‘शिव’ के जो नहीं.. उन्हें गले लगाएंगे ‘विष्णु’..!

कमलनाथ सरकार के तख्तापलट के पहले भाजपा संगठन में बदलाव राकेश सिंह के स्थान पर विष्णु दत्त शर्मा के साथ हो चुका था । इसके बाद शिवराज को मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई। कड़ी मशक्कत के बाद पांच मंत्रियों ने भी शपथ ली। कोरोना संकट के चलते जो सियासी गतिविधियां ठप हो गई थी वह अब परवान चढ़ रही है। भाजपा एक साथ तीन मोर्चों पर चिंतन मंथन को मजबूर है। पहला, शिवराज मंत्रिमंडल का विस्तार, दूसरा ..24 विधानसभा सीट पर उपचुनाव,तो तीसरा विष्णु दत्त शर्मा की नई टीम का गठन। फैसले एक दूसरे से जुड़े तो मकसद बड़ा मिनी विधानसभा का उपचुनाव है।

बल्लभ भवन बीजेपी कार्यालय और समिधा में बैठकों के कई दौर हो चुके हैं। पिछले एक सप्ताह में शिवराज सिंह चौहान के साथ विष्णुदत्त शर्मा और सुहास भगत की कोई आधा दर्जन बैठक से संकेत यही निकल कर आए कि सरकार भले ही बन गई हो लेकिन चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई। पूरी जमावट कमलनाथ कांग्रेस द्वारा दी जा रही चुनौती से उपचुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपा में नई जमावट को अंतिम रूप दिया जाएगा। सवाल सबसे पहले शिवराज मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर खड़े हो रहे। जब सिंधिया खेमे के मंत्रियों की संख्या पर राष्ट्रीय नेतृत्व को भरोसे में लेकर फैसला लिया जा चुका है। आखिर भाजपा में दूसरे मंत्रियों को लेकर एक राय क्यों नहीं बन पा रही। पांच मंत्रियों की शपथ के साथ जो संदेश निकल कर आया उसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया की कोटा पॉलिटिक्स, भाजपा राष्ट्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप।

13 साल के मुख्यमंत्री रह चुके शिवराज को फ्री हैंड नहीं देना प्रमुख माना गया, ऐसे में जब 24 विधानसभा सीट के उपचुनाव को लेकर कांग्रेस और भाजपा दोनों अपनी जमावट को लेकर गंभीर, यानी उसका नेतृत्व और नेता उपचुनाव को लेकर संजीदा है, ऐसे में खड़े हो रहे सवाल एक दूसरे से जुड़ रहे हैं। चाहे फिर वो सरकार की स्थिरता संगठन की मजबूती और उपचुनाव में जीत ही क्यों न हो। शिवराज और ज्योतिरादित्य की जोड़ी को मजबूत साबित करने की जद्दोजहद जारी है। मैदानी जमावट हो या फिर सरकार के फैसले जो उपचुनाव वाले क्षेत्र में विकास को सुनिश्चित करते हैं। सवाल क्या राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रदेश संगठन को भरोसे में लेकर शिवराज मंत्रिमंडल के गठन में जुट चुके हैं।

इस बार कोई उनका अपना पराया नहीं। संगठन की पसंद उनकी पसंद बन कर सामने आएगी। या फिर क्षत्रपों की कोटा व्यवस्था देखने को मिलेगी तो वर्चस्व को लेकर मतभेद भी सामने आ सकते हैं। ऐसे में सरकार कमलनाथ की गिराने और शिवराज की बनाने में भूमिका निभाने वाले विधायकों को आखिर कितना महत्व मिलेगा। जो विधायक शिवराज के मंत्रिमंडल का कभी ना कभी 13 साल में हिस्सा रह चुके.. यदि एक बार फिर वह मंत्री नहीं बन पाते तो। क्या उनकी नाराजगी देखने को मिलेगी.. क्या इन्हें इनके हाल पर छोड़ दिया जाएगा..क्या यह सम्भव होगा। वह भी तब जब उपचुनाव और भाजपा की बगावत पर कांग्रेस खासतौर से कमलनाथ की नजर है । क्या विकल्प और डैमेज कंट्रोल की रणनीति के तहत इन पूर्व मंत्रियों को विष्णु दत्त शर्मा की नई टीम का हिस्सा बनाया जाएगा। तो यह नेता नई भूमिका स्वीकार करेंगे। लगातार सत्ता सुख भोगने वाले पूर्व मंत्री आखिर विष्णु दत्त और संगठन के लिए कितने उपयोगी माने जाएंगे। वह भी तब जब विष्णु दत्त शर्मा पर विरासत में मिली भाजपा संगठन की टीम में बड़े बदलाव का दबाव साथ देखा जा सकता है।

क्या सरकार और सत्ता से दूर किए जाने पर यह पूर्व मंत्री पूरी शिद्दत के साथ संगठन का काम करेंगे, तो बड़ा सवाल विष्णु दत्त शर्मा नई युवा ऊर्जावान टीम आखिर कैसे सामने लाएंगे,खुद विष्णुदत्त भाजपा का युवा चेहरा है, ऐसे में लगातार कई विधानसभा चुनाव जीतने वाले जो दो से चार बार मंत्री रह चुके नेता आखिर बदलती भाजपा में खुद को कितना फिट महसूस करेंगे.. इनमें वह चेहरे भी शामिल है जिन्होंने सोशल इंजीनियरिंग की आड़ में अपने क्षेत्र के दूसरे वरिष्ठ नेताओं का हक मारा.. जो 4 से 6 चुनाव जीतने के बावजूद मंत्री नहीं बन पाए। अनुभवी और वरिष्ठता के मापदंड पर ये सरकार की जरूरत साबित हुए तो इन्होंने लंबी पारी सत्ता में रहकर खेली।

मसलन, अनुभवी वरिष्ठ गोपाल भार्गव, राजेंद्र शुक्ल, भूपेंद्र सिंह, यशोधरा राजे सिंधिया ,करण सिंह वर्मा, रामपाल सिंह, सुरेंद्र पटवा, सीता शरण शर्मा, पारस जैन , विजय शाह, गौरीशंकर बिसेन, गोपीलाल जाटव, महेंद्र हार्डिया, नागेंद्र सिंह नागौद, हरिशंकर खटीक, बृजेंद्र प्रताप सिंह, सुरेंद्र पटवा, विश्वास सारंग, संजय पाठक, अजय विश्नोई ,जगदीश देवड़ा, जालम सिंह पटेल, जय सिंह मरावी ,जुगल किशोर बागड़ी। यह वह पूर्व मंत्री जिन्होंने सत्ता में लंबी पारी खेली। इनमें से अधिकांश के लिए मंत्री बनने का यह आखिरी मौका माना जा रहा है ..तो कई दूसरे बड़े पदों पर रह चुके हैं। अपने से वरिष्ठ नेतृत्व के साथ टीम का हिस्सा बने। क्या अब इनमें से कोई युवा विष्णु दत्त की टीम में शामिल होकर भाजपा की एडजस्टमेंट पॉलिटिक्स का हिस्सा बनना चाहेगा। शायद नहीं , तो सवाल जो शिवराज मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं बनेंगे.. वह पूर्व मंत्री संगठन के लिए कितने उपयोगी नहीं माने जाएंगे।

क्या यह भाजपा की नई पीढ़ी का हक मारेंगे। वह भी तब जब भाजपा संगठन बदलाव के दौर से गुजर रहा है, तो आखिर पूर्व मंत्रियों में वह कौन नेता हो सकते हैं। जो विष्णु दत्त के साथ एडजेस्ट होकर संगठन में एक नई पारी खेल सकते.. भाजपा के नीति निर्धारक इसी माथापच्ची में जुटे, पार्टी संविधान के तहत नई टीम के गठन के साथ कुछ नए चेहरे सामने लाना संवैधानिक वैधता है। तो वक्त के तकाजा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। संगठन चुनाव के दौरान महामंत्री सुहास भगत की जिद के चलते मंडल से लेकर प्रदेश तक यह बदलाव देखने को मिला। तो अध्यक्ष बनने के बाद विष्णु दत्त शर्मा ने जो जिला अध्यक्ष घोषित किए, वह भी युवा नेतृत्व को सामने लाती है। ऐसे में सवाल जो शिवराज की टीम यानी मंत्रिमंडल में उनके सहयोगी नहीं बन पाएंगे। तो वह पूर्व मंत्री क्या विष्णु दत्त की टीम का हिस्सा बनेंगे.. बनना चाहेंगे । सवाल जो शिवराज के काम के नहीं माने जाएंगे वह विष्णु के किस काम के साबित होंगे।

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