nayaindia brahmamaaya mahaashakti vaidik devee aditi ब्रह्ममयी महाशक्ति वैदिक देवी अदिति
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ब्रह्ममयी महाशक्ति वैदिक देवी अदिति

स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में कहा है कि, जितने देव शब्द के अर्थ लिखे हाँ उतने ही देवी शब्द के भी हैं। परमेश्वर के तीनों लिंगों में नाम हैं , जैसे – ब्रह्म चितिश्वरेश्चेति  । जब ईश्वर का विशेषण होगा तब देव , जब चिति का होगा तब देवी इससे ईश्वर का नाम देवी है l वेद संहिताओं में अदिति शचि, ऊषा, पृथ्वी, वाक्, सरस्वती, रात्रि, धिषणा, इला, सिनीवाली, मही, भारती, अरण्यानी, निर्ऋति, मेघा, पृश्नि, सरण्यू, राका, सीता, श्री, आदि देवियों के नाम मिलते हैं । … ऋग्वेद के मन्त्रों में बहुतायत से स्त्री देवता अदिति की कथा अंकित है ।

यह परम सत्य है कि वेदों में एकेश्वरवाद अर्थात ईश्वर एक है का प्रतिपादन व महिमामण्डन करते हुए मनुष्यों से, जो एक ही सब मनुष्यों का ठीक -ठीक देखने वाला सर्वज्ञ सुखों की वर्षा करने वाले कर्म व ज्ञान वाला सर्वशक्तिमान सबका स्वामी हैं,  सदा उसी की स्तुति करने के लिए कहा गया है।(ऋग्वेद 6/51/16)। किसी अन्य की विशेष स्तुति अर्थात प्रार्थना उपासना न करो और इस प्रकार अन्यों की स्तुति करके मत दुःख उठाओ । सदा एकांत में और मिलकर किये हुए यज्ञों में सुख, शांति और आनंद की वर्षं करने वाले एक परमेश्वर की ही स्तुति करो और बार बार उसी के स्तुति वचनों का उच्चारण करो (ऋग्वेद 8/1/1)। ऋग्वेद 1/164/46 में तो एक ईश्वर होने का महान सन्देश “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” अंकित प्राप्य हैं ।

फिर भी विद्वान ज्ञानी लोग एक ही सत्यस्वरूप परमेश्वर को विविध गुणों को प्रकट करने के लिए इन्द्र, मित्र,वरुण आदि अनेक नामों से पुकारते हैं । परम ऐश्वर्य संपन्न होने से परमेश्वर को इन्द्र, सबका स्नेही होने से मित्र, सर्वश्रेष्ठ और अज्ञान व अन्धकार निवारक होने से वरुण, ज्ञान स्वरुप और सबका अग्रणी नेता होने से अग्नि, सबका नियामक होने से यम, आकाश,जीवादी में अन्तर्यामिन रूप में व्यापक होने से मातरिश्वा आदि नामों से उस एक की ही स्तुति करते हैं ।उल्लेखनीय है कि परमेश्वर के तीनों ही लिंगों में नाम हैं । महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम सम्मुल्लास में कहा है कि, जितने देव शब्द के अर्थ लिखे हाँ उतने ही देवी शब्द के भी हैं। परमेश्वर के तीनों लिंगों में नाम हैं , जैसे – ब्रह्म चितिश्वरेश्चेति  । जब ईश्वर का विशेषण होगा तब देव , जब चिति का होगा तब देवी इससे ईश्वर का नाम देवी है l वेद संहिताओं में अदिति शचि, ऊषा, पृथ्वी, वाक्, सरस्वती, रात्रि, धिषणा, इला, सिनीवाली, मही, भारती, अरण्यानी, निर्ऋति, मेघा, पृश्नि, सरण्यू, राका, सीता, श्री, आदि देवियों के नाम मिलते हैं ।

ऋग्वेद के मन्त्रों में बहुतायत से स्त्री देवता अदिति की कथा अंकित है । शक्तिधारा की आराध्य ब्रह्ममयी महाशक्ति का आदि श्रौतस्वरुप अखण्ड सत्तास्वरूपा विश्वमयी चेतना अदिति है। यही काली, दुर्गा सर्वदेवीस्वरूपिणी है –

एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ।

नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्त्यासर्वमिदं ततम्।।

उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभीधियते ।

अथर्ववेद में तंत्र में वर्णित महाशक्ति की धारणा, आराधना के मूल का वर्णन है। शक्त्याचार समन्वित तंत्राचार अथर्ववेद की ही भूमिका है । वैदिक देवमण्डल में कालक्रम से महान परिवर्तन हुआ है । अदिति और वाक् अभिन्न हो जाती हैं और वे सरस्वती के स्वरुप में प्रतिष्ठा लाभ करती हैं । वैदिक सोम केनोपनिषद की हेमवती उमा हो जाती है और वह रणदेवी के रूप में महादेवी का स्वरुप धारण करती है ।

ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों में अम्बिका, इन्द्राणी, रूद्राणी, शर्वाणी, भवानी, कात्यायनी, कन्याकुमारी, उमा, हैमवती आदि का उल्लेख मिलता है । किन्तु स्वातंत्र्य एवं गौरव की दृष्टि से मातृ प्रधान शक्ति अदिति ही है । ऋग्वेद में अदिति का अस्सी बार उल्लेख प्राप्त होता है ।

अखण्ड, बन्धनरहित, सर्वव्यापिनी द्यौरन्तरिक्षरूपा जननात्मिका आद्याशक्ति का का चिन्मय ज्योति के रूप में निर्देश मिलता है –

अदितिद्यौरदितिरन्तरिक्ष मदितिर्माता सा पिता सा पुत्रः ।

विश्वेदेवा अदिति पञ्च जाना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम ।।

-ऋग्वेद 1/89/10

ऋग्वेद में अदिति, विशेषरूप से, सार्वभौम सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित हुई है। अथर्ववेद में अदिति पुत्रकामना से ब्रह्मौदन पकाती हुई चित्रित की गयी है। अथर्ववेद के एक अन्य स्थान पर प्रजापति भी ब्रह्मप्राप्ति के लिये ओदन पकाते हुए दिखाये गये हैं। विद्वानों के अनुसार अथर्ववेद से स्पष्ट रूप से प्रभावित ब्राह्मण-ग्रन्थों में अदिति पुत्रकामना से साध्य देवों से बचे हुए ब्रह्मौदन को खाने से गर्भ धारण करती है तथा उससे मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र, विवस्वान् आदि देव जन्म लेते हैं। एक अन्य ब्राह्मण-ग्रन्थ में प्रजा-कामना से पकाये गये उच्छिष्ट ओदन का भक्षण करने से उसके गर्भ से आदित्यों के जन्म लेने का उल्लेख मिलता है।

पौराणिक आख्यान के अनुसार ब्रह्मा के छः मानस पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र मरीचि की पत्नी कर्दम ऋषि की पुत्री कला से कश्यप और पूर्णिमा नाम के दो पुत्र हुए। दूसरी और मनु की तीसरी पुत्री प्रसूति का ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति से विवाह हुआ। इनकी सोलह कन्यायें थीं। इनमें से दक्ष ने तेरह धर्म, एक अग्नि, एक पितरों और एक शंकर को प्रदान की।

दक्ष प्रजापति की दूसरी पत्नी असिक्मनी के गर्भ से साठ कन्यायें उत्पन्न हुईं। दक्ष प्रजापति ने उनमें से तेरह कन्याओं का विवाह कश्यप, सताईस का चन्द्रमा, दस का धर्म, भूत, अङ्गिरा और कृशाश्व के साथ दो-दो पुत्रियों का तथा शेष चार का विवाह तार्क्ष्य नामक कश्यप के साथ किया। पौराणिक मान्यता के अनुसार कश्यप के साथ दक्ष प्रजापति की निम्न तेरह कन्याओं का विवाह हुआ- अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा और तिमि। इनसे ही समस्त प्राणि-समुदाय आविर्भूत हुआ है। भागवत पुराण के अनुसार अदिति से बारह पुत्र उत्पन्न हुए, जो द्वादशादित्य नाम से जाने जाते है- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम। लेकिन महाभारत आदिपर्व के अनुसार अदिति के तैंतीस पुत्र हुए, उनमें से बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र तथा आठ वसु हैं।

उपर्युक्त भागवत पुराण में परिगणित द्वादशादित्य के कुछ नाम भी महाभारत से मेल नहीं खाते हैं। भागवत के विधाता, इन्द्र और त्रिविक्रम के स्थान पर महाभारत में अंश, शक्र और विष्णु नामों का परिगणन किया है। इनमें से इन्द्र और त्रिविक्रम के पर्यायवाची क्रमशः शक्र और विष्णु हैं। अदिति से उत्पन्न होने वाले पुत्र दो-दो के युगलों में हुए, ऐसी ब्राह्मण-ग्रन्थों की मान्यता है, जैसे-धाता और अर्यमा, इन्द्र और विवस्वान्, अंश और भग। सम्भवतः, भागवत पुराण में भग का युग्म विधाता के साथ बनाया है। अदिति के सम्बन्ध में पुरानों में वर्णित सन्दर्भों में दक्ष प्रजापति, कश्यप, अदिति, आदित्य आदि का वर्णन होने से वैदिकरूप के साथ इनका पर्याप्त साम्य दृष्टिगोचर होता है, परन्तु सत्य इसके विपरीत है ।

ऋग्वेद के अनुसार दक्ष अदिति के पिता भी हैं और पुत्र भी। एक सूक्त की ऋषिका अपने को अदिति दाक्षायणी बतलाती है। इसी सूक्त के एक अन्य मन्त्र में अदिति को दक्ष की दुहिता बताया गया है। ऋग्वेद के एक अन्य स्थल पर असत् (अव्यक्त) और सत् (व्यक्त) को परमव्योम (आकाश) में स्थित बताते हुए दक्ष का जन्म अदिति की गोद से होने का उल्लेख है। एक दूसरे स्थान पर यह कहा गया है कि अदिति और दक्ष के जन्म (उदय) के समय उनसे मित्रावरुण नामक राजा प्रकट होते हैं।

ऋग्वेद के विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि अदिति और दक्ष एक-दूसरे जनक हैं। ऋग्वेद 10-72 के अनुसार उत्तानपाद नामक राजा से भू जन्म लेती है, उस भू से आशायें उत्पन्न होती हैं, उसके बाद दक्ष से अदिति और अदिति से दक्ष का जन्म होता है। यह इतरेतर विरुद्ध जन्म सम्भव प्रतीत नहीं होता है। इससे स्पष्ट है कि यह मानवी इतिहास नहीं है, परन्तु बाद में इन्ही वैदिक शब्दों के आधार पर मानवों ने अपने संतानों के नाम रख लिए । जिससे लोगों में विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई । यास्क इसको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि ये समानजन्मा हैं अर्थात् एक-दूसरे के तत्काल पश्चात् जन्म लेने वाले देवता हैं। एक अन्य स्थान पर देवता-स्वरूप विषयक विवेचन करते हुए आचार्य यास्क कहते हैं कि मनुष्यधर्म से देवताधर्म विपरीत होता है, देवता ऐश्वर्यशाली होते हैं, जबकि मनुष्य ऐश्वर्य से रहित। मनुष्यों में पिता से पुत्र उत्पन्न होता है और किसी भी अवस्था में पुत्र अपने पिता का जनक नहीं हो सकता। जबकि वेद में पुत्र भी अपने पिता का जनक हो सकता है।

निरुक्त के अनुसार प्रस्तुत प्रकरण में अवश्याय रसप्रदान करने के कारण अदिति मध्यस्थानी देवता है तथा दक्ष का अर्थ आदित्य है। प्रातःकाल की सन्धिवेला में अवश्याय रसप्रदान करने के कारण अदिति पहले से विद्यमान है। इसलिये अदिति माता है और दक्ष पुत्र है। सायंकाल की सन्धिवेला का जनक दक्ष है, अतः, उस समय दक्ष पिता और अदिति पुत्री है। इस व्यवस्था के मूल में निहित सिद्धान्त की स्थापना करते हुए आचार्य यास्क कहते हैं कि ये कर्मजन्मा हैं अर्थात् जिस क्षण कर्म आरम्भ होता है, वह उस देवता का जन्मकाल है। कहने का आशय यह है कि कर्म का प्रारम्भ ही जन्म है। ब्राह्मण-ग्रन्थ दक्ष को पिता प्रजापति के रूप में चित्रित करते हैं। शतपथ-ब्राह्मण सूर्य को प्रजापति बतलाता है। ऋग्वेद द्युलोक को पिता तथा पृथिवी का माता के रूप में उल्लेख करता है और कहता है कि पिता प्रजापति ने दुहिता के गर्भ स्थापित किया। वस्तुतः, आदित्यरूप पिता प्रजापति दक्ष है तथा महनीय अखण्ड पृथिवी माता अदिति है। निघण्टु में पृथिवी वाचक नामपदों में अदिति परिगणित है। इसके अतिरिक्त मन्त्र में पृथिवी को दुहिता कहा है तथा दूसरी ओर ऋग्वेद का ऋषि अदिति को दक्ष की दुहिता बतलाता है। यास्काचार्य के अनुसार दुहिता का निर्वचन है- दूरे हिता अर्थात – जिसका दूर रहने में हित है या जो दूर स्थित है। इस प्रकार पृथिवी दूर स्थित तथा सूर्य का अंश होने से दक्ष की पुत्री है। वह सूर्य ही वृष्टि के माध्यम से पृथ्वी से औषधि आदि रूप वनस्पतियों को जन्म देता है। अतः, ऋग्वेद में पिता प्रजापति को दुहिता के गर्भ स्थापित करने वाले के रूप में चित्रित किया है।

पौराणिक ग्रन्थों में कश्यप को प्रधान प्रजापति कहा गया है। महाकवि कालिदास ने भी कश्यप को प्रजापति कहा है। पौराणिक मान्यतानुसार ब्रह्मा के छः मानस पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र मरीचि की पत्नी तथा कर्दम ऋषि की पुत्री कला से कश्यप उत्पन्न हुए और उन्हीं से सम्पूर्ण प्राणि-समुदाय आविर्भूत हुआ है। ब्राह्मण-ग्रन्थों से भी इसकी पुष्टि होती है। शतपथ-ब्राह्मण में कश्यप का अर्थ कूर्म करते हुए कहा गया है कि प्रजापति ने कूर्मरूप धारण करके प्रजा का सृजन किया। इस कारण प्रजापति कूर्म कहलाते हैं। शतपथ ब्राह्मण आगे कहता है कि कश्यप ही कूर्म है। कूर्मरूप कश्यप से सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है, इसलिये सारी प्रजा काश्यप्य अर्थात कश्यप की सन्तान है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में अनेक स्थानों पर प्रजापति को देव, दानव, सुर, असुर तथा अन्य सभी प्राणियों एवं अप्राणिजगत् का जनक बताया गया है। तैत्तिरीय आरण्यक कश्यप का निर्वचन पश्यक से करता हुआ कहता है कि जो सबको सूक्ष्मदृष्टि से देखता है, वह कश्यप है।

इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती का अभिमत है कि प्रजा को उत्पन्न करने से वह परमेश्वर कूर्म्म तथा ज्ञान से देखने के कारण वह कश्यप है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रजापति होने के कारण कश्यप सम्पूर्ण प्रजा को उत्पन्न करने वाले हैं और इसी रूप में पुराण, महाभारत आदि पुरातन ग्रन्थों में उनका चित्रण हुआ है। इसलिये उनका परवर्ती साहित्य में चित्रितरूप भिन्न होते हुए भी मूलरूप वैदिकरूप से भिन्न नहीं है ।जहाँ तक कश्यप के मारीच होने का प्रश्न है, इसका आधार भी ऋग्वेद है। ऋग्वेद में केवल एक बार कश्यप का उल्लेख पाया जाता है, वहाँ इसको मारीचि पुत्र बताया गया है। इस प्रकार पुराणों की विशद कल्पना का आधार वैदिक साहित्य के उपर्युक्त संकेत हैं, जिनको वैदिक साहित्य के आधार पर ही समझा जा सकता है।

पुराणों में अदिति को देवमाता, विशेषरूप से, आदित्यों की माता के रूप में चित्रित किया गया है। भागवत पुराण में कश्यप पत्नियों को लोकमाता शब्द से अभिहित किया है। आचार्य यास्क भी अदिति को देवमाता नाम से पुकारते हैं। निरुक्त के वृत्तिकार आचार्य दुर्ग एवं स्कन्दस्वामी देवमाता सम्बोधन को ऐतिहासिक-पक्ष का अभिधेय मानते हैं।

अदिति के चरित्र की उक्त विशेषताओं का दर्शन ऋग्वेद में भी होता है। अदिति के चरित्र की, यदि कोई सर्वाधिक प्रमुख विशेषता है, तो वह उसका मातृत्व ही है। आदित्यों की माता के रूप में उसका अनेकशः उल्लेख हुआ है। ऋग्वेद में उसे कहीं पुत्रों को धारण करने वाली माता बताया गया है तो कहीं उससे अपने पुत्र आदित्यों के साथ आकर सुखप्रदान करने की प्रार्थना की गयी है, तो कहीं उसको अश्व के समान बलवान् मित्रावरुण पुत्रों को गर्भ में धारण करने वाला बताया गया है, कहीं मित्रावरुण, अर्यमा- इन राजपुत्रों की माता के रूप में उसका उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार कहीं अदितेः पुत्रासः कहकर आदित्यों की माता बताया गया है, कहीं अदिति के पुत्र आदित्यों को मनुष्यों की जीवनज्योति की रक्षा करने वाले के रूप में प्रतिपादित किया गया है। वरुण के क्रोध से रक्षा करने के लिये भी इसका आह्वान किया गया है। एक स्थान पर भग को अदिति का पुत्र बताया गया है। एक अन्य स्थान पर अदिति को अष्टौ पुत्रासः कहकर पुकारा गया है। इनमें सात पुत्र अदिति के समीप रहने वाले हैं, एक पुत्र जिसका नाम मार्तण्ड है, को प्रजा का विनाश करने वाले के रूप में निरूपित किया गया है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि अदिति के आठ पुत्र हैं। जिसमें से पाँच पुत्रों -मित्र, वरुण, भग, अर्यमा, मार्तण्ड- का नाम सहित उल्लेख मिलता है। शेष कौन से तीन अदितिपुत्र वैदिक ऋषियों को अभिप्रेत हैं, यह अस्पष्ट है।

पुराण तथा महाभारत सामान्यरूप से अदिति के बारह पुत्रों का नाम सहित उल्लेख करते हैं, परन्तु हैरतनाक बात है कि वेदों में उल्लिखित अदिति के आठ पुत्र पुराणों में बारह हो गये। यह कैसे हो गये यह गवेषणा का विषय है। स्मरणीय है कि ब्राह्मण-ग्रन्थों ने अदिति के आठ पुत्रों का उल्लेख किया है। विकृत होने वाले अष्टम आदित्य के रूप में मार्तण्ड को माना गया है। तैत्तिरीय-ब्राह्मण में उच्छिष्ट ओदन को खाने से अदिति द्वारा उत्पन्न होने वाले आठ आदित्यों का नाम सहित उल्लेख देखने को मिलता है- धाता, अर्यमा, मित्र, वरुण, अंश, भग, इन्द्र और विवस्वान्। ताण्डय़ महाब्राह्मण से भी उक्त कथन की पुष्टि हो जाती है। इस प्रकार वेद में प्रतिपादित आठ पर नाम सहित परिगणित पाँच नामों के अतिरिक्त ब्राह्मण-ग्रन्थों ने चार नाम और परिगणित किये है – धाता, अंश, इन्द्र, विवस्वान्। कुल मिलाकर ये नौ हो जाते हैं। उपर्युक्त ब्राह्मण वचन आठ पुत्र परिगणित करते समय मार्तण्ड का अदिति के पुत्र के रूप में उल्लेख नहीं करता है, जबकि ऋग्वेद तथा अन्य ब्राह्मण-वचनों में मार्तण्ड को अदिति का पुत्र बताया गया है। द्वादशादित्य की अवधारणा के साथ-साथ ब्राह्मण-वचन एकविंश आदित्य की अवधारणा का भी समर्थन करते हैं। पाँच ऋतुएँ, द्वादश मास, तीन लोक और एक आदित्य- ये सब मिलकर 21 (इक्कीस) आदित्य कहलाते हैं।

पुरातन ग्रन्थों के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि द्वादश मास के कारण आदित्य को द्वादश माना गया। ब्राह्मण-वचनों से इस कथन की पुष्टि हो जाती है। वेद ने भी संवत्सर को द्वादशारम्, द्वादशाकृतिः, द्वादश प्रधयः, द्वादशमासः कहा है। सम्भवतः, इसी आधार पर ब्राह्मण-ग्रन्थों तथा पुराणों में आदित्य को द्वादशात्मक मान लिया है। इसके अतिरिक्त दूसरा कारण यह प्रतीत होता है कि वेदों में आदित्य वाचक देवता 12 और उससे अधिक भी मिल जाते हैं। अतः, पुराणों ने ब्राह्मण-ग्रन्थों के द्वादशादित्य के आधार पर अदिति पुत्रों को 12 मान लिया है। इसी प्रकार आदित्य नामकरण होने में भी दो भिन्न-भिन्न कारण हैं। प्रथम- अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य कहलाये, उसी स्थिति में ब्राह्मण-ग्रन्थ इन्हें आठ से अधिक मानने को तैय्यार प्रतीत नहीं होते। द्वितीय-आदित्य नामकरण का दूसरा आधार आदत्त अर्थात ग्रहण करना है। ब्राह्मण-ग्रन्थ तथा निरुक्त में इसका निर्वचन आदत्त से किया है। सम्भवतः, इस पक्ष में ब्राह्मण-ग्रन्थों में अनेक वस्तुओं को आदित्य नाम से अभिहित किया है, जैसे-देवलोक, धाता, पशु, प्रजा, प्रजापति, प्राण, तप आदि। लेकिन ब्राह्मण-ग्रन्थ आदित्य की तरह अदिति का भी निर्वचन आदत्त से करते हैं। उस स्थिति में उपर्युक्त वर्गीकरण का आधार कुछ क्षीण पड़ जाता है।

भारतीय पुरातन ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि वेद को अदिति के आठ पुत्र ही स्वीकार हैं, ब्राह्मण-ग्रन्थ भी प्रमुखरूप से इसी मत का प्रतिपादन करते हैं, परन्तु उन्होंने वेद में वर्णित संवत्सर के द्वादश मासों के आधार पर आदित्य को द्वादशात्मक मानना प्रारम्भ कर दिया था। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण-ग्रन्थों ने इक्कीस और सात आदित्य मानने का भी संकेत दिया है। लेकिन जहाँ एकविंश आदित्य माने हैं, वहाँ उनमें द्वादश मासों का भी समाहार कर लिया गया है। कुछ स्थानों पर ब्राह्मण-ग्रन्थ आदित्य के द्वादशात्मक होने के आधार पर जगती छन्द के साथ समीकृत करते हैं। ऐसे में प्रश्न उत्पन्न होता है कि वैदिक द्वादशमास तथा पुराणों में वर्णित अदिति के द्वादश पुत्रों में समता का आधार क्या है? जबकि वैदिक अदिति के अष्ट पुत्रों तथा पौराणिक द्वादश पुत्रों में पर्याप्त साम्य है।

ध्यातव्य है कि वेद और ब्राह्मण-ग्रन्थों में परिगणित अदिति के अष्टपुत्र सूर्यवाचक हैं तथा पुराणों में परिगणित अदिति के द्वादश पुत्रों के नाम भी सूर्यवाचक हैं। दूसरी ओर वैदिक साहित्य में द्वादशमास के कारण आदित्य को द्वादाशात्मक माना जाने लगा, इस कारण पुराणों मे अदिति के आठ पुत्रों के साथ चार अन्य सूर्य वाचक नामों का समाहार करके, अदिति को द्वादश पुत्रात्मक माना जाने लगा । इस प्रकार वैदिक अदिति के अष्ट पुत्र और वेद में प्रतिपादित द्वादशमास रूप आदित्य कालान्तर में पुराण-साहित्य तक आते-आते एक हो गये और अदिति द्वादश पुत्रों वाली मानी जाने लगी।

अदिति को भगिनी के रूप में भी चित्रित किया गया है। पुराण, महाभारत आदि पुरातन ग्रन्थों के अनुसार अदिति की बारह बहिनें थी- दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, इला, मुनि, क्रोधवशा, ताम्रा, सुरभि, सरमा, तिमि।भिन्न-भिन्न पुराणों में इनके नामों में भेद पाया जाता है, लेकिन इन सभी का विवाह कश्यप के साथ ही हुआ है। ऋग्वेद में अदिति की दस स्वसाओं का उल्लेख देखने को मिलता है, परन्तु वहाँ उनके नाम परिगणित नहीं किये गये हैं। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार अदिति की एक बहिन दिति है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में तीन बार आया है, दो बार अदिति के साथ और एक बार अदिति के विना। एक स्थान पर यह कहा गया है कि मित्र और वरुण अपने रथ से अदिति और दिति को देखते हैं। एक दूसरे स्थान पर दिति को प्रदान तथा अदिति से सुरिक्षत रखने के लिये अग्नि का स्तवन किया गया है और एक अन्य स्थल पर उसे वाञ्छनीय वस्तुएँ प्रदान करने वाला कहा गया है। वाजसनेयी-संहिता एवं अथर्ववेद में भी दिति का अदिति के साथ उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद में इसके पुत्रों का उल्लेख मिलता है। शतपथ-ब्राह्मण में भी अदिति और दिति से एक साथ दर्शन देने की प्रार्थना की गयी है। इस प्रकार दिति को अदिति की बहिन मानने का पौराणिक ग्रन्थों का आधार स्पष्ट हो जाता है, परन्तु अन्य एकादश बहिनों के नाम एवं उनका चरित्रगत वैशिष्टय़ वैदिक साहित्य से स्पष्ट नहीं होता है।

ऋग्वेद में एक स्थान पर अदिति को सर्पभगिनी बताया गया है। परन्तु पौराणिक ग्रन्थों का मत इससे कुछ भिन्न है। उसके अनुसार अदिति की एक बहिन कद्रु से नाग तथा उसकी सपत्नी सुरभि से सर्प उत्पन्न हुए। भागवत पुराण के अनुसार अदिति की बहिन एवं सपत्नी क्रोधवशा से सर्प आदि जन्तु उत्पन्न हुए। ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वैदिक भगिनीत्व पुराणों में भागिनेयत्व में परिणत हो गया है।

पुराणों में अदिति के बारहवें पुत्र का नाम त्रिविक्रम, उरुक्रम या विष्णु बताया है। ऋग्वेद से भी इन दोनों नामों की पुष्टि हो जाती है। लेकिन ऋग्वेद से ऐसा कोई संकेत कोई प्राप्त नहीं होता, जिससे यह सिद्ध हो सके कि विष्णु अदिति पुत्र हैं। ब्राह्मण-ग्रन्थ भी सामान्यतया इस तथ्य की पुष्टि नहीं करते कि अदिति के किसी पुत्र का नाम विष्णु था, लेकिन आदित्य की एक विशिष्ट अवस्था का नाम विष्णु होता है, यह अवश्य प्रतिपादित करते हैं। उनके अनुसार प्रकाश धारण करता हुआ सविता, उदित होने वाला विष्णु, उदित होता हुआ पुरुष, उदित हुआ बृहस्पति, अभिप्रयाण करता हुआ इन्द्र, माध्यन्दिन में वैकुण्ठ, अपराह्ण में भग, अस्तकाल में उग्र एवं लोहित वर्ण का होता हुआ आदित्य यम कहलाता है।

पौराणिक ग्रन्थ स्पष्ट रूप से कश्यप का अदिति के पति के रूप में उल्लेख करते हैं , परन्तु ऐसा कोई संकेत वैदिक साहित्य में उपलब्ध नहीं होता है। अथर्ववेद में पुत्रकामना से पति वाली अदिति के ओदन पकाने का वर्णन प्राप्त होता है। इसी सूक्त के एक अन्य मन्त्र में ब्रह्म से शुद्ध एवं घृत से पवित्र किये गये सोम के अंश यज्ञीय तण्डुल को पकाने का उल्लेख मिलता है। एक स्थान पर अदिति के लिये नारी का सम्बोधन करते हुए ब्रह्मौदन को देवताओं से परोसने का निर्देश दिया गया है। ब्राह्मण-ग्रन्थों में भी कुछ इसी प्रकार का वर्णन उपलब्ध होता है। उनके अनुसार अदिति ने पुत्रों की कामना से साध्य देवों के लिये ब्रह्मौदन पकाया। उसका उच्छिष्ट ओदन खाने से उसने गर्भ धारण किया। जिससे उससे पहले धाता और अर्यमा, तत्पश्चात् मित्र और वरुण, तदनन्तर अंश और भग और अन्त में इन्द्र और विवस्वान् ने जन्म लिया। ब्राह्मण-ग्रन्थों के आधार पर आदित्यों के पिता और अदिति के पति साध्यदेव हैं, जबकि अथर्ववेद में पति वाली मानते हुए भी अदिति के पति का नामपूर्वक उल्लेख नहीं किया है। लेकिन अथर्ववेद के एक अन्य स्थल पर सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाले प्रजापति को अपने तप से ब्रह्म के लिये ओदन पकाते हुए चित्रित किया है। इस प्रकार अथर्ववेद में प्रजापति और अदिति दोनों में ओदनकर्म की समानता देखी जा सकती है। इस समानता के आधार पर दोनों को पति-पत्नी मान लेना अनुचित नहीं माना जा सकता। ब्राह्मण-ग्रन्थ अदिति के पति के रूप में साध्य देवों को स्वीकार कर चुके हैं। कपिष्ठलकठ-संहिता जिनका अपना कुछ नहीं है और जो मन्थन से उत्पन्न अग्नि में आहुति देते हैं, ऐसे पूर्व देवों को साध्यदेव मानती है, जैमिनीय-ब्राह्मण के अनुसार ये साध्यदेव छतीस हैं, जबकि सायण के अनुसार आदित्य अङ्गिरस ये दो ही साध्यदेव हैं। परन्तु एक अन्य ब्राह्मण-वचन में अदिति को विष्णु की पत्नी बताया गया है। ऐतरेय-ब्राह्मण में आदित्य के जनक के रूप में प्रजापति को निरूपित किया है। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अदिति के पति के विषय में वेद, ब्राह्मण-ग्रन्थ और पुराण-साहित्य एकमत नहीं हैं। वेद जहाँ अदिति के पति का नामोल्लेख नहीं करता, वहाँ ब्राह्मणग्रन्थ साध्य देवों और विष्णु को अदिति का पति बतलाते हैं, जबकि पुराण-साहित्य अदिति के पति के रूप में कश्यप की प्रतिष्ठा करता है।

 

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि अदिति और कश्यप दैवी शक्ति के प्रतीक हैं। आदित्यों और देवों की जननी देवमाता अदिति का वेदों में सम्भवतः भूमिमाता के रूप में चित्रण हुआ है। ऋग्वेद में अनेकशः अदिति का अर्थ पृथिवी है या यह कह सकते हैं कि ऋग्वेद में प्रायः अदिति शब्द भूमि अर्थ का वाचक है। जहाँ सार्वभौमिक सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में अदिति का उल्लेख हुआ है, वहाँ अदिति को भूमि माता माना गया है। गौतम ऋषि द्यौ, अन्तरिक्ष, माता-पिता, पुत्र, विश्वेदेवा, पञ्चजन तथा वह सब जिसने जन्म लिया है और जन्म लेगा, को अदिति मानते हैं। यहाँ सायण की दृष्टि में अदिति का अर्थ पृथिवी है अर्थात् पृथिवी ही द्यौ, अन्तरिक्ष, माता-पिता, पुत्र इत्यादि है। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण-ग्रन्थों से भी इस तथ्य की पुष्टि हो जाती है। आचार्य यास्क ने अवश्याय रसप्रदान करने वाली मध्यस्थानी देवता मानते हुए अदिति का अर्थ अग्नि स्वीकार किया है। निघण्टुकोष में पृथिवी अर्थ के अतिरिक्त अदिति वाक्, द्यावापृथिवी, गो अर्थ में और पठित है। पर इन अर्थों में अदिति का प्रयोग विरल हुआ है।

इसलिये यह माना जाना चाहिये कि आदित्यों और देवों की माता अदिति, जिसका रूप ऋग्वेद में मूर्त नहीं हो पाया है, को भूमाता का प्रतीक मानकर और उसमें पृथिवी की तरह मातृत्व का समावेश करके अथर्ववेद, ब्राह्मण-ग्रन्थ और पुराण-साहित्य में उसका चित्रण हुआ है। इसी तरह कश्यप को प्रजापति का प्रतीक माना जाना चाहिये। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि प्रजापति का अर्थ आदित्य भी होता है। ऋग्वेद में दक्ष अर्थात् आदित्य से अदिति उत्पन्न होती है और अदिति से दक्ष अर्थात् जो एक समय पुत्र होता है, वह दूसरे समय पिता हो सकता है। शतपथ-ब्राह्मण के अनुसार प्रजापति पिता भी है और पुत्र भी। जब यह अग्नि का सृजन करता है, तब यह अग्नि का पिता और अग्नि इसका पुत्र है, लेकिन जब अग्नि प्रजापति को धारण करती है, उस समय प्रजापति पुत्र है तथा अग्नि उसका पिता है। इसी प्रकार जब यह देवताओं का सृजन करता है, तब यह देवताओं का पिता और जब देवता इसको सम्यक्तया धारण करते हैं, तब देव पितर होते हैं और प्रजापति पुत्र। देवता-स्वरूप का विवेचन करते हुए आचार्य यास्क ने इस तथ्य का प्रतिपादन किया है कि देवता एक-दूसरे के तत्काल पश्चात् जन्म लेने वाले देवता हैं। एक अन्य स्थान पर देवता-स्वरूप विषयक विवेचन करते हुए आचार्य यास्क कहते हैं कि मनुष्यधर्म से देवताधर्म विपरीत होता है, देवता ऐश्वर्यशाली होते हैं, जबकि मनुष्य ऐश्वर्य से रहित। मनुष्यों में पिता से पुत्र उत्पन्न होता है और किसी भी अवस्था में पुत्र अपने पिता का जनक नहीं हो सकता। जबकि वेद में पुत्र भी अपने पिता का जनक हो सकता है।

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