भटकती मनोदशा, बाइपोलर डिस्आर्डर

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के सिलसिले में बाइपोलर डिस्आर्डर और डिप्रेशन नाम की दो बीमारियों का नाम सबसे ज्यादा सुनने में आया, इनकी वास्तविकता जानने के लिये जब मनोचिकित्सकों से बात की तो पता चला कि बाइपोलर डिस्आर्डर एक क्रोनिक मानसिक बीमारी है जिसमें व्यक्ति अचानक मनोदशा के चरम बिंदुओं (अप-डाउन) में भटकती है। मेडिकल साइंस में इसे बाइपोलर डिसीस और मेनियक डिप्रेशन भी कहते हैं। बिना इलाज के ऐसी मनोदशा वाले व्यक्ति की सोशल लाइफ कठिन हो जाती है और आत्महत्या की प्रवृत्ति पनपने लगती है। हमारे देश में प्रतिवर्ष इस बीमारी के एक करोड़ से ज्यादा मामले सामने आते हैं। इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है लेकिन दवाओं से इसे मैनेज करके सामान्य जीवन जी सकते हैं।

क्या है बाइपोलर डिस्आर्डर?

इसमें व्यक्ति की मनोदशा (मूड) में परिवर्तन होने से वह अचानक बहुत खुश, उत्तेजित या आवेग में रहने के बाद उदासी में डूब जाता है। मनोदशा में अप स्थिति वाला बदलाव मेनिया ( उन्मादी दौर) और डाउन स्थिति वाला बदलाव डिप्रेसिव एपीसोड (उदासी/ऊर्जाहीनता का दौर) कहलाता है। इस बीमारी से ग्रस्त लोगों को रोज-मर्रा के काम करने जैसेकि स्कूल या नौकरी पर जाना और सामाजिक तथा व्यक्तिगत रिश्ते निभाने में कठिनाइयां आती हैं। मेडिकल साइंस के मुताबिक यह ब्रेन डिस्आर्डर नहीं है। वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में करीब 2.8 प्रतिशत लोग इस बीमारी के शिकार हैं। आमतौर पर इसके सिम्पटम 25 वर्ष की उम्र से नजर आते हैं, इसमें उन्मादी दौर (मेनिया एपीसोड) कुछ दिन और डिप्रेसिव एपीसोड (उदासी/ऊर्जाहीनता) कम से कम दो सप्ताह रहता है। बाइपोलर डिस्आर्डर के बहुत से मरीज साल में कई बार ऐसे मानसिक उतार-चढ़ाव महसूस करते हैं और कुछ कभी-कभार।

बाइपोलर डिस्आर्डर टाइप

बाइपोलर-1: यह पुरूष और महिला दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है, इसमें रोगी को कम से कम एक बड़ा मेनिया (उन्मादी)  या हाइपोमेनियेक (हल्का उन्माद) एपीसोड और फिर बड़ा डिप्रेसिव एपीसोड महसूस होता है।

बाइपोलर-2: यह महिलाओं में ज्यादा कॉमन है। इसमें 4-5 दिन तक हाइपोमेनियक एपीसोड और दो सप्ताह या उससे ज्यादा समय के लिये एक बड़ा डिप्रेसिव एपीसोड महसूस होता है।

साइक्लोथाइमिया: इससे ग्रस्त व्यक्ति को एक या दो महीने के लिये हाइपोमेनिया (हल्का उन्माद)  और हल्का डिप्रेसिव एपीसोड महसूस होता है।

लक्षण

बाइ-पोलर विकार से ग्रस्त व्यक्ति में ये लक्षण उभरते हैं- मेनिया (उन्माद), हाइपोमेनिया (मध्यम या हल्का उन्माद) और डिप्रेशन (अवसाद)।

उन्माद की अवस्था में मरीज के इमोशन अचानक हाई (अप) होने से वह अत्यन्त उत्साहित, आवेगी और ऊर्जावान महसूस करता है, उसके व्यवहार में उन्मत्ता आ जाती है और ये लक्षण उभरते हैं-

– ज्यादा और अनावश्यक खर्च करना।

– यौन सम्बन्ध बनाने के लिये आतुरता बढ़ने से असुरक्षित यौन सम्बन्ध बना लेना।

– मादक द्रव्यों का सेवन करना।

अमेरिका की हार्वर्ड यूनीवर्सिटी में बाइपोलर डिस्आर्डर के मरीजों पर की गयी एक स्टडी से ये तथ्य निकलकर आये-

  1. बाइपोलर डिस्आर्डर का मरीज सोकर उठने के बाद जब दर्पण देखता है तो उसे महसूस होता है कि सामने कोई अजनबी खड़ा है।
  2. सुबह उठते समय सोचता है कि आज का दिन उसे छोड़कर बाकी सब के लिये बहुत अच्छा होने वाला है और नाश्ते के समय डर महसूस करता है।
  3. मनोदशा परिवर्तन के समय मरीज के दिमाग में विचार तेजी से आते-जाते हैं और डाउन होने पर वह किसी के भी कंधे पर सिर रखकर रोने लगता हैं और सोचता है कि उसे कोई नहीं चाहता और न ही किसी को उसकी जरूरत है। उसे अपने जीवन के खुशी वाले लम्हे भी याद नहीं रहते।
  4. अप स्थित में वह अपने आपको पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा सरल (मॉडेस्ट) और उदार समझता है। 5. मेनिया एपीसोड में सेक्स की इच्छा चरम पर पहुंच जाती है और ऐसे में किसी भी व्यवधान से वह चिड़चिड़ाने और नशीले पदार्थों का सेवन करने लगता है। रात को न सो पाना भी ठीक लगता है।
  5. जब मनोचिकित्सक मरीज की मनोदशा बैलेंस करने के लिये उस पर ज्यादा समय देता है तो मरीज उसे धोखा देने वाला या वेबकूफ बनाने वाला समझता है।
  6. मनोचिकित्सक मरीज के खर्चे का पैटर्न देखकर पता लगा लेते हैं कि वह कब और कितने समय तक मेनिया एपीसोड से गुजरा।

हाइपोमेनिया को बाइपोलर-2 से जुड़ा माना जाता है इसमें रोगी की मनोदशा में नोटिस करने लायक मध्यम और हल्के उन्माद आते हैं लेकिन उन्मत्ता न होने से दैनिक काम करने और सामाजिक संबन्ध निभाने में ज्यादा परेशानी नहीं आती।

बाइपोलर डिस्आर्डर के तीसरे लक्षण डिप्रेशन में रोगी गहरी उदासी, निराशा में डूबा हुआ ऊर्जाहीन हो जाता है। उसकी सामाजिक गतिविधियां कम और वह अपने पसन्द के कार्यों में रूचि लेना बंद कर देता है। डिप्रेसिव एपीसोड के दौरान रोगी की सोने की अवधि कम हो जाती है व दिमाग में आत्मघाती विचार आने लगते हैं।

महिलाओं में बाइ-पोलर डिस्आर्डर

यह बीमारी पुरूष और महिलाओं, दोनों को समान रूप से प्रभावित करती है, लेकिन कुछ लक्षण अलग होते हैं। महिलाओं में इसके लक्षण 20 से 30 वर्ष की उम्र में नजर आते हैं। पुरुषों की तुलना में महिलाओं को उन्माद (मेनिया) के एपीसोड कम, डिप्रेसिव एपीसोड ज्यादा महसूस होते हैं। उन्माद और अवसाद के साथ मोटापा, थॉयराइड डिसीस, एंग्जॉयटी और माइग्रेन जैसी बीमारियां पनपने लगती हैं। ऐसे में शराब पीने से एल्कोहल यूज डिस्आर्डर (एयूडी)  नामक बीमारी हो जाती है जिससे लीवर डैमेज होने का रिस्क बढ़ जाता है। यह स्थिति ज्यादा समय तक रहे तो आत्महत्या की प्रवृत्ति पनपने लगती है। कुछ महिलाओं में बाइ-पोलर डिस्आर्डर जैसे लक्षण माहवारी, प्रेगनेन्सी और मेनोपॉज के दौरान शरीर में हो रहे हारमोनल परिवर्तनों से भी उभर आते हैं लेकिन समय बीतने के साथ अपने आप ठीक हो जाते हैं। अगर किसी महिला को साल में चार या इससे अधिक बार मेनिया और डिप्रेसिव एपीसोड महसूस हों तो इसे रैपिड साइकिलिंग कहते हैं।

पुरूषों में बाइ-पोलर डिस्आर्डर

महिलाओं की तुलना में पुरूषों में बाइ-पोलर डिस्आर्डर के लक्षण कम उम्र में उभरते हैं और वे गम्भीर उन्मादी एपीसोड महसूस करते हैं। इस दौरान रिस्की हरकतें करने के अलावा मादक द्रव्यों का सेवन और उन्मुक्त सेक्स की ओर अग्रसर हो जाते हैं। विचारों के तेज प्रवाह से जल्दी-जल्दी बोलने लगते हैं। महिलाओं की अपेक्षा पुरूषों को मेडिकल केयर की जरूरत कम पड़ती है लेकिन इनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति ज्यादा होती है।

किशोरावस्था में बाइ-पोलर डिस्आर्डर

13 से 19 साल तक के बच्चों में यह कॉमन है। इसके कारण बहुत से बच्चे इस उम्र में अपने माता पिता से गुस्से भरा व्यवहार करते हैं। शरीर में हो रहे हारमोनल परिवर्तनों से ये परेशान व अधिक   इमोशनल हो जाते हैं, जिससे मानसिक स्थिति में रैपिड बदलाव आता है और बाइ-पोलर डिस्आर्डर जैसे लक्षण उभरते हैं।

किशोरों में मेनियक लक्षण:  बहुत खुश होना, अचानक दुर्वयवहार करना, रिस्की कामों में भाग लेना, मादक पदार्थों का सेवन,  सेक्स के बारे में सोचते रहना,  नींद न आना या बहुत कम सोना, जल्द गुस्से में आ जाना (शार्ट टेम्पर), जीवन से खिलवाड़ करना और जल्द विचलित हो जाना इत्यादि।

किशोरों में डिप्रेसिव लक्षण: परिवार और दोस्तों से कटे-कटे रहना, भूख में बदलाव, स्लीप पैटर्न में बदलाव (बहुत अधिक या बहुत कम सोना), थकान या ऊर्जा में कमी, याददाश्त में कमजोरी, ध्यान केन्द्रित न कर पाना और निर्णय लेने में कठिनाई, गहरी उदासी, कम एक्साइटमेंट, दोस्तों और मनोरंजक गतिविधियों में दिलचस्पी न लेना, मृत्यु और आत्महत्या के बारे में सोचना इत्यादि।

बच्चों में बाइ-पोलर डिस्आर्डर

बच्चों में इस विकार का पता लगाना मुश्किल होता है क्योंकि इनमें बाइ-पोलर विकार के लक्षण किसी अन्य विकार से मिक्स हो जाते हैं जैसेकि अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिस्आर्डर (एडीएचडी)। मनोचिकित्सकों ने बच्चों में बाइ-पोलर डिस्आर्डर पता लगाने के लिये एक विशेष प्रक्रिया विकसित की है जो कुछ हफ्तों से लेकर एक या दो महीने तक चलती है। बच्चे भी मनोदशा में उतार-चढ़ाव के एपीसोड महसूस करते हैं, आवेग पूर्ण व्यवहार को बहुत ज्यादा खुशी के रूप में और डिप्रसिव दौर को उदासी या रोकर व्यक्त करते हैं।

बच्चों में मेनियक लक्षण: मूर्खों की तरह एक्टिंग करके ज्यादा खुशी जाहिर करना, बातचीत के दौरान विषय तेजी से बदलना, रिस्की व्यवहार,  शार्ट टेम्पर,  चिड़चिड़ाना और गुस्सा होना, ढंग से सो न पाना,  न सोने के बाद भी थकान न महसूस करना इत्यादि।

बच्चों में डिप्रेसिव एपीसोड: इस दौरान उदास रहना या उदासी की एक्टिंग करना, बहुत अधिक या बहुत कम सोना, रोज-मर्रा की गतिविधियों में सुस्ती, किसी भी चीज में कोई दिलचस्पी न लेना,  लगातार सिरदर्द या पेट में दर्द की शिकायत करना, सभी गलतियों के लिये खुद को जिम्मेदार समझना, अपने आपको बेचारा या बेकार समझना, बहुत कम या बहुत ज्यादा खाना, मृत्यु की बातें करना या आत्महत्या के बारे में सोचना जैसे लक्षण महसूस करते हैं।

बाइपोलर डिस्आर्डर और डिप्रेशन

बाइपोलर विकार में दो चरम बिंदु होते हैं-ऊपर (अप) या नीचे (डाउन)। व्यक्ति को इससे ग्रस्त तभी माना जाता है जब उसने मेनिया और हाइपरमेनिया के एपीसोड महसूस किये हों। जब व्यक्ति की मनोदशा ऊपर (अप) होती है तो वह अत्यधिक ऊर्जा, आवेग और उत्तेजना अनुभव करता है और जब डाउन एपीसोड से गुजरता है तो वह सुस्त, बेजान (अनमोटीवेटेड) और उदास हो जाता है।

बाइपोलर डिस्आर्डर में व्यक्ति उदास तो होता है लेकिन यह कंडीशन डिप्रेशन की तरह स्थायी नहीं होती इसके अलावा डिप्रेशन में उसे कभी भी उन्मादी भावनायें महसूस नहीं होतीं। यही कारण है कि मनोचिकित्सक बाइपोलर विकार से होने वाले डिप्रसिव एपीसोड को सामान्य डिप्रेशन से अलग मानते हैं और इनका कहना है कि बाइपोलर डिस्आर्डर मनोदशा के ऊपर-नीचे होने का परिणाम है जबकि डिप्रेसन में मनोदशा और भावनायें हमेशा नीचे (डाउन) रहती हैं।

क्यों होता है बाइपोलर डिस्आर्डर?

इसके होने के कारण पूरी तरह से स्पष्ट न होने से मनोचिकित्सक इसे रहस्यमय मानसिक स्वास्थ्य विकार मानते हैं। उनके अनुसार इसके सम्भावित कारण हैं-

जेनेटिक: यदि किसी के परिवार में कोई इससे ग्रस्त रहा है तो उसे इसके होने के चांस दूसरों के मुकाबले 4 से 6 गुना ज्यादा हैं। एक रिसर्च में पाया गया कि बहुत से मामलों में यह बीमारी, माता-पिता से बच्चों में गई इसलिये इसे हेरीडेटरी माना जाता है।

दिमाग की संरचना: ब्रेन स्ट्रक्चर में किसी तरह की खराबी (अब्नार्मल्टी) बाइपोलर विकार का रिस्क बढ़ाती है।

परिवार और आस-पास का माहौल: शरीर में कमी से यह बीमारी हो ऐसा जरूरी नहीं, कई बार आस-पास के माहौल से भी इसके विकसित होने की सम्भावना बढ़ जाती है। ऐसे बाहरी कारणों में अत्यधिक तनाव, दर्दनाक अनुभव (ट्रॉमिक एक्सपीरियेंस) या कोई गम्भीर बीमारी व्यक्ति को इससे ग्रस्त कर सकती है।

पुष्टि या कन्फर्मेशन

इसकी पुष्टि के लिये जरूरी है कि व्यक्ति ने एक या एक से अधिक मेनिया (उन्मादी) या मिक्सड (मेनिया और डिप्रेसिव) एपीसोड महसूस किये हों।

बाइपोलर 2 डिस्आर्डर की पुष्टि के लिये जरूरी है कि व्यक्ति को कम से कम एक हाइपोमेनिया एपीसोड के साथ एक या दो बड़े डिप्रेसिव एपीसोड महसूस हुए हों। मेनिया एपीसोड वाले लक्षण कम से कम एक सप्ताह महसूस होने चाहिये या फिर ऐसे हों कि जिसकी वजह से अस्पताल में रहना पड़ा हो और इस दौरान ये लगभग पूरे दिन महसूस हुए हों। इसके बाद कम से कम दो सप्ताह तक डिप्रेसिव एपीसोड महसूस होना जरूरी है।

डाक्टर इस बीमारी की पुष्टि इस तरह से करते हैं-

मेडिकल हिस्ट्री: मनोचिकित्सक सबसे पहले पीड़ित और उसके परिवार की मेडिकल हिस्ट्री, करेंट मेडिकल कंडीशन और लाइफस्टाइल के बारे में जानकारी लेते हैं।

भौतिक जांच: बाइपोलर डिस्आर्डर की पुष्टि के लिये फिजिकल जांच और ब्लड व यूरीन टेस्ट किये जाते हैं जिससे वे कारण रूलआउट हो जायें जिनसे बाइपोलर डिस्आर्डर जैसे लक्षण उभर सकते हैं।

स्लीप हिस्ट्री: मनोचिकित्सक मरीज की नींद का पैटर्न पता करने के लिये उसे एक डॉयरी मेन्टेन करने के लिये कहते हैं जिसमें उनके सोने और जागने का समय नोट हो। इसी के आधार पर वे इलाज में स्लीप मेडीकेशन प्रयोग करते हैं।

मेन्टल हेल्थ जांचना: मेन्टल हेल्थ की बारीक पड़ताल में मनोचिकित्सक पता लगाते हैं कि रोगी किसी अन्य मानसिक विकार से तो पीड़ित नहीं है।

मूड जरनल: इसमें मनोचिकित्सक बाइपोलर डिस्आर्डर के कारण मनोदशा में हो रहे बदलावों का चार्ट तैयार करने के लिये कहते हैं। इससे मनोदशा में परिवर्तन के लिये जिम्मेदार परिस्थितयां और ड्यूरेशन की जानकारी मिलती है, जिससे बीमारी की गम्भीरता का पता चलता है।

डॉयग्नोस्टिक क्राइटेरिया: बाइपोलर डिस्आर्डर कन्फर्म करने के लिये डाक्टर डीएसएस अर्थात डॉयग्नोस्टिक एंड स्टेटिस्टिकल मैन्युअल ऑफ मेन्टल हेल्थ डिस्ऑर्डर के अंतर्गत निर्धारित क्राइटेरिया का इस्तेमाल करते हैं।

इलाज-ट्रीटमेंट

इसका इलाज मनो-चिकित्सा (साइकोथेरेपी) और दवाइयों से किया जाता है। साइकोथेरेपी में डाक्टर, मरीज से बातचीत करके उसके विचारों और भावनाओं को समझते हुए डिस्आर्डर दूर करने का प्रयास करता है। इसमें कॉग्नेटिव बिहैवियरल थेरेपी और इंटरपर्सनल साइकोथेरेपी इस्तेमाल होती है।

कॉग्नेटिव बिहैवियरल थेरेपी- मेडिकल साइंस में सीबीटी के नाम से प्रचलित इस थेरेपी में उन नकारात्मक भावों की पहचान पर ध्यान केंद्रित किया जाता है जो बाइपोलर डिस्आर्डर का कारण हैं। एक बार जब ऐसी भावनाओं की पहचान हो जाती है तो चिकित्सक उपचार के लिए रणनीति बनाते हैं।

इंटरपर्सनल साइकोथेरेपी से पता चलता है कि वे कौन सी अनसुलझी समस्यायें (दुख, सम्बन्ध संघर्ष, जीवन में हुए महत्वपूर्ण परिवर्तन, अंतर्निहित सामाजिक दिक्कतें) हैं जिनकी वजह से बाइपोलर डिस्आर्डर ट्रिगर होता है, जब इनकी पहचान हो जाती है तो मनोचिकित्सक इनके उपचार हेतु कुछ सप्ताह पीड़ित की मनोदशा को रचनात्मक रूप से बदलाव की ओर प्रेरित करते हैं।

मेडीकेशन: बाइपोलर डिस्आर्डर के इलाज में एंटीडिप्रेशन दवाओं की सहायता से मरीज को डिप्रेशन से बाहर निकालते हैं। इनसे डिप्रेशन और गुस्सा कम होने से मूड सामान्य होने लगता है।

मूड स्टेबलाइजर (जैसेकि लीथोबिड) दवाओं से मूड स्विंग रोकते हैं ताकि मरीज का इरीटेटिंग स्वभाव कंट्रोल हो व गुस्से में कमी आये। मरीज को अच्छी नींद आये और उसकी उत्तेजना कम हो इसके लिये एंटी एन्जायटी (जैसेकि अल्पारजोलम) दवाओं का प्रयोग होता है। एंटीसाइकोटिक (जैसेकि जायप्रेक्सा) या न्यूरोलेपटिक्स दवाओं का प्रयोग उस स्थिति में किया जाता है जब मरीज वास्तविकता से दूर कल्पनाओं में जीने लगता है।

अन्य थेरेपीज: बाइपोलर डिस्आर्डर के इलाज में इलेक्ट्रोकॉन्वल्सिव थेरेपी (ईसीटी), स्लीप मेडीकेशन, सप्लीमेंट्स और एक्यूपंचर थेरेपी का प्रयोग भी किया जाता है।

प्राकृतिक उपचार और लाइफस्टाइल परिवर्तन

प्राकृतिक उपचार के तहत फिश ऑयल के सेवन से बाइपोलर डिस्आर्डर, एस-एडिनोसिलमेथियॉन जिसे संक्षेप में एसएएसई कहा जाता है नामक एमिनो एसिड सप्लीमेंट के सेवन से मूड डिस्आर्डर और डिप्रेशन तथा रोह्डियोला रोसी नामक पौधे से बनी दवा का सेवन बाइपोलर डिस्आर्डर से हुए मध्यम डिप्रेशन के इलाज में लाभदायक है।

लाइफस्टाइल परिवर्तन के अंतर्गत खाने और सोने का समय तय करना, मनोदशा में आ रहे बदलाव को समझना, अपने परिवार वालों और दोस्तों से ट्रीटमेंट प्लान में मदद के लिये कहना, धूम्रपान, मदिरा व अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से बचना, योगा, मेडीटेशन और नियमित व्यायाम से बाइपोलर डिस्आर्डर को काफी हद तक मैनेज किया जा सकता है।

बाइपोलर डिस्आर्डर और रिलेशनशिप

बाइपोलर डिस्आर्डर किसी भी रिलेशनशिप के लिये खराब है विशेष रूप से रोमान्टिक रिलेशनशिप के लिये तो और भी ज्यादा। रोमान्टिक रिलेशनशिप में अपेक्षायें दूसरे रिश्तों की तुलना में अधिक और अलग होती हैं। ऐसे रिश्ते को लम्बे समय तक निभाने के लिये साथी को पूरी इमानदारी से अपनी बीमारी के बारे में बतायें जिससे वह आपकी परेशानी समझकर रिश्ता निभा सके। साथी को अपनी बीमारी के सम्बन्ध में ये बातें जरूर बतायें-

– पहली बार इस बीमारी के बारे में कब पता चला।

– जब बाइपोलर डिस्आर्डर के लक्षण  (उन्माद/अवसाद) उभरें तो आपका साथी कैसा व्यवहार करे और मनोदशा सामान्य करने में क्या मदद करें।

– बाइपोलर डिस्आर्डर की अवस्था में आप क्या करते हैं और मनोदशा सामान्य होने में कितना समय लगता है।

– आप जो दवायें ले रहे हैं उन्हें किस समय कितनी मात्रा में देना है।

यदि आपका साथी बीमारी की गम्भीरता समझकर साथ देगा तो रिलेशन लम्बे समय तक चल सकता है अन्यथा रिलेशनशिप टूटने से यह डिस्आर्डर और बढ़ जाता है जिससे व्यक्ति आत्महत्या के बारे में सोचने लगता है।

बाइपोलर डिस्आर्डर के साथ जीवन

यह क्रोनिक डिसीस है और इसे दवाओं और अन्य थेरेपीज से मैनेज करके सामान्य जीवन जिया जा सकता है। इसमें जितनी जरूरी दवायें हैं, उतना ही जरूरी आसपास का माहौल और परिवार व दोस्तों का सकारात्मक रवैया है। यदि इलाज का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाना है तो अपने आसपास ऐसे लोगों को रखें जो बीमारी से परिचित हों और उन्हें पता हो कि किस स्थिति में क्या करना है।

मनोदशा में गम्भीर उन्मादी बदलाव के समय धैर्य रखते हुए मरीज को बिना शारीरिक और मानसिक नुकसान पहुंचाये उसे मनोचिकित्सक के पास ले जायें। यदि मरीज गुस्से में है तो उससे बहस न करें। उसकी बातें सुनें पर रियेक्ट न करें और न ही किसी तरह की धमकी दें जैसेकि आप उसे छोड़कर चले जायेंगे। यदि मरीज मृत्यु के बारे में बातें करने लगे तो उसे अकेला न छोड़े और उसके पास से चाकू, बन्दूक, दवाइयां या नुकसान पहुंचाने वाली वस्तुएं हटा लें। उन्मादी और डिप्रेसिव मनोभावों को कंट्रोल होने में समय लगता है इसलिये मरीज के आसपास के लोगों को धैर्य से काम लेना चाहिये। मरीज के आगे नकारात्मक बातें करने से बचें,  उसे शराब और ड्रग्स का सेवन न करने दें और न ही ऐसी परिस्थिति बनने दें जिससे उसे इन सब के लिये मौका मिले।

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