उपचुनाव: ‘अब जातीय और क्षेत्रीय बैलेंस की सियासत’

कांग्रेस की नज़र भाजपा सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार पर टिककर रह गईं हैं तो भाजपा भी कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष बनने का बेसब्री से इंतजार कर रही है और दोनों की इस दिलचस्पी का मूल उद्देश्य एक दूसरे की कमियां निकालकर 24 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में लाभ लेना ही माना जाएगा जिसके लिए कांग्रेस और भाजपा कमर कसकर चुनावी रण में मुस्तैद है।

दोनों ही प्रमुख पार्टियों के नेता अब अपने प्रतिद्वंद्वी की गलतियां खोजने के इंतज़ार में ही नज़रें टिकाए हैं.कांग्रेस को जहाँ विधानसभा अध्यक्ष चयन सहित शिवराज मंत्रिमण्डल के विस्तार के बाद भाजपा के अंदरखाने में फूट का इंतज़ार है तो भाजपा को कांग्रेस के प्रत्याशी चयन करने और नेता प्रतिपक्ष की घोषणा होने का.कोरोना संक्रमण की चिंता से ज्यादा अब सरकार और विपक्ष दोनों उपचुनाव को लेकर ज्यादा गम्भीर हैं और मध्यप्रदेश का राजनीतिक घटनाक्रम अब सिर्फ उपचुनाव के इर्द-गिर्द ही घूमता नज़र आ रहा है।

तो राजनीतिक दलों के लिए ये समय माथापच्ची का ही माना जाएगा.प्रदेश में दोनों प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस तू डाल डाल में पात पात कहावत को चरितार्थ करते हुए एक दूसरे के गलत निर्णय लेने की बाट जोह रहे हैं.विधानसभा सत्र की अधिसूचना जारी हो चुकी है और फिलहाल विधानसभा में कार्यवाहक अध्यक्ष के भरोसे कामकाज जारी है.इसी तरह लंबे समय से चली आ रहीं मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलों के बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के उस हालिया बयान ने कि ‘जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार किया जाएगा’ राजनीतिक हलकों का पारा एक बार फिर उछाल दिया है।

सत्ता से अपने ही कुनबे में फूटन के कारण विपक्ष में पहुंची कांग्रेस मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर हमेशा भाजपा सरकार की घेराबन्दी करती आ रही है.राज्यसभा चुनाव के समय भी कांग्रेस नेताओं का यही बयान सामने आया था कि यदि भाजपा मंत्रिमंडल विस्तार कर देती तो राज्यसभा में कांग्रेस दो सीटें हासिल करती.इसका सीधा आशय है कि कांग्रेस को ये आस है कि भाजपा के मंत्रिमंडल गठन से पार्टी में फूटन जरूर होगी क्योंकि एक ओर भाजपा के सामने उन बागी सिंधिया समर्थकों को एडजस्ट करने की चिंता होगी जो कांग्रेस छोड़कर भगवाधारी हो गए तो वहीं दूसरी ओर अपनी पार्टी के बरिष्ठ विधायकों को मंत्रिमंडल विस्तार में तबज़्ज़ो देने की चुनौती होगी जो पिछली सरकारों में फ्रंट लाइन के नेता रहे।

भाजपा सरकार के पांच सदस्यीय मंत्रिमंडल के कार्यकाल को लगभग तीन माह का समय हो गया,मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार में इस बीच कई बार मंत्रिमंडल गठन को लेकर सरगर्मियां रहीं पर विस्तार नहीं हो सका.अब फिर एक बार तब मंत्रिमंडल विस्तार की बात शुरू हुई जब मध्यप्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन की हालात नाजुक है और वो हॉस्पिटल में भर्ती हैं.सत्तापक्ष से जो खबरें निकलकर आ रहीं हैं उनमें ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि मंत्रिमंडल विस्तार के लिए छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसूइया उइके को मध्यप्रदेश के प्रभार भी दिया जा सकता है ताकि राजभवन से सम्बन्धित काम काज प्रभावित न हो.हालांकि इस मामले में कांग्रेस नेताओं का मानना है कि देश में ये परंपरा रही है कि राज्यपाल जिस राज्य के निवासी होते हैं वहां उनकी नियुक्ति नहीं की जाती है और छत्तीसगढ़ की राज्यपाल मध्यप्रदेश की निवासी हैं।

भाजपा अब दिखाए बहुजन प्रेम
भाजपा के सामने मंत्रिमंडल विस्तार के साथ जुलाई में होने वाले विधानसभा सत्र में विधानसभा अध्यक्ष की नियुक्ति भी महती जवाबदेही है क्योंकि फिलहाल अस्थाई विधानसभा अध्यक्ष से ही कामकाज संचालित है.जिस तरह कांग्रेस के राज्यसभा उम्मीदवार फूल सिंह बरैया को दूसरे क्रम में रखने पर भाजपा ने उसे मुद्दा बनाकर दलितों का अपमान बताया तो अब कांग्रेस के पूर्व मंत्री डॉ गोविंद सिंह भी विधानसभा अध्यक्ष को लेकर कांग्रेस मुखर है.कांग्रेस नेता ने कहा कि जब कांग्रेस सरकार बनी तो विपक्ष की भूमिका में रही भाजपा ने अनुसूचित जाति वर्ग के प्रति प्रेम दिखाते हुए सात बार के हरसूद विधायक कुंवर विजय शाह को विधानसभा अध्यक्ष पद पर दावेदार बनाया था पर प्रोटेम स्पीकर ने उनके नाम को पेश करने की अनुमति नहीं दी थी जिस कारण विपक्ष में बैठी भाजपा ने सदन से वॉकआउट कर दिया था।

कांग्रेस का कहना हैं कि मल्हारगढ़ से विधायक जगदीश देवड़ा को भी भाजपा ने उपाध्यक्ष बनाने आगे किया था और जब भाजपा सरकार में आई तो अजा प्रेम गायब हो गया और देवड़ा को सिर्फ अस्थाई विस अध्यक्ष बना दिया गया.डॉ गोविंद सिंह ने कहा कि अब भाजपा को अपना बहुजन प्रेम दिखाने का मौका है और वो विजय शाह को अध्यक्ष और जगदीश देवड़ा को उपाध्यक्ष बनाकर इसे साबित कर सकती है.कांग्रेस नेता ने चुटकी लेकर कहा कि क्या अब गिने चुने लोग ही इस विस अध्यक्ष की दौड़ में हैं और क्या यही है भाजपा का अजा प्रेम का दिखावा.भाजपा के लिए जो सबसे बड़ी मैदानी चुनौती है वो उन सिंधिया समर्थक उम्मीदवारों के प्रति मतदाताओं का रुझान बढ़ाना है जिन वोटरों के जेहन में कांग्रेस ने बिकाऊ और गद्दार जैसे शब्द भरने का काम बखूबी किया है क्योंकि भाजपा के पास कहीं न कहीं घोषित उम्मीदवार ही चुनावी मैदान में जाने वाले हैं।

कांग्रेस का अन्तर्कलह अभी भी जारी
सिंधिया और उनके समर्थकों की बगावत से भले ही कांग्रेस अर्श से फर्श पर आ गई हो पर पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह को तो इसका फायदा ही मिलना कहा जाएगा.दिग्गीराजा राज्यसभा पहुंच गए तो नेता प्रतिपक्ष सहित पीसीसी अध्यक्ष के लिए नई गणित छोड़ गए.अब कांग्रेस के अंदरखाने में भले ही पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के पार्टी प्रदेश अध्यक्ष को लेकर कोई गतिरोध न हो पर नेता प्रतिपक्ष को लेकर बड़ा टकराव नज़र आ रहा है.सियासी चर्चाओं की बात की जाए तो ये भी कहा जाएगा कि दिग्विजय सिंह के राज्यसभा सांसद बनने के बाद जातीय समीकरणों को आधार माने तो नेता प्रतिपक्ष के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे लगातार सात बार के विधायक डॉ गोविंद सिंह इस रेस से लगभग बाहर नज़र आ रहे हैं और अजय सिंह राहुल प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ से.तो क्या अब ये मान लिया जाए कि जिस ग्वालियर चम्बल अंचल में साबसे ज्यादा 16 सीटों पर उपचुनाव होना हैं वहां से नेता प्रतिपक्ष की भूमिका नहीं होगी।

सियासी हालात तो यही हैं कि कमलनाथ नेता प्रतिपक्ष बनेंगे या उनके कोर ग्रुप के सदस्य एनपी प्रजापति,सज़्ज़न सिंह वर्मा या बाला बच्चन.हालांकि जुलाई माह में होने वाले विधानसभा सत्र का नोटिफिकेशन जारी हो चुका है पर अभी तक विधानसभा के पीएस तक कांग्रेस की ओर से नेता प्रतिपक्ष से संबंधित कोई भी पत्र नहीं भेजा गया.इस पत्र के जारी होने की बेसब्री जितनी कांग्रेस के नेताओं को है उससे ज्यादा बेताबी भाजपा के उन नेताओं को है जिनको कांग्रेस पर चुटकीली बयानबाज़ी करने का मौका चाहिए.कांग्रेस में नेता प्रतिपक्ष अभी तक तय न हो पाना अंदर की गुटबाज़ी को लेकर बड़ा सवाल छोड़ता है.दरअसल नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद विधानसभा की बहुत सारी समितियों का भी गठन होना होता है जिसमें विपक्ष के विधायकों को सदस्य नियुक्त किया जाता है और कहीं न कहीं इन सबका पत्राचार का माध्यम नेता प्रतिपक्ष ही होता है.कांग्रेस नेताओं का ही कहना है कि अभी पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ही अघोषित नेता प्रतिपक्ष हैं जबकि विधानसभा में उनको लेकर कोई आधिकारिक पत्र नहीं पहुंचा है.यदि कमलनाथजी को ही नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में रहना है तो इतनी लेटलतीफी क्यों स्थिति साफ होना चाहिए।

क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन जरूरी या मजबूरी?
भाजपा सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार हो या कांग्रेस का नेता प्रतिपक्ष चयन दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों के लिए जातीय और क्षेत्रीय गणित बिठाना जरूरी होगा या उनकी मजबूरी होगी ये तो सियासी चाणक्य बखूबी समझ रहे होंगे पर जहां उपचुनाव होना हैं उस क्षेत्र में सियासी समीकरण बिठाना सियासतदारों के लिए पहाड़ खोदने से कम नहीं होगा.क्योंकि भाजपा के लिए जहां अतिउत्साही सिंधिया समर्थकों को साथ लेना जरूरी है तो अपने निष्ठावान भजपाइयों को समझाइश के साथ उनकी नाराज़गी दूर करना भी आवश्यक.नेताओं के साथ सिंधिया समर्थक और भाजपा समर्थित कार्यकर्ताओं की वर्चस्व की अंदरूनी लड़ाई को भी पाटना भाजपा के लिए मुसीबत भरा काम है क्योंकि हाल ही में ग्वालियर अंचल में लगाए गए पोस्टरों में ये प्रतिरोध खुलकर सामने देखा गया. ग्वालियर चंबल अंचल में जातिगत और क्षेत्रीय संतुलन की रणनीति भी सियासी दलों के लिए महती जिम्मेवारी है।

जिन सीटों पर उपचुनाव होना है उनमें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित आगर, डबरा, सांची, सांवेर, अम्बाह, गोहद, भांडेर, करैरा, अशोकनगर विधानसभा क्षेत्र हैं और यहां कांग्रेस, भाजपा के अलावा बहुजन समाज पार्टी का भी वोट बैंक है.अनुपपुर अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित है.जिन आरक्षित सीटों पर उपचुनाव होना हैं उनमें से ग्वालियर चम्बल अंचल की 6 सीटें शामिल हैं और यहां अजा वर्ग के साथ ठाकुर, ब्राम्हण मतदाताओं का जीत हार में सीधा दखल रहता है.क्षेत्रीय समाजसेवियों की माने तो कांग्रेस यहां जातिगत और क्षेत्रीय आंकड़ों के आधार पर उम्मीदवार उतारने कई एजेंसियों से सर्वे करा हर घर का डेटा एकत्र कर चुकी है और बेहतर उम्मीदवारों पर नज़र रखे है।

कांग्रेस अपने पत्ते भाजपा के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद खोलेगी और उसकी प्राथमिकता में भाजपा के वो नाराज़ लोग होंगे जो कहीं न कहीं सिंधिया खेमे के लोगों से अंदरूनी तौर पर बेहद नाराज हैं और पार्टी लाइन के कारण फिलहाल शांत हैं.इसके अलावा जहां उपचुनाव होना है वहां संगठन विस्तार को लेकर भी कांग्रेस जातीय गुणाभाग बैठाने में जुट गई है.बहरहाल जिन विस क्षेत्रों में उपचुनाव होना है उनमें मुरैना विधानसभा सीट पर गुर्जर मतदाताओं के साथ वैश्य वर्ग का संतुलन बनाने वाले को ही सफलता मिलने की संभावनाएं ज्यादा प्रबल होंगी.क्योंकि पिछली बार वैश्य वर्ग की नाराजगी का खामियाजा भाजपा भुगत चुकी है।

सुमावली, जौरा, दिमनी, मेहगांव में ठाकुर और ब्राम्हण मतदाताओं का दबदबा रहता है यहां जाटव और बहुजन वर्ग की भूमिका अहम है.पोहरी में धाकड़ समाज का दबदबा है तो ब्राम्हण मतदाता निर्णायक हैं.मुंगावली में यादव मतदाताओं का बाहुल्य है,लोधी,कुशवाह,दांगी मतदाता निर्णायक हैं.ग्वालियर और ग्वालियर पूर्व में शिक्षित वर्ग और महाजन मतदाताओं की भूमिका निर्णायक है.हाटपिपल्या विस क्षेत्र में सर्व समाज का वोट है यहां खाती, मुस्लिम, राजपूत और पाटीदार का थोक वोट माना जाता है. बदनावर में राजपूत मतदाताओं का वर्चस्व है,पाटीदार भी प्रभावी हैं अन्य समाज का वोट जिस तरफ झुकाव लेगा वही उम्मीदवार विजयी होता है।

सुवासरा विस सीट पर वैसे तो सौंधिया राजपूत, पोरवाल समाज, पाटीदार समाज का प्रभाव माना जाता है पर यहां जातिगत आंकड़ों से ज्यादा बेहतर उम्मीदवार को जीत मिलती रही है. बमोरी विस से एक बार कांग्रेस और एक बार बीजेपी ने जीत दर्ज की वैसे जातिगत तौर पर यहां सहरिया आदिवासी और अनुसूचित जाति वर्ग का बाहुल्य है और यही वोट निर्णायक रहते हैं साथ ही यहां जातीयता से ज्यादा क्षेत्रीय मुद्दों पर मतदाता वोट देता है. सुरखी विधानसभा में जातिगत आंकड़ों से ज्यादा धनवान एवं बाहुबली उम्मीदवार प्रभावी रहता है. सड़क, पानी, बिजली, रोजगार, किसानों के हित की बात ही यहां प्रमुख मुद्दा होती है, पार्टीगत, जातिगत समीकरण ज्यादा मायने नहीं रखते।

बहुजन वोट पर इनकी भी नज़र
उपचुनाव के सियासी संग्राम में ग्वालियर चम्बल अंचल में दो प्रमुख दलों के मुकाबले के बीच अभी बहुजन के नाम पर राजनीति करने वाली बसपा और आज़ाद समाज पार्टी भी भाजपा और कांग्रेस का गणित बिगाड़ने चुनावी मैदान में उतरेगी.बसपा ने पूर्व में हुए उपचुनावों में शायद ही कभी अपने प्रत्याशी उतारे हों पर इस बार माना जा रहा है कि कांग्रेस ने जैसे ही बहुजन संघर्ष दल के नेता फूलसिंह बरैया को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया तो बसपा प्रमुख मायावती भड़क उठीं और उन्होंने सभी सीटों पर उपचुनाव लड़ने की घोषणा कर दी.गौरतलब है कि बरैया और बसपा का टकराव वर्ष 2003-04 से है।

हालांकि बसपा को चुनाव मैदान से बाहर रखने कमलनाथ कांग्रेस ने बसपा के मजबूत उम्मीदवारों को कांग्रेस में मिला लिया और ये रणनीति कुछ हद तक कामयाब साबित हो रही है.इधर बसपा भी कांग्रेस और भाजपा से नाराज़ नेताओं पर डोरे डाल रही है.क्षेत्र में बसपा का कई सीटों पर वोट बैंक भी है और हर आम चुनाव में बसपा उम्मीदवारों को इस अंचल से अच्छे खासे वोट मिलते आ रहे हैं.दूसरी तरफ भीम आर्मी संगठन से तैयार हुई आज़ाद समाज पार्टी मैदान में आकर बहुजन वर्ग का वोट काटने का काम ही करेगी जिसका नुकसान परोक्ष तौर पर कांग्रेस को ही होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.बसपा और एएसपी दोनों राजनीतिक दल के मैदान में आने से भाजपा को परोक्ष तौर पर नफा और कांग्रेस को नुकसान की ही संभावनाएं हैं।

One thought on “उपचुनाव: ‘अब जातीय और क्षेत्रीय बैलेंस की सियासत’

  1. बहुजन बहुत जोर शोर से मनुवाद, ब्राह्मणवाद का हल्ला मचाते हैं और वोट देते समय खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं।कोई इनको समजाये कि जब से इन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ा बीजेपी ने एक एक करके इनके संविधनिक अधिकार खत्म किये।और मायावती टाइप बहुजन नेता इनके वोटों से अरबपति, खरबपति और बीजेपी विरोधी वोटों को बांटने वाली मशीन बन गई।

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