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दिल्ली फुटबाल की बदली दशा?

शाजी ने जब पांच साल पहले दिल्ली फुटबाल की कमान संभाली थी तो कुछ क्लब अधिकारियों ने उनकी उम्र और तजुर्बे का सवाल उठाया था। लेकिन वही शख्स अब एआईएफएफ के शीर्ष पद की दावेदारी पेश करने जा रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि शाजी ने ऊंची छलांग लगाने का साहस पिछले पांच सालों की कमाई के दम पर बटोरा है।

पिछले कुछ सालों में ऊपर के स्तर पर भारतीय फुटबाल में काफी कुछ बदलाव हुए हैं लेकिन खेल के स्तर में सुधार क्यों नहीं हो पाया है? क्यों भारतीय फुटबाल एशियाई देशों में भी अपनी पहचान नहीं बना पा रही और कमी कहाँ है? इन सवालों के जवाब अखिल भारतीय फुटबाल फेडरेशन (एआईएफएफ) के पास भी नहीं हैं, जोकि खुद सवालों से घिरी पड़ी है।

लेकिन दिल्ली साकर एसोसिएशन के अध्यक्ष शाजी प्रभाकरन सीधे सीधे फेडरेशन को सारे फसाद की जड़ बताते हैं। उल्लेखनीय है कि फेडरेशन की कारगुजारियों के विरुद्ध शाजी ने अलग तरह की मुहिम चलाई है। उनका मानना है कि जब फुटबाल की पितृ संस्था ही गंभीरता नहीं दिखाएगी और ईमानदारी से काम नहीं करेगी तो किसी भी खेल और खिलाडी का भला कैसे हो सकता है!

शाजी ने जब पांच साल पहले दिल्ली फुटबाल की कमान संभाली थी तो कुछ क्लब अधिकारियों ने उनकी उम्र और तजुर्बे का सवाल उठाया था। लेकिन वही शख्स अब एआईएफएफ के शीर्ष पद की दावेदारी पेश करने जा रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि शाजी ने ऊंची छलांग लगाने का साहस पिछले पांच सालों की कमाई के दम पर बटोरा है। भले ही स्थानीय फुटबाल में उनके विरोधियों की संख्या कम नहीं है लेकिन एक बड़ा वर्ग और खासकर खिलाड़ी मानते हैं कि दिल्ली की फुटबाल बदल रही है।

ग्रासरूट से लेकर ऊपर के स्तर पर फुटबाल में सुधार के प्रयास जारी हैं। भारतीय राष्ट्रीय फुटबाल पर सरसरी नजर दौड़ाएं तो फेडरेशन की तमाम सदस्य इकाइयों की हालत खस्ता है। चार-छह प्रदेशों को छोड़ फेडरेशन और उसकी तमाम सदस्य इकाइयां बुरे दौर से गुजर रही हैं। कुछ साल पहले तक दिल्ली की फुटबाल भी घिसट घिसट कर चल रही थी। उमेश सूद, नासिर अली, वाई एस चौहान, नरेंद्र भाटिया, मगन सिंह पटवाल, हेम चंद जैसे समर्पित पदाधिकारियों के प्रयास इसलिए रंग नहीं दिखा पाए क्योंकि प्रगति की रफ़्तार धीमी थी। लेकिन दिल्ली साकर एसोसिएशन ने लगातार कोशिशों के बाद शायद सही ट्रैक पकड़ लिया है। इसलिए चूँकि बागडोर युवा दिमाग के पास है।

पिछले कुछ सालों तक डीएसए अपने सालों पुराने ढर्रे पर चलते हुए ए, बी और सीनियर डिवीज़न लीग का आयोजन करती आ रही थी। अब सी डिवीज़न के साथ साथ छोटे आयुवर्ग के आयोजन भी किए जा रहे हैं। लेकिन प्रीमियर लीग के आयोजन के साथ दिल्ली देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसने फुटबाल के सम्पूर्ण आयोजन का दर्जा हासिल कर लिया है।

देश के कुछ जाने माने फुटबाल खिलाड़ी और प्रशासक भी कह रहे हैं कि भारतीय फुटबाल को युवा दिमाग और पेशेवर सोच कि जरुरत है। प्रफुल्ल पटेल जैसे नेता इसलिए भारतीय फुटबाल को गर्त से नहीं निकाल पाए क्योंकि वे घिसे पिटे ढर्रे पर चल कर फुटबाल की आड़ में राजनीतिक रोटियां सेंक रहे थे।

देश के फुटबाल जानकार और पूर्व खिलाड़ी एक ऐसा अध्यक्ष चाहते हैं जो खेल का इस्तेमाल राजनैतिक महत्वाकांक्षा के लिए ना करे। चूँकि फिलहाल शाजी का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है इसलिए उन्हें स्वीकार किया जा सकता है। यदि वह फेडरेशन के अधयक्ष बनते हैं तो भारतीय फुटबाल को सही दिशा दे सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे कि उन्होंने दिल्ली की फुटबाल में बदलाव की शुरुआत की है।

यह सही है कि शाजी को मेहनती और समर्पित युवा टीम का समर्थन मिल रहा है और टीम डीएसए और फुटबाल दिल्ली के युवा कर्मी स्थानीय फुटबाल के सुधार में बढ़चढ़ क्र योगदान दे रहे है। नतीजन दिल्ली भारतीय फुटबाल मानचित्र पर हट कर नजर आने लगा है। हालाँकि ऐसा पहले भी हो सकता था लेकिन पूर्व पदाधिकारियों में से ज्यादातर या तो सुस्त चाल से चल रहे थे या उनके लिए अपने क्लब का हित सर्वोपरि रहा।

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