एकल-संप्रभुता के पीछे से झांकता फूस-महल

ऐसा खड़ूस होना भी किस काम का कि किसी की सुनूंगा ही नहीं। न बड़ों की, न बच्चों की। बस, अपने मन की करूंगा। बेर-केर का ऐसा संग आख़िर कब तक निभ सकता है? सो, तय मानिए कि सर्वसमावेशी, उदारमना, जनतंत्रप्रेमी और लिहाज़दार भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को नरेंद्र भाई मोदी के रूप में मिले ‘अ्रंग्रेज़ों के ज़माने के जेलरनुमा’ प्रधानमंत्री के बीच की गलबहियां दस साल पूरे होते-होते तो आर-पार की हाथापाई में तब्दील हो जाएगी।

कोई माने-न-माने, नरेंद्र भाई और भारतवासियों के बीच खटपट की झलकियां तो 2017 के आरंभ से ही दिखनी शुरू हो गई थीं। ढोल-मजीरों की जिस शानदार प्रस्तुति के साथ, अब भूल साबित हो रहे, कमल के फूल 2014 में रायसीना पर्वत पर खिले थे, किसने सोचा था कि तीन साल बीतते-बीतते वे कुम्हलाने लगेंगे? मगर अपने ही बागबान की ऐंठन भरी तेज़ धूप ने उन्हें इतनी जल्दी झुलसाना शुरू कर दिया कि मार्गदर्शक-मंडली भी सिर्फ़ आंसू बहाने के अलावा कुछ नहीं कर पाई। इससे 2019 में नरेंद्र भाई के भावी आसार दरअसल इतने धूसर हो गए कि उन्हें अपनी वापसी के लिए तरह-तरह के तिलिस्म रचने पड़े। जो यह गाते ठुमक रहे हैं कि नरेंद्र भाई तो पहले से भी ज़्यादा सीटें ले कर लोकसभा में लौटे हैं, वे जिस अंकगणित पर फ़िदा हैं, उसका बीजगणित समझेंगे तो छाती पीटने लगेंगे।

चूंकि बीच की इबारत पढ़ने वाली ख़ुर्दबीन सब के पास होती नहीं और नगाड़ों का शोर अच्छे-अच्छों की आंखों पर परदा डाल देता है, इसलिए देखने में लगता है कि साढ़े छह बरस में भारतीय जनता पार्टी लगातार पसर रही है। मगर हक़ीकत यह है कि इस बीच वह सिमट-सिमट कर एक मुट्ठी में क़ैद हो गई है। भाजपा तो भाजपा, उसका पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक स्वायत्तता खो बैठा है। एक ज़माने में अपनी मर्ज़ी से अपने स्वयंसेवकों को यहां-वहां भाजपा की मदद के लिए भेजने वाला संघ अब नरेंद्र भाई के सामने ‘जो हुकुम मेरे आका’ की मुद्रा में है। नरेंद्र भाई के पहले प्रधानमंत्री-काल में, उनके समेत सारे मंत्रियों को, सरकार के कामकाज का बहीखाता लेकर तलब करने की हैसियत रखने वाले मोहन भागवत अब बिना चूं-चपड़ किए बैठे रहने पर मजबूर हैं। उनके पास तो अब फ़रमान जाता है कि किस राज्य के चुनाव में भाजपा की हम्माली करने के लिए कितने हज़ार स्वयंसेवक भेजने हैं। इसके बाद भागवत के पास सिर्फ़ उनकी तैनाती भर का ज़िम्मा रह जाता है।

जब तक अमित शाह थे, तो वे तो फिर भी थोड़े-बहुत भाजपा-अध्यक्ष थे। मगर आपको क्या लगता है कि अब जगत प्रकाश नड्डा कमल-दल पर विराजे हुए हैं? अमित भाई के गुब्बारे को ज़रा पिलपिला करने के लिए नरेंद्र भाई के लच्छे से निकले ‘नड्डा जी आगे बढ़ो, हम आपके साथ हैं’ की हवा से उनका गुब्बारा भले ही फूल गया हो, मगर असली सदरे-अजुमन कौन है, वे भी खूब जानते हैं। तो, भाजपा और संघ की शक्तियों का जिस तरह का केंद्रीयकरण नरेंद्र भाई ने स्वयं की एकल-संप्रभुता में कर लिया है, उस से अंततः होगा क्या? कोई मूढ़मति भी यह आसानी से समझ सकता है कि यह रास्ता सीधे उस खाई की तरफ़ जाता है, जिसमें समाने के बाद बाहर आना तक़रीबन असंभव हो जाता है। नरेंद्र भाई की लोकप्रियता का फुगावा जितना धुंधला होता जाएगा, भाजपा की चमक उतनी ही फीकी पड़ती जाएगी।

इन नौ महीनों में नरेंद्र भाई की आन-बान-शान में नौ गुनी कमी आ गई है। उनके अनुचरों का एक बड़ा तबका मन-ही-मन यह बात समझ कर उनसे छिटक भी गया है। अपने आराध्य के बचाव में सोशल मीडिया पर भाले ले कर घूम रहे लोगों की तादाद में सचमुच भारी कमी आई है। उनकी धार ऐसे ही कुंद नहीं हुई है। वे अचानक विनम्र यूं ही नहीं हो गए हैं। वे दरअसल सच समझ गए हैं। अति-उत्साह में अपने छले जाने का उन्हें अहसास हो गया है। जिसे उन्होंने नायक समझा था, वह प्रतिनायक निकला। वे एक नया ख़्वाब लेकर  जिस नायक के पीछे कूच करते हुए अपने घरों से निकले थे, उसकी रची भूलभुलैया से गुज़र लेने के बाद अब वे पश्चात्ताप-यात्रा पर हैं।

मैं जानता हूं, मेरी ये बातें अपनी स्थूल आंखों से अभी बहुतों को दिखाई इसलिए नहीं देंगी कि वे अपनी सूक्ष्म दृष्टि का इस्तेमाल करने से जानबूझ कर बचना चाहते हैं। आंखें बंद कर बघर्रे की उपस्थिति के भय को जितनी देर नकारा जा सके, वे नकारे रखना चाहते हैं। वे चुनाव नतीजों के आंकड़ों की स्वांतःसुखाय विवेचना कर उसकी मखमली रजाई में लिपटे रहना चाहते हैं। वे इस सच्चाई का सामना नहीं करना चाहते हैं कि हर रोज़ हो रहा हिमपात जिस तरह के दक्षिणी धु्रव का निर्माण उनके लिए कर रहा है, वहां यह नश्वर लिहाफ़ ओढ़ कर वे चार लमहे भी नहीं बिता पाएंगे।

आख़िर तो सारे संसार को चलाने वाला तत्व भाव-प्रवाह ही होता है। भाव बिना भक्ति नहीं होती। भाव बिना प्रेम नहीं होता। भाव बिना काम नहीं होता। भाव बिना समाज नहीं होता। भाव बिना रिश्ते नहीं होते। भाव बिना युद्ध नहीं होते। भाव बिना तो शेयर बाज़ार तक नहीं चलता तो भाव बिना सियासत भला कहां से चल जाएगी? छल-कपट के उपादानों के चलते से ही सही, अगर एक भाव-प्रवाह ने जन्म न ले लिया होता तो क्या नरेंद्र भाई गंगा-पुत्र बने इस तरह हस्तिनापुर पहुंच जाते? इस भाव-प्रवाह के झरने ने अब मुरझाना शुरू कर दिया है। नरेंद्र भाई सोचते हैं कि उनके सियासती आकर्षण पर पड़ चुकी झुर्रियों को वे लीप-पोत कर छिपाए रहेंगे। मगर ये लकीरें उनके चेहरे पर अब इतनी तेज़ी से गहरी होती जा रही हैं कि चेहरा दरकता साफ़ दिखने लगा है।

साढ़े छह साल में हर तरह की आंच का प्रबंधन करने में मिली सफलता ने नरेंद्र भाई के भीतर जैसा भरम भर दिया था, उसे किसानों के एक आंदोलन की शुरुआती लपटों ने ही गंगाघाट दिखा दिया। अपनी ज़िद के चलते वे भले ही किसानों को अपने ठेंगे पर रखे रहें, मगर इस ज़रा-सी चिनगारी ने साबित कर दिया कि नरेंद्र भाई का फुस-महल कितना भुरभुरा है। ज़रा सोचिए, अगर देशवासी सपनीले झक्कू में न आते और कहीं 2016 की आठ नवंबर को रात आठ बजे के बाद उठ कर खड़े हो जाते तो क्या होता? ज़रा सोचिए, अगर छोटे कारोबारी 2017 की 30 जून की आधी रात के बाद सड़कों पर उतर आते तो क्या होता? ज़रा सोचिए, लॉकडाउन के कुप्रबंधन से त्रस्त एक करोड़ से ज़्यादा प्रवासी मज़दूर रोते-कलपते पांव-पांव अपने-अपने घरों की तरफ़ जाने के बजाय दिल्ली की ओर चल देते तो क्या होता? नरेंद्र भाई के पराक्रम का ताशमहल तो इन छह सालों में कब का कई बार बिखर चुका होता। सो, अब तक की शांति-व्यवस्था का श्रेय देश की उस छाती के धैर्य को दीजिए, जिस पर मूंग दलने में एक अधीर शासक ने कोई कसर बाकी नहीं रखी।

किसी के सब्र का कहिए, चाहे किसी के पाप का मानिए, यह घड़ा अब भरने को आ गया है। जिन्हें उनकी सुल्तानी सनक यह अहसास नहीं होने दे रही है कि पानी अब गले-गले तक आ गया है, उनकी सलामती के लिए, आइए, दुआ करें! मेरा ये लेख सहेज कर अपने पास इसलिए रख लीजिए कि 2023 की पहली तिमाही में मैं आपसे इसे दोबारा पढ़ने का अनुरोध करूंगा। आज नहीं, मगर तब आपको महसूस होगा कि मैं ग़लत नहीं था। (लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक हैं।)

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