भाजपा, कांग्रेस और बुद्धिजीवी - Naya India
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भाजपा, कांग्रेस और बुद्धिजीवी

यूरोप में ‘इंटेलेक्चुअल’ और ‘आइडियोलॉजी’ जैसी अवधारणाएं फ्रांसीसी क्रांति के समय से आरंभ हुई हैं। भारतीय परंपरा में ऐसी कोई चीज ही नहीं रही। यहाँ तो निःस्वार्थ ऋषि होते थे, जो सत्य के द्रष्टा थे। वे समाज कल्याण के लिए शिक्षा देते थे और सब को अपने उत्तरदायित्व के प्रति सचेत करते थे। यूरोपीय इंटेलेक्चुअल/आइडियोलॉग अपनी वैचारिक परिकल्पनाओं के आग्रही होते हैं, जिसे प्रायः आइडियोलॉजी कहा जाता है। इस रूप में इंटेलेक्चुअल और आइडियोलॉजी अवधारणाओं का प्रयोग शुरू हुए भारत में सौ साल भी नहीं हुए।

हालाँकि, यूरोप में भी नेता लोग बुद्धिजीवियों के प्रति नीचा भाव ही रखते हैं। नेपोलियन ने कहा था कि ये ऐसे लोग होते हैं जो इतिहास के सबकों नहीं, बल्कि अपनी मनमानी बातों को अधिक महत्व देते हैं। बाद में भी, सारी दुनिया में लेनिन, माओ से लेकर थैचर तक आइडियोलॉग बुद्धिजीवियों के प्रति लगभग यही भाव रखते रहे हैं।

यह अकारण नहीं। आइडियोलॉग और सच्चे विद्वानों में अंतर है। विद्वानों का सहज आदर होता है जो समाज को शिक्षा देते हैं। जबकि आइडियोलॉग अपनी मान्यताओं के आग्रही होते हैं। अनेक तो कोई पैमाना भी नहीं मानते। केवल अपने मत के कट्टर होते हैं। हालिया दशकों में भारतीय बुद्धिजीवियों के बीच भी बौद्धिक निकष से अधिक गुटबंदी का महत्व रहा है। भिन्न विचार वालों के प्रति संकीर्णता, असहिष्णुता, उपेक्षा और क्षुद्र चतुराइयाँ अधिक रही हैं। सो, नेपोलियन से लेकर केजरीवाल तक की यह चिढ़ साधार है कि बुद्धिजीवी मनमानी परिकल्पनाएं थोपने पर आमादा रहते हैं। खुद को अधिक अक्लमंद समझते हैं। इसीलिए नेताओं और राजनीतिक बुद्धिजीवियों के बीच सहज संबंध नहीं रहा है। एक तरह से, यह ‘करने वाले’ और ‘लिखने वाले’ के बीच का अहंकार है।

लेकिन इस के बावजूद भारत में नेता और बुद्धिजीवी के बीच सब से स्वभाविक संबंध कांग्रेस ने बनाया। भाजपा समर्थक और कम्युनिस्ट समर्थक बुद्धिजीवियों का इन पार्टिर्यों से संबंध असहज रहा है। उलटे कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों के साथ भी कांग्रेस ने अधिक सहमेल बनाया। जबकि स्वयं कम्युनिस्ट पार्टियाँ उन्हीं बुद्धिजीवियों के प्रति शंकालु रहीं। निखिल चक्रवर्ती, रोमेश थापर, डॉ. रामविलास शर्मा, आदि जैसे मार्क्सवादी बौद्धिकों को कम्युनिस्ट नेताओं से वितृष्णा ही मिली। जबकि इन्हीं से कांग्रेस ने बहुत सम्मानजनक संबंध रखा।

क्या कांग्रेस के साथ बुद्धिजीवियों का संबंध इसलिए स्थाई रहा क्योंकि कांग्रेसी नेताओं को अपने ऊपर विश्वास था? जबकि भाजपा और कम्युनिस्ट नेताओं में कहीं न कहीं हीन भावना थी कि वे बुद्धिजीवियों के साथ समान सहयोग का संबंध नहीं बना सकते? ऐसे नेता अपने समर्थकों को जाने-अनजाने कोरी अनुचरी पर मजबूर करते हैं। क्योंकि उन्हें कुछ बेहतर मालूम नहीं। कुछ बुद्धिजीवी भी लाचारी या अन्य कारणों से ठकुरसुहाती करने लगते हैं। ऐसे में कोई सहज सहयोग संबंध नहीं बन सकता।

जबकि कांग्रेस ने अपने समर्थक बुद्धिजीवियों को उदारता पूर्वक कार्य की स्वतंत्रता दी। उन्हें पद, सम्मान, संसाधन, आदि देकर केवल सर्वोच्च कांग्रेस नेता के प्रति सम्मान और दिया गया काम करने का आग्रह रखा। न कि नियमित जयकारे का। यहाँ तक कि बुद्धिजीवियों द्वारा गाहे-बगाहे पार्टी की आलोचना भी कोई बात नहीं मानी जाती थी। इस से उन में आपसी लाभ का पैटर्न बना। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने सारी अकादमिक गतिविधि को हिन्दू-विरोध में झोंक दिया। सरकारी संस्थानों से राजनीतिक प्रचार चलाया, जिस की धार कांग्रेस की मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी के विरुद्ध थी। इस से कांग्रेस को दूरगामी लाभ होता था। कांग्रेसी इस का महत्व समझते थे। इसलिए, अकारण नहीं कि जब भी कहीं कांग्रेस की सत्ता बनती है, वे फौरी महत्व का कार्य मानकर दो-तीन सप्ताह में सारे अकादमिक, सांस्कृतिक पदों पर वामपंथियों की नियुक्ति कर देते हैं। जबकि भाजपा शासनों में ऐसे पद सालों खाली पड़े रहते हैं। उन्हें न इन कामों का महत्व मालूम है, न उन के संगठन में पर्याप्त ‘अपने’ व्यक्ति हैं जिन्हें वे रेवड़ियों की तरह भी बाँट सकें।

संघ-भाजपा में अपने समर्थक बुद्धिजीवियों के प्रति विश्वास या कार्य-विभाजन की समझ नहीं रही। उन में ‘अपने’ और ‘पराए’ का विकट आग्रह है, जो राष्ट्रीय हित क्या, अपना पार्टी-हित भी दूर तक नहीं देख पाता। वे अपने संगठन, नेता के प्रभाव, और जोड़-तोड़ से चुनाव जीतते है। बुद्धिजीवियों को किताबी बातें करने वाले व्यर्थ लोग मानते हैं। फलतः योग्यता छोड़कर ‘अपने’ वफादार या बेकार व्यक्ति को महत्वपूर्ण अधिकार या संसाधन थमा देते हैं। जिसे कई बार संबंधित काम की समझ तक नहीं होती।

इस मामले में कांग्रेस सिद्धहस्त रही। उस के नेता और सेक्यूलर-वामपंथी बुद्धिजीवी एक दूसरे की योग्यता और अधिकार-क्षेत्र का सम्मान करते हैं। इसीलिए उनका सहज सफल संबंध रहा। बल्कि तेलुगु देशम, तृणमूल, जेडीयू, जैसे कुछ छोटे-छोटे दल भी समाज और पार्टी हित में बौद्धिकों की उपयोगिता बेहतर समझते हैं।

तुलना में भाजपा ने अपने सब से प्रखर बौद्धिक सहयोगियों को भी न केवल उपेक्षित, बल्कि सार्वजनिक रूप से अपमानित तक किया। यह इसलिए और आश्चर्यजनक है क्योंकि उन के समर्थक बौद्धिकों में सच्चे जानकार और प्रतिष्ठित लोग अपवाद स्वरूप ही रहे हैं। इसलिए भी, अरुण शौरी जैसे अनूठे विद्वान की अवमानना करके अपने पक्के निंदक सेक्यूलर-वामपंथी बुद्धिजीवियों की खुशामद करना, भाजपा नेताओं की मतिहीनता और हीन भावना का ही उदाहरण है।

यद्यपि भाजपा नेता हर चीज में कांग्रेस का अनुकरण करते रहे हैं। सेक्यूलरिज्म, ‘विकास’, गरीबों, अल्पसंख्यकों की दिलजोई, राजकोष का दुरुपयोग कर अपनी पार्टी व नेताओं का प्रचार, दल-बदल कराने, जातिवादी हिसाब, ‘आला कमान’, आदि में वे कांग्रेस की ही नकल करते रहे हैं। यहाँ तक कि आलोचना होने पर उऩ के समर्थक कांग्रेस का हवाला भी देते हैं।

परन्तु नीति-निर्माण या शिक्षा-संस्कृति में बौद्धिकों के उपयोग पर संघ-भाजपा में कांग्रेस मॉडल पर भरोसा करने का साहस या समझ, या दोनों नहीं रही है। अनेक वफादार वामपंथी प्रोफेसर, संपादक, कलाविद, आदि का नेहरू-इंदिरा-राजीव के सहयोगी रहना कोई निष्फल समीकरण न था। उस की सफलता इस में थी कि अपने मुख्य दुश्मन – हिन्दू समाज और भाजपा – को नीचा दिखाकर दोनों अपना-अपना काम निकालते रहे। किसी पक्ष को दूसरे से शिकायत न थी। बल्कि आपसी सहयोग की जो संरचना एमिनेंट मार्क्सवादी प्रोफेसरों, प्रगतिशील लेखकों और इंदिरा-राजीव-सोनिया सत्ता ने बनायी, उस से सफल संबंध यहाँ नहीं दिखा है। इस ने देश को क्या हानि-लाभ दिया, अभी इस की बात नहीं हो रही। विशुद्ध पार्टी-हित और रणनीतिक दृष्टि से वह सफल संयोजन था।

उसे केवल चापलूसी, आदि बताना तो विरोधियों की दलील है। लेकिन उस की कार्यकारी सफलता मूल बात है, जो राजनीति में निर्णायक हुआ करती है। फिर, संघ-भाजपा नेता चापलूसी से ऊपर हैं, यह तो स्वयं उन के लोग भी नहीं कहते। अतः कांग्रेस से भाजपा का अंतर मात्र यह है कि इस ने बौद्धिक, अकादमिक क्षेत्र में अयोग्यता पर प्रीमियम रखा हुआ है। यानी भाजपा का समीकरण है:  ठकुरसुहाती एवं अयोग्यता। जबकि कांग्रेस का समीकरण रहा है: आपसी सहयोग एवं योग्यता।

यदि यह मूल्याकंन ठीक न लगे, तो राजनीति में बुद्धिजीवियों के योगदान का कोई पैमाना तय करें। आत्म-श्लाघा या चुनावी जीत, आदि कोई पैमाना नहीं। यह विविध संयोग-दुर्योग पर भी निर्भर रहता है। अतः किसी पार्टी या नेता ने कितने चुनाव जीते, यह उस की सफलता का सब से सटीक आधार नहीं है।

इसलिए प्रश्न बचा रहता हैः वह पैमाना क्या है जिस से परखें कि राजनीति में किसी नेता या बुद्धिजीवी का कितना योगदान रहा? यदि कोई पैमाना नहीं, तब समर्थकों की संख्या ही बचती है, जो प्रायः नेता के पास ही अधिक होते हैं। इसीलिए हिन्दू समाज के लिए अरुण शौरी, सीताराम गोयल, राम स्वरूप, जैसे विद्वानों के अप्रतिम योगदान के बाद भी उन की उपेक्षा करने वाले भाजपा नेताओं का ही जयकारा है। यह न केवल देश के लिए अहितकर, वरन अंततः संघ-भाजपा के लिए भी हानिकर है। चाहे वे इसे न समझें।

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

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