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प्राण उर्जा शक्तियों को जगाने का समय नवरात्र

नवरात्रि का तृतीय दिवस माता चंद्रघंटा को समर्पित है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र से जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। चयापचय और पाचन तंत्र से संबंधित मणिपुर या मणिपूरक चक्र नाभि स्थान पर होता है। यह पाचन में, शरीर के लिए खाद्य पदार्थों को ऊर्जा में रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

मनुष्य के शरीर में कुल सात चक्र हैं- मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्त्रार। भौतिक सुख से लेकर आध्यात्मिक दर्शन तक सम्पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए शरीर के पृथक- पृथक हिस्सों पर ध्यान केंद्रित करके मूलाधार से लेकर सहस्त्रार चक्र के इन शक्तियों को जागृत किया जाता है। इस प्रक्रिया में शरीर की दो नाड़ियाँ- इड़ा और पिंगला, जब संतुलित होती हैं, तो उर्जा सुषुम्ना नाड़ी से प्रवाहित होती है। शक्ति एक प्राण ऊर्जा के रूप में नाड़ी से बहती है, जो हमारी नासाग्र दाहिने और बाएं स्वर से पता चलता है। ज्योतिषीय मान्यतानुसार सभी ग्रहों के स्वरूप सात चक्र हैं और इन चक्रों से परे हैं दो ग्रह- राहु और केतु। यह प्राण ऊर्जा ही ब्रह्म स्वरूप है, जो सात्विक भोजन से प्राप्त होती है, ब्रह्ममुहूर्त में नित्य उठने से गतिमान होती है, प्राणायाम से जगती है। धारणा से केंद्रित होती है। ध्यान से ऊपर की ओर चक्रों में बढ़ती है। भय और नकारात्मक सोच से ये सिकुड़कर कम होती है। तामसिक भोजन, कर्म, वार्ता से नीचे के चक्रों में गिरती है। दूसरों  से आत्मिक प्रेम और जीवो से प्रेम से विस्तृत होती है। इस ऊर्जा का प्रबंधन ठीक से व्यवस्थित कर लिए जाने से असाधारण सफलता भी आसानी से प्राप्त किया जा सकता  है। इन शक्तियों को जगाने का सर्वोत्तम काल नवरात्रि का माना गया है। नवरात्रि में हर दिन एक विशेष चक्र को जाग्रत किया जाता है, जिससे साधक को ऊर्जा प्राप्त होती है।

पौराणिक मान्यतानुसार माता भगवती, प्राण शक्ति का शरीर के सात चक्र और दो नाड़ियों में संचरण करके अंत में सुषुम्ना से प्रवाहित कर हमारे जीवन के सभी पहलुओं में सन्तुलन बनाती है। सामान्यत: मनुष्य की समस्त ऊर्जा मूलाधार चक्र अर्थात कामेंद्रियों के ऊपर होती है। साधक, योगीजन नवरात्रि में ध्यान के माध्यम से मूलाधार में स्थित अपनी ऊर्जा को सहस्त्रार चक्र तक लाते हैं। सांसों के नियंत्रण और ध्यान से इस ऊर्जा को ऊपर खींचा जा सकता है। जैसे-जैसे साधक ऊर्जा को एक-एक चक्र से ऊपर उठाते जाते हैं, उनके व्यक्तित्व में चमत्कारी परिवर्तन दिखने लगते हैं। नवरात्र में पहले दिन इस शक्ति प्राण ऊर्जा को मूलाधार चक्र में उर्ध्व गमन किया जाता है। नवरात्रि की प्रथम पूज्य माता शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन साधक अपनी शक्ति मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं, और योग, साधना करते हैं। मूलाधार अर्थात मूल चक्र मनुष्य की प्रवृत्ति, सुरक्षा, अस्तित्व और मौलिक क्षमता से संबंधित है। यह केंद्र गुप्तांग और गुदा के मध्य अवस्थित होता है। यद्यपि यहां कोई अंत:स्रावी अंग नहीं होता, तथा यह जननेंद्रिय और अधिवृक्क मज्जा से जुड़ा होता है, तथापि अस्तित्व जब खतरे में होता है तो मरने या मारने का दायित्व इसी का होता है। इस क्षेत्र में एक मांसपेशी होती है, जो यौन क्रिया में स्खलन को नियंत्रित करती है।

शुक्राणु और डिंब के बीच एक समानांतर रूपरेखा होती है, जहां जनन संहिता और कुंडलिनी कुंडली बना कर रहता है। मूलाधार का प्रतीक लाल रंग और चार पंखुडिय़ों वाला कमल है। इसका मुख्य विषय काम वासना, लालसा और सनक में निहित है। शारीरिक रूप से मूलाधार कामवासना को, मानसिक रूप से स्थायित्व को, भावनात्मक रूप से इंद्रिय सुख को और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है। मूलाधार चक्र के जागृत नहीं रहने से मनुष्य को काम प्रधान सिर्फ शरीर ही दिखाई देती है। मनुष्य सदैव सिर्फ स्वयं के बारे में सोचता रहता है। अपनी ही विचारों और कल्पनाओं में खोया रहता है। मूलाधार के जागृत हो जाने से इनसे निवृति मिलती है।

नवरात्रि के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की पूजा की परिपाटी है। ब्रह्मशक्ति अर्थात तप की शक्ति स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होती है। इसलिए समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है। स्वाधिष्ठान चक्र त्रिकास्थि अर्थात कमर के पीछे की तिकोनी हड्डी में अवस्थित होता है और अंडकोष या अंडाशय  के परस्पर के मेल से प्रजनन से जुड़े विभिन्न तरह का यौन अंत:स्राव उत्पन्न करता है। त्रिक चक्र का प्रतीक छह पंखुडिय़ों और उससे परस्पर जुड़ा नारंगी रंग का एक कमल है। स्वाधिष्ठान का मुख्य विषय संबंध, हिंसा, व्यसन, मौलिक भावनात्मक आवश्यकताएं और सुख है। शारीरिक रूप से स्वाधिष्ठान प्रजनन, मानसिक रूप से रचनात्मकता, भावनात्मक रूप से प्रसन्नता और आध्यात्मिक रूप से उत्सुकता को नियंत्रित करता है। स्वाधिष्ठान चक्र के जागृत न होने से व्यक्ति की रचनात्मकता बाधित होती है। वह नीरसता से कार्य करता है। नए विचारों और रचनात्मकता दोनों ही मस्तिष्क में प्रवेश नहीं पा सकते।

नवरात्रि का तृतीय दिवस माता चंद्रघंटा को समर्पित है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र से जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वत: प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। चयापचय और पाचन तंत्र से संबंधित मणिपुर या मणिपूरक चक्र नाभि स्थान पर होता है। यह पाचन में, शरीर के लिए खाद्य पदार्थों को ऊर्जा में रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इसका प्रतीक दस पंखुडिय़ों वाला कमल है। मणिपुर चक्र से मेल खाता रंग पीला है। मणिपुर चक्र द्वारा नियंत्रित होने वाले मुख्य विषय हैं- निजी बल, भय, व्यग्रता और सहज या मौलिक से लेकर जटिल भावना तक के परिवर्तन। शारीरिक रूप से मणिपुर चक्र पाचन, मानसिक रूप से निजी बल, भावनात्मक रूप से व्यापकता और आध्यात्मिक रूप से सभी उपादानों के विकास को नियंत्रित करता है।

नवरात्रि के चतुर्थ दिवस की प्रमुख देवी भगवती कूष्मांडा की पूजा और आराधना से शरीर का अनाहत चक्र जागृत होता है। सीने में स्थित अनाहत चक्र बाल्य ग्रंथि से संबंधित है। बाल्य ग्रंथि प्रतिरक्षा प्रणाली का तत्व है, और यह अंत:स्त्रावी तंत्र का अनन्य हिस्सा है। यह चक्र तनाव के प्रतिकूल प्रभाव से बचाव का कार्य भी करता है। अनाहत का प्रतीक बारह पंखुडिय़ों का एक कमल है। अनाहत हरे या गुलाबी रंग से संबंधित है। अनाहत से जुड़े मुख्य विषय जटिल भावनाएं, करुणा, सहृदयता, समर्पित प्रेम, संतुलन, अस्वीकृति और कल्याण हैं। शारीरिक रूप से अनाहत चक्र संचालन को नियंत्रित करता है, भावनात्मक रूप से अपने और दूसरों के लिए समर्पित प्रेम, मानसिक रूप से आवेश और आध्यात्मिक रूप से समर्पण को नियंत्रित करता है। इस चक्र के बाधित होने से व्यक्ति भीरु, डरपोक हो जाता है। वह अपनी बात कहने में हिचकने लगता है तथा कई बार सत्य बात का भी समर्थन नहीं कर पाता।

नवरात्रि के पंचम दिन देवी के पंचम स्वरूप स्कंदमाता की पूजा से साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है, जिससे ध्यान वृत्ति एकाग्र होती है। यह शक्ति परम शांति व सुख का अनुभव कराती है। विशुद्ध चक्र गले में अवस्थित गलग्रंथि के समानांतर है और थायरॉयड हारमोन उत्पन्न करता है, जिससे विकास और परिपक्वता आती है। इसका प्रतीक सोलह पंखुडिय़ों वाला कमल है। विशुद्ध की पहचान हल्के या पीलापन लिये हुए नीला या फिरोजी रंग है। यह आत्माभिव्यक्ति और संप्रेषण जैसे विषयों को नियंत्रित करता है। शारीरिक रूप से विशुद्ध संप्रेषण, भावनात्मक रूप से स्वतंत्रता, मानसिक रूप से उन्मुक्त विचार और आध्यात्मिक रूप से सुरक्षा की भावना को नियंत्रित करता है। इस चक्र के बाधित होने पर व्यक्ति निस्तेज होने लगता है। बीमारियां घेरती हैं और वाणी का प्रभाव लगभग समाप्त हो जाता है।

नवरात्रि के छठे दिन दुर्गा के कात्यायनी रूप की पूजा -उपासना करने से आसुरी प्रवृत्ति व शत्रुता का नाश होता है। इस दिन साधक का मन आज्ञा अर्थात ललाट चक्र में अवस्थित होता है। दोनों भौहों के मध्य स्थित आज्ञा चक्र का प्रतीक दो पंखुडिय़ों वाला कमल है और यह सफेद, नीले या गहरे नीले रंग से मेल खाता है। आज्ञा का मुख्य विषय उच्च और निम्न अहम को संतुलित करना और अंतरस्थ मार्गदर्शन पर विश्वास करना है। आज्ञा का निहित भाव अंतर्ज्ञान को उपयोग में लाना है। मानसिक रूप से आज्ञा दृश्य चेतना, और भावनात्मक रूप से आज्ञा शुद्धता के साथ सहज ज्ञान के स्तर से जुड़ा होता है। इस चक्र में बाधा के कारण व्यक्ति पुराने मान-अपमान, अपराध बोध आदि से ग्रसित रहता है। सिर दर्द, तनाव आदि बने रहते हैं। क्षमाशीलता का अभाव होता है। आज्ञा चक्र भेदन में सफलता प्राप्त व्यक्ति अज्ञात भय से मुक्ति पा लेता है। और परमात्मा की झलक अधिक समय के लिए प्राप्त करने में आध्यात्मिक सफलता प्राप्त कर लेता है।

महाशक्ति माता दुर्गा का  सातवां स्वरूप कालरात्रि काल का नाश करने वाली है, इसी कारण इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। सातवें दिन की उपासना से भानु चक्र की शक्तियां जागृत होती हैं। वस्तुतः भानु एक चक्र न होकर नाड़ी है। इसे सूर्य अथवा पिंगला नाड़ी भी कहा जाता है। मनुष्य के शरीर में दहिनी ओर इच्छा शक्ति है। इसे पिंगला नाड़ी भी कहा जाता है। यही नाड़ी इच्छा पूर्ति के लिए कार्य करने की शक्ति देती है। शरीर के संपूर्ण दाएं भाग को प्रभावित करने वाली यह नाड़ी शारीरिक एवं बौद्धिक कार्य करने वाली है। यह चक्र भविष्य काल, अतिद्नेय चेतन व रजोगुण का प्रतीक है। इसके सूक्ष्म गुण स्वाभिमान, कृति, शारीरिक एवं मानसिक हलचल व शारीरिक एवं बौद्धिक कार्य हैं। इसमें बाधा होने पर अहंकार, हठयोग, जिद्दी स्वभाव, भविष्य के बारे में बहुत ज्यादा सोचना, बेशर्मी आदि अवगुण आ जाते हैं।

नवरात्रि के अष्टम दिवस माता महागौरी की परिपाटी है। यह अष्टम दिवस शरीर के सोम चक्र को जागृत करने का दिन है। महागौरी की आराधना से सोम चक्र जागृत हो जाता है और इस चक्र से संबंधित सभी शक्तियां साधक को प्राप्त हो जाती हैं। वास्तव में सोम भी चक्र न होकर नाड़ी है। इसे चंद्र व इडा नाड़ी भी कहते हैं। यह नाड़ी मनुष्य के शरीर में अधिभौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की बांई ओर स्थित इच्छा शक्ति है। शरीर के संपूर्ण बाएं हिस्से को प्रभावित करने वाली इस नाड़ी को इडा नाड़ी भी कहते हैं। यही नाड़ी भूतकालीन स्मृतियों को सचेतन करती है। जिसके कारण क्रिया करने में आसानी होती हैं। जब तक यह शक्ति कार्यरत रहती है, तब तक मनुष्य में जीवन जीने की अभिलाषा रहती है। भूतकाल, सुप्त चेतन, प्रति अहंकार इसके गुण हैं। इस नाड़ी के सूक्ष्म गुण भावना, पवित्रता, अस्तित्व, आनंद, इच्छा व मांगल्य है। इस नाड़ी में किसी भी प्रकार की बाधा होने पर आलस, अंधश्रद्धा, अंधविश्वास, अपराध की भावना, अश्लील लेखन या वाचन करना आदि अवगुण आ जाते हैं

नवरात्रि के अंतिम दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। अंतिम दिन पूजा के समय अपना सारा ध्यान सहस्रार अर्थात निर्वाण चक्र पर लगाने से देवी की कृपा से इस चक्र से संबंधित शक्तियां स्वत: ही भक्त को प्राप्त हो जाती हैं। सहस्रार को शुद्ध चेतना का चक्र माना जाता है।  जिस प्रकार किसी भी देवी- देवता के सिर के पीछे शीर्ष के ऊपर ज्योतिर्मान आभा दिखाई देती है, उसी प्रकार यह शरीर से बाहर ऊपर की ओर स्थित होता है। इसका प्रतीक कमल की एक हजार पंखुडिय़ां हैं। सहस्रार चक्र बैंगनी रंग का प्रतिनिधित्व करता है और यह आतंरिक बुद्धि और दैहिक मृत्यु से जुड़ा होता है। सहस्रार का आतंरिक स्वरूप कर्म के निर्मोचन से, दैहिक क्रिया ध्यान से, मानसिक क्रिया सार्वभौमिक चेतना और एकता से और भावनात्मक क्रिया अस्तित्व से जुड़ा होता है। यह चक्र सभी चक्रों में श्रेष्ठतम है। इसकी सुप्त अवस्था के कारण परमात्मा की परमशक्ति को समझ न पाना, मस्तिष्क का कम काम करना, याददाश्त का कम रहना आदि समस्याएं रहती हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि शक्ति रूपी प्राण ऊर्जा इड़ा, पिंगला नाड़ी में सन्तुलन बनाकर सुषुम्ना से प्रवाहित होते रहने के कारण ही मनुष्य जिन्दा रहता है। जैसे ही किसी चक्र पर बाधा उपस्थित होती है अर्थात कोई भी चक्र  ब्लॉकेज होता है, उस चक्र से जुड़ी परेशानियां उभरती दिखाई देती हैं। लेकिन इसके समन्वय से समस्त परेशानियां मिट जाती हैं। इसलिए नवरात्रि काल का सदुपयोग देवीभक्त इन शक्तियों के जागरण और सन्तुलन हेतु करते हैं।

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