उपचुनाव: चुनाव के पहले उथल-पुथल हुई तेज

अभी प्रदेश में 24 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के लिए तारीखों की घोषणा नहीं हुई है लेकिन राजनीतिक दलों के अंदर उथल-पुथल इतनी तेज हो गई है कि राजनीतिक दलों को समीकरणों को साधने की मुश्किल पड़ रही है। प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस ने पार्टी के रणनीतिकारों को मोर्चे पर लगा दिया है।

दरअसल मध्य प्रदेश की राजनीति प्रायः दो दलीय रही है और बड़े पैमाने पर कभी भी दल बदल नहीं हो पाया है सिवाय 1967 को छोड़कर, जब राजमाता सिंधिया ने डी.पी. मिश्रा की सरकार गिराकर संविद सरकार बनाई थी

और दूसरी बार राजमाता के ही पोते ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 22 विधायकों के साथ दलबदल करके कांग्रेस की सरकार गिराई। इसके बाद प्रदेश की राजनीति में जो उठापटक शुरू हुई वह थमने का नाम नहीं ले रही है। कोरोना महामारी के कारण परिस्थितियां भी विपरीत हो गई। ऐसे में किसी भी दल को खुलकर काम करने का मौका भी नहीं मिला। इस बीच मंत्रिमंडल का विस्तार भी नहीं हो पाया और राज्यसभा के चुनाव की तारीख आ गई और कभी भी 24 सीटों के विधानसभा के उपचुनाव की घोषणा भी हो सकती है।

बहरहाल अनुशासन का दंभ भरने वाली भाजपा इस समय पार्टी के अंदर मचे घमासान से हलाकान है। खासकर उन 24 सीटों पर भाजपा को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। जहां पर चुनाव होना है और यह भी तय हैं कि कांग्रेस से आए बागी विधायकों को भाजपा प्रत्याशी बनाया जाएगा। ऐसे में इन क्षेत्रों में भी भाजपा नेता जो कभी ना कभी इन क्षेत्रों से चुनाव लड़ चुके हैं या भविष्य में चुनाव लड़ने की उम्मीद पाले हैं। अब तक संभावित प्रत्याशियों को दिल से नहीं स्वीकार कर पा रहे हैं और कोई इशारों में तो कोई सीधे-सीधे अपना दर्द जाहिर कर रहा है। जबकि पार्टी संगठन इन क्षेत्रों में सख्त हो गया है।

मंडल स्तर पर बैठकों का दौर शुरू हो गया है और पार्टी ने नेताओं को इन सीटों को जिताने के लिए बतौर प्रभारी नियुक्त कर दिया है और प्रभारियों से कहा गया है कि वे संबंधित विधानसभा में जाकर पार्टी कार्यकर्ताओं को चुनावी तैयारियों के लिए एकजुट करें। उसके बावजूद कुछ सीटों पर बगावती स्वर तेज हो रहे हैं। मसलन बदनावर में राजवर्धन सिंह दत्तीगांव के विरोध में पहले भंवर शेखावत और अब राजेश अग्रवाल ने आवाज़ बुलंद कर दी है। राजेश अग्रवाल ने तो पार्टी नेताओं को मैसेज ही भेज दिया है जिसमें उन्होंने कहा है कि अगर भाजपा ने उन्हें टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय चुनाव लड़ सकते हैं। अग्रवाल के तेवर देखकर कांग्रेस भी उन पर डोरे डाल रही है और यदि अग्रवाल सहमत हुए तो कांग्रेस पार्टी भी टिकट दे सकती है।

इसी तरह सांची विधानसभा में डॉक्टर प्रभु राम चौधरी के खिलाफ डॉ गौरीशंकर शेजवार के बेटे मुदित शेजवार ने इशारों में अपनी मंशा जाहिर कर दी है। मुदित शेजवार ने फेसबुक पोस्ट पर 1 दिन पहले लिखा कि मेरा पानी उतरते देख किनारे पर घर मत बना लेना समंदर हूं लौट कर जरूर आऊंगा। मुदित शेजवार की इस पोस्ट के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। इसके पहले पूर्व मंत्री गौरीशंकर शेजवार भी कह चुके हैं कि कांग्रेस से भाजपा में आए नेताओं को विचारधारा और अनुशासन अंगीकार करने के साथ चुनाव लड़ने के लिए चलने की जरूरत है। अन्यथा नुकसान भी हो सकता है। इसी तरह सुर्खी विधानसभा क्षेत्र में भी राजेंद्र सिंह मोकलपुर और पारुल साहू अब तक पार्टी के निर्णय को स्वीकार नहीं पा रहे हैं। 2018 में सुर्खी से चुनाव लड़े सुधीर यादव पार्टी की तरफ से क्या सम्मान मिलता है इसकी प्रतीक्षा में है। ऐसी ही मुश्किलों का सामना पार्टी को अधिकांश सीटों पर करना पड़ रहा है जबकि सरकार इन सीटों पर विकास कार्यों के लिए गति देना चाहती है लेकिन अभी तक माहौल सकारात्मक नहीं बन पा रहा है।

वहीं दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी द्वारा 24 सीटों पर चुनाव लड़ाई जाने की घोषणा के बाद कांग्रेस पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी में तोड़फोड़ शुरू कर दी है और चंबल इलाके की लगभग एक दर्जन नेताओं को कांग्रेस पार्टी की जॉइनिंग करा दी है जबकि दो दर्जन नेताओं से बात चल रही है। पार्टी ने यह भी रणनीति बनाई है कि दलित चेहरे की पहचान रखने वाले फूल सिंह बरैया को भांडेर विधानसभा से उप चुनाव लड़ाया जाए और दिग्विजय सिंह को राज्यसभा में भेजा जाए। कांग्रेस पार्टी की नजर भाजपा के असंतुष्ट नेताओं पर है जिन्हें भाजपा में अपना भविष्य अंधकार में दिखने लगा है।

कुल मिलाकर प्रदेश की राजनीति में उथल-पुथल मच गई है जिसके कारण एक ऐसी धुंध छा गई है जिसमें अपना भविष्य तलाशने की नेताओं में बेचैनी बढ़ गई है और प्रमुख दलों में जिस तरह से असंतोष पनप रहा है उससे पहली बार प्रदेश में एक नए राजनीतिक दल के उदय होने की पृष्ठभूमि तैयार हो रही है क्योंकि अभी राज्यसभा चुनाव और फिर 24 सीटों के विधानसभा के उपचुनाव में बहुत कुछ समीकरण बदले जाएंगे

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