असंतोष और कोरोना के बीच उपचुनाव की चुनौती

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा द्वारा मध्य प्रदेश में उपचुनाव समय पर कराए जाने के संकेत दिए जाने के बाद दोनों ही राजनीतिक दलों को इस बात की चिंता सताने लगी है कि कोरोना की बढ़ती संख्या और दलों के अंदर पनप रहे असंतोष के बीच उपचुनाव की चुनौती को कैसे पार करेंगे।

यदि समय पर चुनाव हुए तो सितंबर के आखिर सप्ताह में चुनाव हो जाएंगे। दरअसल, मध्यप्रदेश में इस समय कोरोना महामारी तेजी से पैर पसार रही है। ऐसे में 2 दिन का लॉकडाउन सप्ताह में घोषित किया गया है। रात्रि कर्फ्यू लगाया जा रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने के लिए खड़ी निर्देश दिए जा रहे हैं।

ऐसे में यदि चुनाव घोषित होते हैं तो फिर राजनीतिक दलों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होंगे कोरोना के अलावा प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस को अपने अपने घरों के अंदर पनप रहे असंतोष को थामने की भी चुनौती है। दोनों ही दलों में अलग-अलग प्रकार से दलीय निष्ठा दरकी है। खासकर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस जिसकी की 24 विधायक अब तक पार्टी छोड़कर भाजपा में हो चुके हैं। हर दिन किसी न किसी विधायक की पार्टी छोड़ने की सोशल मीडिया पर चर्चा होती रहती है। अब कोई भी कांग्रेस का विधायक भाजपा के किसी मंत्री के बड़े नेता से मिलता है तो फिर उसको लेकर कयासों के दौर शुरू हो जाते हैं कि कहीं यह विधायक भी भाजपा में तो नहीं जा रहा। जैसा कि सोमवार को कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक के.पी. सिंह, मंत्री नरोत्तम मिश्रा से मिले।

उसके बाद से ही अटकलें लगने लगी के पी सिंह को सफाई देनी पड़ी कि हम लोग एक ही संभाग से आते हैं और वर्षों से हम लोगों का नाता है और क्षेत्र के काम के लिए हम जाते हैं। इसमें किसी प्रकार की संशय की स्थिति नहीं है। इसी तरह क्षेत्र के एक युवक को लेकर भी चर्चा चली कि वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। तब क्षेत्र के कांग्रेस के युवा विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा को भी कहना पड़ा कि ऐसा कुछ भी नहीं है। इसके पहले दमोह विधायक राहुल लोधी और बंडा विधायक तरवर लोधी को भी भी सफाई देनी पड़ी और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को दोनों विधायकों के साथ फोटो भी जारी करवाना पड़ी।

दूसरी तरफ प्रदेश और देश में सत्तारूढ़ होने के बावजूद भी भाजपा में पहली बार असंतोष बयानों और ट्वीट के जरिए सार्वजनिक हो रहा है। पहले मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान जिन भ्रष्ट मंत्रियों को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली उन्होंने अपना दर्द सार्वजनिक बयां किया। पूर्व मंत्री अजय विश्नोई ने तो लगातार 1 सप्ताह तक किसी न किसी मुद्दे पर ट्वीट किए। वहीं जिन क्षेत्रों में उपचुनाव होना है। उन क्षेत्रों के 2018 के भाजपा उम्मीदवार अभी तक कांग्रेस से आए विधायकों को एडजस्ट नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि पार्टी नेताओं के दबाव में अब सार्वजनिक बयानबाजी तो बंद हो गई है लेकिन जिस तरह से खुलकर संभावित भाजपा प्रत्याशियों की सार्वजनिक तारीख करना चाहिए उसमें अभी भी संकोच कर रहे हैं। इसी तरह जो विधायक तीन या चार बार के चुनाव जीते हैं वे भी मंत्रिमंडल में जगह ना पाने के बाद पार्टी के पक्ष में उत्साहित नजर नहीं आ रहे हैं।

इन विधायकों को उम्मीद है कि पार्टी उनकी नाराजगी को समझें और निगम-मंडलों में कहीं ना कहीं एडजस्ट करें। वैसे एक-दो दिन में भाजपा संगठन की प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा होने वाली है जिस में भी कुछ विधायकों को समायोजित किया जाना है लेकिन राजनीति में खासकर जब दल सत्ता में हो तब सभी संगठन की बजाय सत्ता में भागीदारी चाहते हैं। ऐसे तमाम कारणों से सत्ताधारी दल में भी अंदर ही अंदर जो असंतोष है, उसको थामना पार्टी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। इस समय संघ प्रमुख और महत्वपूर्ण पदाधिकारी राजधानी भोपाल में है। इससे माना जा रहा है कि सत्ता और संगठन का जो भी असंतोष का मामला है उसको शांत किया जाएगा क्योंकि पार्टी हर हाल में 26 सीटों के उपचुनाव में अधिकतम सीटें जीतना चाहती है।

कुल मिलाकर यदि मुख्य चुनाव आयुक्त के संकेत के अनुसार सितंबर के अंतिम सप्ताह में 26 सीटों के विधानसभा के उपचुनाव होते हैं तो प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस के लिए होना महामारी के साथ-साथ पार्टी में उन पर असंतोष को दूर करना भी सबसे बड़ी चुनौती है

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