nayaindia British laws change अंग्रेजों के कानून बदलों बनिस्पत सड़कों के नाम बदलने के!
गेस्ट कॉलम| नया इंडिया| British laws change अंग्रेजों के कानून बदलों बनिस्पत सड़कों के नाम बदलने के!

अंग्रेजों के कानून बदलों बनिस्पत सड़कों के नाम बदलने के!

क्या सड़कों के नाम बदलने और मूर्तियों को खड़ा करने से क्या इस देश में औपनिवेशिक शासन की विरासत गायब हो जाएगी, इस पर चर्चा करने की जरूरत है। मार्क टुली ही नहीं, कई बुद्धिजीवियों ने कई मौकों पर यह राय दी है कि इस देश में कानूनों, प्रणालियों और उपकरणों को बदले बिना कोई बदलाव नहीं हो सकता है। उन बुद्धिजीवियों ने आलोचना की कि इस देश के अधिकांश सरकारी अधिकारी सोचते हैं कि वे ही इस देश पर शासन कर रहे हैं और लोगों को अपने पर आश्रित और भिखारी मानते हैं।

अंग्रेजों ने अपने औपनिवेशिक राज्य को चलाने के लिए जो प्रशासनिक व्यवस्था बनाई थी, वह अब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चला रही है। भारत में स्थित प्रमुख ब्रिटिश पत्रकार मार्क टुली ने कहा कि जब मैं 25 वर्ष की आयु का था तब भी हमारे परदादा ब्रिटिश उपनिवेशवादियों द्वारा लिखे गए कानूनों को लागू किया जा रहा था और आज भी किया जा रहा है।  इससे देश को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहा है। उन्होंने कहा कि आज के राजनेता भी औपनिवेशिक युग के कानूनों का उपयोग कर रहे हैं जिनका इस्तेमाल अंग्रेजों ने भारत का शोषण करने के लिए किया था। लगभग पांच दशक से भारत में रह रहे मार्क टुली भारतीय संस्कृति के कायल हैं और यहीं बसे हैं। उन्होंने हमारे देश के बारे में कई किताबें लिखीं।

उन्होंने बताया हुआ है कि उपनिवेशवाद की विरासत भारतीय नेताओं की भारत में व्यवस्थाओं को आधुनिक समय के अनुकूल बनाने में असमर्थता के कारण जारी है। एक अमेरिकी अर्थशास्त्री को उद्धृत करते हुए मार्क टुली ने कहा “भारत एक असफल देश नहीं बल्कि अप्रचलित उपकरणों वाला देश है। आपके पास सरकारें हैं,  संगठन हैं। लोकतंत्र के लिए जरुरी हर एक चीज हैं। सरकार नीतियां बनाती है। लेकिन उन पर अमल नहीं हो रहा है। यह एक व्यक्ति के सिकुड़े हुए कंधे की तरह है। कंधा तो होगा लेकिन बढ़ाया नहीं जा सकता “.

मार्क टुलो के विचारों को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया घोषणा के मद्देनजर प्रमुखता मिली कि नरेंद्र मोदी ने भारतीयों को गुलाम मानसिकता से मुक्त करने के लिए दिल्ली के इंडियागेट पर राजपथ का नाम बदलकर कार्तव्यपथ कर दिया। भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा को मोदी की तरह प्रभावी रूप से सिद्ध करने की शक्ति  पार्टी के किसी अन्य नेता के पास नहीं है। मोदी यह कहने की डटकर कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस ने इस देश पर सात दशकों तक शासन किया है लेकिन औपनिवेशिक युग की गुलाम मानसिकता को नहीं बदल पाई। जबकि अब वे देश को नया बना रहे हैं। इस देश को सच्ची स्वतंत्रता की ओर ले जा रहे हैं। मोदी तिरंगा फहराते हुए आजाद हिन्द फौज की झंडा फहराने वाले  नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद कराते है था। इस से कल्पना कर सकते हैं कि मोदी अपनी तुलना किस से कर रहे हैं।

मगर क्या सड़कों के नाम बदलने और मूर्तियों को खड़ा करने से क्या इस देश में औपनिवेशिक शासन की विरासत गायब हो जाएगी, इस पर चर्चा करने की जरूरत है। मार्क टुली ही नहीं, कई बुद्धिजीवियों ने कई मौकों पर यह राय दी है कि इस देश में कानूनों, प्रणालियों और उपकरणों को बदले बिना कोई बदलाव नहीं हो सकता है। उन बुद्धिजीवियों ने आलोचना की कि इस देश के अधिकांश सरकारी अधिकारी सोचते हैं कि वे ही इस देश पर शासन कर रहे हैं और लोगों को अपने पर आश्रित और भिखारी मानते हैं। भारतीय सिविल सेवा का निर्माण अंग्रेजों द्वारा निर्मित इंपीरियल सिविल सर्विस से ही है। एक बुद्धिजीवी ने एक बार टिप्पणी की थी कि इसमें भारतीय, सिविल या सेवा कुछ भी नहीं है। भारतीय पुलिस सेवा भी ऐसी ही है। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने कहा था कि हमारी पुलिस व्यवस्था भारत के लोगों की सेवा करने के लिए नहीं बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के आधिपत्य की रक्षा का काम आगे बढ़ा रही हैं। इस व्यवस्था का मुख्य लक्ष्य दमन है जिसका उद्देश्य अपने राजनीतिक आकाओं के हितों की रक्षा करना है। हमारे इंडियन पीनल कोड (भारतीय दंड संहिता) का पहला अध्याय राज्य के खिलाफ आपराधिक साजिश और अपराधों से संबंधित है। पिछले मई में, सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस एन.वी.रमना का सवाल था कि क्या महात्मा गांधी और बालगंगाधर तिलक को गिरफ्तार करने के लिए इस्तेमाल किया गया राजद्रोह अधिनियम अभी भी आवश्यक है?  हमारे देश में केवल राजद्रोह ही नहीं बल्कि ब्रिटिश सरकार द्वारा समाप्त किए गए कई कानून आज भी जारी हैं।

गृह विभाग के एक पूर्व अधिकारी के. सुब्रह्मण्यम ने कहा कि 1947 के बाद केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की संख्या में वृद्धि और राजनीतिक इंटेलिजेंस के विस्तार के अलावा पुलिस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हुआ है। आईपीसी और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में कुछ बदलाव किए गए हैं। उन्होंने कहा कि जो बदलाव किए गए हैं, उनसे उलटे भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और सत्ता के दुरुपयोग जैसे अवांछित लक्षण उत्पन्न हुए हैं। उन्होंने कहा कि सीआरपीसी में अपराधों की जांच और अभियोजन की तुलना में पुलिस बल के प्रयोग को अधिक प्राथमिकता दी गई है।

सुब्रह्मण्यम ने कहा कि उन्हें दंगा करने के नाम पर लोगों को दंडित करने, दबाने, निजी व्यक्तियों को विशेष पुलिस अधिकारी नियुक्त करने, किसी को भी गिरफ्तार करने और कम से कम 24 घंटे के लिए हिरासत में रखने के व्यापक अधिकार दिए गए हैं। 1861 का ब्रिटिश पुलिस अधिनियम अभी भी लागू है। ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित आईबी और स्पेशल ब्रांच अब उसी रूप में वही काम कर रहे हैं जो अंग्रेजों के लिए करते थे।  1942 में, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश-युग के अध्यादेश पर आधारित सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को धीरे-धीरे उत्तर-पूर्वी राज्यों से कश्मीर तक बढ़ा दिया गया था। किसी को भी कभी भी गोली मारने की विवेकाधीन  अधिकार  रखने वाला यह कानून आजादी के 75 साल के बाद भी देश के कुछ हिस्सों में लागू है।

इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के बाद भाजपा के पूर्ववर्ती जनसंघ की जनता पार्टी सरकार द्वारा नियुक्त राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने  पुलिस सुधारों पर आठ रिपोर्टें सौंपी थी। इस रिपोर्ट ने पुलिस के काम में राजनीतिक नेताओं के हस्तक्षेप को स्पष्ट रूप से बताते हुए गैर-राजनेताओं की देखरेख में सुरक्षा आयोगों की नियुक्ति का आह्वान किया। लेकिन इन सिफारिशों पर किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। इसके बाद समय के साथ रेबेरो, पद्मनाभैया, मालिमत और अन्य समितियों की सिफारिशों को भी नजरअंदाज किया गया।

इसके अलावा, नए कानूनों और एनआईए जैसे नए संगठनों को पुरानी व्यवस्था द्वारा अपेक्षित उत्पीड़न को और मजबूत करने के लिए नए हथियारों के रूप में इस्तेमाल किया गया था। उनसे लोकतंत्र और लोगों की स्वतंत्रता को किसी भी तरह की मदद नही मिली। यहां तक कि हमारी जेल व्यवस्था भी अंग्रेजों के जमाने की है। 1894 का कारागार अधिनियम अब भी बिना किसी मूलभूत परिवर्तन के लागू है। यद्यपि जेलों का मानवीकरण करने के लिए कई सुधार समितियां नियुक्त की गईं, लेकिन जेलें आधुनिक आपराधिक स्वभाव, सोच की तरीका  और सामाजिक सिद्धांतों के अनुकूल नहीं हो सकीं। सांख्यिकीय विवरण बताते हैं कि समाज के उत्पीड़ित वर्ग, आदिवासी और दलित सबसे अधिक संख्या में जेलों में बंद हैं।

औपनिवेशिक शासन की पुलिस, नागरिक और अन्य आधिकारिक व्यवस्थाओं, ब्रिटिश युग के कानूनों को मौलिक रूप से बदलने की आवश्यकता है, जो हर मायने में बदलते समय की जरूरत हैं। जब प्रधान मंत्री मोदी इस कर्तव्य को पूरा करेंगे तभी भारत की औपनिवेशिक युग की गुलाम मानसिकता से मुक्त होगी। इन व्यवस्थाओं को ही नहीं, चुनाव कराने वाले चुनाव आयोग, भ्रष्टाचार और अपराधों की जांच करने वाले सीबीआई, सीवीसी और ईडी जैसे संगठनों को स्वतंत्र और लोकतांत्रिक तरीके से काम करने का मौका दिया जाना चाहिए न कि किसी राजनीतिक दल के हितों के अनुसार इनका उपयोग हो। तभी भारत औपनिवेशिक शासकों के स्वभाव से मुक्ति प्राप्त करेगा। देश को आधुनिक बनाना तभी संभव है जब चुनाव में हजारों करोड़ रू खर्च कर लोकतंत्र खरीदने की संस्कृति बदलेगी।

देश को परिवार और वंशानुगत शासन से मुक्त करने का विचार सही है। लेकिन देश में सत्ता में सबसे बड़ी पार्टी का केवल एक ही व्यक्ति के इशारों पर चलना वंशानुगत नियम से ज्यादा खतरनाक है। गांधी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती कांग्रेस पार्टी भी लोगों के दिलों में स्थान खो रही हैं। और भले ही 2024 के चुनाव नजदीक आ रहे हों, लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि भाजपा में कोई भी इस चर्चा को जारी रखने के लिए आगे नहीं आया है कि मोदी की जगह कौन लेगा।

इतना ही नहीं, कुछ लोगों के अनुकूल आर्थिक नीतियों और निगमीकरण पर भी चर्चा करने की आवश्यकता है। जो औपनिवेशिक गुलामी से मुक्त होना चाहते हैं उन लोगों पर यह जिम्मेदारी हैं कि राहुल के इस आरोप का ठोस खंडन हो कि मोदी सरकार केवल दो व्यापारियों के लिए काम कर रही हैं। विदेश नीति क्या है? क्या वह स्वतंत्र नीति हैं या नहीं इस के बारे में भी बहस जरूरी है।  मोदी के सत्ता में आने के बाद पिछले आठ वर्षों में भारत की विदेश नीति पूरी तरह से अमेरिका केंद्रित हो गई है। भारत के नजरिए  और आपत्तियों के बावजूद, अमेरिका ने हाल में एफ-16 लड़ाकू विमानों के आधुनिकीकरण के लिए पाकिस्तान को 45 करोड़ डॉलर मूल्य के उपकरणों की आपूर्ति की है। जाहिर है विदेश नीति में भी औपनिवेशिक सोच से छुटकारा पाने की जरूरत है। औपनिवेशिक मानसिकता की सत्ता से छुटकारा पाने के लिए भावनाओं, व्यवहारों, फैसलों और व्यवस्थाओं में बदलाव लाना होगा। लेकिन सड़कों और पत्थरों के नाम बदलने से कुछ नहीं होना है।

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

three × two =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
जजों की नियुक्ती में सरकार तुरंत फैसला ले!
जजों की नियुक्ती में सरकार तुरंत फैसला ले!