जाएगा। मायावती पहुंच ही रही हैं। आम आदमी पार्टी दोनों जगह पहुंच गई है। ये सब कांग्रेस के वोट कटवा हैं। ऐसे में लाइक माइंडेड पार्टियां अगर सही राजनीतिक मैसेज देना शुरु कर दें तो इन वोट कटवा पार्टियों का असर कम किया जा सकता है। अगले साल 2023 में तो वाकई 2024 का सेमिफाइनल ही हो जाएगा। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नागालेंड और मिजोरम के चुनाव हैं।

9 अगले साल के और 2 इस साल के। यह सारे चुनाव ओपन हैं। कहीं भी भाजपा को अपर हेंड नहीं है। जो अच्छी तरह लड़ेगा, वह जीतेगा। यहीं अगर विपक्ष भाजपा को सही झटके दे सका तो 2024 भी ओपन हो जाएगा। और अभी तक चाहे वह 2014 का हो या 2019 का। अपनी तरफ झुके हुए चुनाव मोदी जी ने जीते हैं। सबके लिए समान अवसर वाला चुनाव जीतना अभी उनके लिए बाकी है। विपक्ष अगर यह कर सका। 2024 खुद के लिए समान अवसर का चुनाव बना सका तो मोदी जी के लिए वाकई कड़ी चुनौती हो जाएगी।

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