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न प्रदूषण, न जहरीला धुआँ

विटबी (Whitby) ग्रेटर टोरंटो का एक उपनगर है। यहाँ तीन पब्लिक लाइब्रेरी हैं। आज मैं यहाँ की सबसे बड़ी लाइब्रेरी में गया जो डंडास रोड की हेनरी स्ट्रीट में है। दिल्ली या कोलकाता में इतनी विशाल और भव्य लाइब्रेरी मैंने नहीं देखी। बहुत सारी पुस्तकें लीं। वहाँ भारतीय भाषाओं का भी एक सेक्शन है। हिंदी सेक्शन में भी कई मुझे किताबें दिखीं। वहाँ से मैंने श्री तेजेंद्र शर्मा की दस प्रतिनिधि कहानियाँ उठाई। पहली कहानी तो वहीं बैठ कर पढ़ गया। पसंद आई और मैं वह पुस्तक घर ले आया।

कनाडा दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इसका क्षेत्रफल 9984671 वर्ग किमी अर्थात् 3885103 वर्ग मील है। जबकि आबादी केवल 3.8 करोड़ है। एक तरह से यह भारत से तीन गुन बड़ा और आबादी भारत की मात्र तीन प्रतिशत। इसलिए यहाँ का वातावरण इतना साफ़ रहता है, कि कभी भी AQI (एयर क्वालिटी इंडेक्स) दो से ऊपर नहीं जाता और भारत में 300 सामान्य है। इसलिए यहाँ सुबह-शाम सैर करना या पैदल चलने में किसी को कोई तकलीफ़ नहीं होता। एक औसत कनाडा वासी डस किमी रोज वॉक करता है। इसलिए यहाँ पर लोगों को दिल की बीमारी नहीं होती न मधुमेह या उच्च या निम्न रक्तचाप। मैंने यहाँ आते ही पहला फ़ैसला यह किया था, कि जब तक यहाँ रहेंगे तब तक रोज खूब वॉक किया जाए। चूँकि वॉकिंग ट्रैक यहाँ शानदार और व्यवस्थित हैं इसलिए कभी यह ख़तरा नहीं होता कि कहीं पीछे से आ रहा कोई वाहन कुचल न दे। अथवा पैर ऊपर-नीचे न पड़ जाए। दूसरे हर मोहल्ले में दसियों पार्क हैं, खेल के मैदान हैं और खूब हरियाली है। कई जगह तो एक सीध में 5 किमी तक सीधा वॉकिंग ट्रैक चला गया है। आप इस वॉकिंग ट्रैक में जहां तक मर्ज़ी हो, वॉक करें। हर वॉकिंग छह फ़ीट चौड़ा और तारकोल से बनाया जाता है, ताकि टहलने वाले को कुशन मिलता रहे।

इसके अलावा लोगों को यहाँ मॉर्निंग वॉक या पैदल चलने के लिए सड़क पर जाने की इजाज़त नहीं है और ज़रूरत भी नहीं पड़ती। इसकी वजह है कि हर सड़क के किनारे वॉक-वे बने हैं। हाई-वे छोड़ कर ये लगभग हर मुख्य सड़क, जिनकी चौड़ाई 120 से 150 फ़िट तक होती है, के दोनों किनारों पर हैं। इन्हें आप फुटपाथ कह सकते हैं। ये सब पक्के और सीमेंटेड होते हैं। कहीं-कहीं पर ये चारकोल के भी हैं। ये सड़कों से दस से 15 फ़िट की दूरी पर होते हैं। वॉक-वे के दोनों तरफ़ 10 से 20 फ़ीट की दूरी तक घास उगाई जाती है और क्रम से घने पत्तेदार वृक्षों की क़तार भी। आमने-सामने के मकानों के बीच से निकलने वाली गलियों, जो साठ से अस्सी फ़िट चौड़ी होती हैं, पर भी वॉक-वे बने हैं। ये वॉक-वे सड़क से आठ फ़िट दूर होते हैं। कहीं-कहीं एक तरफ़ के मकानों के सामने तो कहीं-कहीं दोनों तरफ़ के मकानों के सामने। मकान के सामने का सहन क़रीब 20 फ़िट का होता है। इनमें लोग घास उगाते और विधिवत लगाते भी हैं। यह सहन मकान का हिस्सा है। इसे फ़्रंट यार्ड कहते हैं। इस फ़्रंट यार्ड पर यदि वॉक-वे है, तो मकान मालिक अपना कोई भी सामान इस वॉक-वे पर नहीं रख सकता, लेकिन वॉक-वे की सफ़ाई और घर के सामने के हिस्से के वॉक-वे की बर्फ़ साफ़ करने की ज़िम्मेदारी उस मकान में रहने वाले की होती है। फ़्रंट यार्ड पर लोग अपने वाहन खड़े कर सकते हैं लेकिन वॉक वे पर एक भी टायर न चढ़ा हो। किसी के मकान के आगे से जितनी लम्बाई तक वॉक-वे गुजरता है, उतना हिस्सा छोड़ कर बाक़ी का हिस्सा मकान-मालिक का होता है। इसी हिस्से में उसका ड्राइव वे होता है, जिस पर वह अपनी कार खड़ी करता है। ड्राइव वे पर दो कारें आसानी से आ जाती हैं। हालाँकि हर मकान के साथ गैराज होता है, पर लोग उसका इस्तेमाल अपने स्टोरेज के लिए करते हैं।

हर मकान के पीछे एक बैक यार्ड भी होता है। अर्थात् पीछे का मैदान। यह उस मकान का हिस्सा होता है। मकान मालिक चाहे तो इसको लकड़ी के फट्टों से या लोहे की जाली से घेर सकता है लेकिन कोई भी पक्का निर्माण नहीं कर सकता। कुछ लोग इस बैक यार्ड में स्वीमिंग पूल भी बनवा लेते हैं। लकड़ी की हट भी खड़ी कर लेते हैं। सब्ज़ियाँ बो लेते हैं। लेकिन फ़्रंट यार्ड में सिर्फ़ फूल-पत्ते लगाने की अनुमति होती है। बैक यार्ड में गोरे अंग्रेज तो पार्टी भी करते हैं। लेकिन लाउड स्पीकर बजाने की इजाज़त नहीं। मकान के आगे-पीछे कहीं भी कोई धार्मिक ढाँचा नहीं खड़ा किया जा सकता। आपको पूजा-पाठ करनी हो क्षेत्र के सामुदायिक केंद्रों के आसपास बने चर्च, मॉस्क या टेम्पल में जाइए। अपने पड़ोसी की ज़िंदगी में किसी तरह का ख़लल डालने की अनुमति किसी को नहीं है।

एक दिन सुबह सैर को निकले तो क़रीब चार किमी गए और आए। कुल डेढ़ घंटे लगे। पूरा वॉकिंग ट्रैक लम्बवत चला गया है। आगे भी है पर मैंने इतना ही किया। दोनों तरफ़ दूर-दूर तक हरियाली। लोग मिलते हैं अधिकांश गोरे। सब एक-दूसरे को गुड मॉर्निंग या हाथ हिला कर विश करते हैं। मैं भी सब को करता रहा। बीच-बीच में साउथ एशिया के लोग भी मिले। पर उनके साथ संकोच रहता है। कोई चार किमी बाद एक बड़ा-सा मैदान मिला। उसमें एक हिंदुस्तानी महिला सलवार-सूट पहने टहल रही थीं, मैंने उनको नमस्ते किया तो वे शर्मा गईं। कुछ देर बाद दो लोग हिंदी में बातचीत करते हुए क़रीब आए तो मुझे देख कर ठिठके फिर बोले गुड मॉर्निंग। मैंने भी मॉर्निंग कहा और वे चले गए। मैं पास की बेंच पर बैठ गया। दस मिनट बाद वे उस मैदान का चक्कर काट कर फिर आए तो मैंने हाथ जोड़े और कहा- नमस्कार। उन्होंने भी हाथ जोड़ कर अभिवादन किया। मैंने कहा, आज हिंदी सुनने को मिली। फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ। सरदार जी का नाम था मोहन सिंह था और मोने सज्जन थे पवन मल्होत्रा। दोनों अपने बच्चों से मिलने दिल्ली से आए हुए हैं। मल्होत्रा जी कल चले जाएँगे लेकिन सरदार जी के पास तो PR (परमानेंट रेज़िडेंसी) है, और वे रुकेंगे। उन्होंने बताया कि आपकी तरफ़ गोरे ज़्यादा हैं। इधर आया करिए सब अपने लोग हैं। बातचीत के दौरान उन लोगों ने बताया कि देखो जी पैसा तो अपने देश में भी ख़ूब मिलता है। सुविधाएँ भी हैं पर दिल्ली में साँस लेना मुश्किल है इसीलिए बच्चे यहाँ से जाना नहीं चाहते। यहाँ अगर AQI तीन पहुँच जाए तो येलो एलर्ट जारी हो जाता है, अपने यहाँ 300 तक नॉर्मल समझा जाता है। वॉकिंग ट्रैक छह फ़िट चौड़ा है और फिर दोनों तरफ़ आधा-आधा मील तक घास के मैदान। ख़ूब पेड़ और ट्रैक भी तारकोल का, जिसमें कुशन ख़ूब मिलता है। यहाँ दाएँ चलते हैं और गाड़ियाँ भी लेफ़्ट हैण्ड ड्राइव हैं। इसलिए सड़क पार करते हुए पहले बाएँ देखें फिर दाएँ। यहाँ पैदल चलने वाले के अधिकार अधिक हैं। सड़क पार करते समय आपने हाथ दिया तो गाड़ी रुक जाएगी। गाड़ी यहाँ अगर किसी को टच भी कर गई तो लाखों का जुर्माना है।

मैं विटबी उप नगर में हूँ। यहाँ पर कई पब्लिक लाइब्रेरी हैं। मुख्य लायब्रेरी का नाम विटबी सेंट्रल पब्लिक लायब्रेरी है। एक दिन मैं वहाँ गया। विटबी (Whitby) ग्रेटर टोरंटो का एक उपनगर है। यहाँ तीन पब्लिक लाइब्रेरी हैं। आज मैं यहाँ की सबसे बड़ी लाइब्रेरी में गया जो डंडास रोड की हेनरी स्ट्रीट में है। दिल्ली या कोलकाता में इतनी विशाल और भव्य लाइब्रेरी मैंने नहीं देखी। बहुत सारी पुस्तकें लीं। वहाँ भारतीय भाषाओं का भी एक सेक्शन है। हिंदी सेक्शन में भी कई मुझे किताबें दिखीं। वहाँ से मैंने श्री तेजेंद्र शर्मा की दस प्रतिनिधि कहानियाँ उठाई। पहली कहानी तो वहीं बैठ कर पढ़ गया। पसंद आई और मैं वह पुस्तक घर ले आया। अब आराम से पढ़ूँगा। रामचंद्र गुहा की गांधी और शशि थरूर की किताबें भी लाया हूँ। वहाँ मुझे बालक, वृद्ध, युवा, वनिता सब दिखे और दिखीं। अस्सी वर्ष से अधिक उम्र की एक महिला अपनी लम्बी सी कार ख़ुद ड्राइव कर आईं और कार पार्क कर स्टिक उठाई और लाइब्रेरी के मुहारे आ गईं। मैंने उनसे कहा, कि मैम आपकी गाड़ी खुली हुई हैं। बोलीं डोंट वरी यहाँ चोरी नहीं होती। सुन कर मैं सन्न रह गया। (जारी)

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