कांग्रेस की इस फेरबदल से क्या?

लोकतंत्र की सारी शिक्षा, कवायद राजनीतिक दल भूल गए हैं। जनता को शिक्षित, जागरुक करना तो छोड़ा ही, कार्यकर्ता बनाना भी बंद कर दिया। पहले कार्यकर्ता पैदा किए जाते थे और इनमें से नेता बनाए जाते थे। इन्दिरा गांधी ने सबसे ज्यादा नेता बनाए। 1966 में प्रधानमंत्री बनते ही इन्दिरा गांधी को विपक्ष के साथ खुद अपनी पार्टी के पुराने नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ा। इसके साथ ही राजनीति, मीडिया, जिसे उसे समयप्रेस कहा जाता था के अलावा अन्य क्षेत्रों के पुरूषवादियों का भी। जो एक महिला को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार ही नहीं कर पा रहे थे।

इन्दिरा ने इन सबका मुकाबला करने के लिए नई टीम बनाई। नया नेतृत्व विकसित किया। जिनमें से बाद में युवा तुर्क बहुत मशहूर हुए। याद रहे ये वही समय था जिसे लोहिया ने अपने गैरकांग्रेसवाद के लिए सबसे उपयुक्त पाया था। और भाजपा, जो उस समय जनसंघ कहलाती थी से हाथ मिलाकर 1967 में कई राज्यों में संयुक्त विधायक दल (संविद ) की सरकारें बना लीं थीं।दूसरी तरफ पार्टी के अंदर उनके बैंकों के राष्ट्रीयकरण के प्रस्ताव को गिरा दिया गया था। उनकी मर्जी के खिलाफ नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बना दिया गया था। ऐसे में इन्दिरा ने विघ्न बाधा पैदा करने वालों से सुलह समझौते के बदले नए लोगों को ताकत दी और उन्हें सामने खड़ा कर दिया। राष्ट्रपति के लिए वीवी गिरी को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया।बाकी तो इतिहास है कि देश में आज तक का पहला निर्दलीय उम्मीदवार राष्ट्रपति का चुनाव जीता। इन्दिरा ने नए विकसित किए नेताओं की मदद से न केवल बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया बल्कि राजाओं के प्रिविपर्स औरप्रिवलेज भी खत्म कर दिए। इन दोनों फैसलों को आजादी के बाद के सबसे क्रान्तिकारी फैसलों में माना जाता है।

इन्दिरा की वह सीख आज कांग्रेस भूल गई है। इन्दिरा ने 1966 के बाद और फिर 1977 के अपने सबसे संघर्षपूर्ण दौर में नए लोग और नए विचार के साथ काम किया और सफलता पाई। संघर्ष के अपने पहले दौर में उन्हें मोरारजी देसाई, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष निर्जलिंगप्पा, एसके पटिल जैसे दिग्गजों से लोहा लेना पड़ा। और 1977 की हार के बाद जगजीवन राव और हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे बड़े नेताओं के विश्वासघात से। मगर इन्दिरा ने किसी के सामने हथियार नहीं डाले। खुद अपने ऊपर भरोसा और जनता पर विश्वास की दम परवे हमेशा लड़ती रहीं।अभी कांग्रेस ने अपने संगठन में फेरबदल किया। 23 असंतुष्ट नेताओं द्वारा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को नया अध्यक्ष चुनने, कांग्रेस वर्किंग कमेटी में चुनाव के जरिए सदस्य बनाने को लेकर लिखे गए एक पत्र के बाद

माना जा रहा था कि अब कांग्रेस में कोई बड़ा परिवर्तन दिखेगा। खासतौर पर राहुल गांधी के इस गुस्से के बाद कि पत्र लिखने वालों ने यह भी नहीं देखा कि इस समय सोनिया गांधी अस्वस्थ हैं और अस्पताल में भर्ती हैं। कांग्रेस में इस बात के लेकर भी नाराजगी थी कि ये नेता सोनिया से मिलते रहते थे वहां बात कहने के बदले इन्होंने एक गुट बनाकर पत्र लिखा और फिर इसे मीडिया में लीक कर दिया। दिग्विजय सिंह, अजय माकन, राजीव सातव, रणदीप सुरजेवाला जैसे पार्टी के वफादार नेताओं ने पत्र लिखने की इस अप्रत्याशित और अवांछित हरकत का कड़ा विरोध किया। पत्र लिखने के बाद सीडब्ल्यूसी की मीटिंग में ही अहमद पटेल और अंबिका सोनी जैसे परिवार के वरिष्ठ विश्वासपात्रों ने पत्र लिखने वालों की काफी लानत मलामत की।

जाहिर है कि इसके बाद समझा जा रहा था कि पार्टी एक मजबूत फैसला लेगी। 6 साल से जिस बड़े आपरेशन को टाल रही है उसे अंजाम देगी। मगर इस नए फेरबदल में कांग्रेसियों को ढाक के वही तीन पात नजर आए। थोड़ी बहुत कास्मेटिक सर्जरी के अलावा रोग की जड़ तक पहुंचने का कोई प्रयास नजर नहीं आया। और सबसे आश्चर्यजनक तो यह कि सीडब्ल्यूसी के चुनाव मांग रहे नेता गुलामनबी आजाद और आनंद शर्मा सीडब्ल्यूसी में अपने मनोनयन पर चुप रह गए। इसका मतलब उठाए गए मुद्दे किसी और उद्देश्य के लिए थे। उनका संबंध किसी सिद्धांत, पार्टी की बहबूदी से नहीं था।

तो क्या पार्टी का नेतृत्व यह नहीं जानता? और अगर सोनिया व राहुल को पता है और फिर भी ये लोग रेत में सिर छिपाए बैठे है तो फिर कांग्रेस का ईश्वर ही मालिक है!  क्या सोनिया और खासतौर से राहुल गांधी को यह नहीं पता कि इस तरह विरोध का डंका पीटने वालों को पुरस्कार और मेहनत से काम करने वालों की अनदेखी का कार्यकर्ताओं और नेताओं में क्या संदेश जाएगा?  जितिन प्रसाद द्वारा पत्र पर हस्ताक्षर करने का यूपी में बड़ा तीखा विरोध हुआ। उनके खिलाफ कांग्रेसियों ने प्रदर्शन किया। लखीमपुर खीरी के जिला कांग्रेस कमेटी ने जितिन को पार्टी से निकालने का प्रस्ताव पास करके कांग्रेस अध्यक्ष के पास दिल्ली भेजा। और मजेदार बात यह कि उनके समर्थन में कौन कांग्रेसी नेता आए, वही चिट्ठी पर हस्ताक्षर करने वाले कपिल सिब्बल और शशि थरूर। मतलब सबने एकसाथ मिलकर बगावत का बिगुल ही नहीं फूंका बल्कि उसे जारी रखने का करार भी किया था।

जितिन पर कांग्रेसियों के इतना कुपित होने का क्या कारण था? शायद यह कि उन्हें और उनके परिवार को सोनिया ने हमेशा दिया मगर उसके बावजूद इनके यहां से विरोध का स्वर बंद नहीं हुआ। जितिन के पिता जितेन्द्र प्रसाद सोनिया गांधी के खिलाफ कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़े थे। मगर सोनिया ने इसे भूलाकर जितेन्द्र प्रसाद के बाद उनकी पत्नी कांता प्रसाद को टिकट दिया। सोनिया को उस समय बताया भी गया था कि लोगों की भावनाएं जितेन्द्र प्रसाद के खिलाफ हैं उनकी पत्नी चुनाव नहीं जीत पाएंगी। मगर फिर भी उन्होंने जितेन्द्र प्रसाद की सीट उनके परिवार के बाहर न चली जाए यह सोचकर टिकट दे दिया था। नतीजा वहीं हुआ कांता प्रसाद नहीं जीत पाईं। उसके बाद सोनिया ने जितिन को न केवल सांसद बनाया बल्कि मंत्री भी बनाया। वे जितिन पत्र लेखकों में शामिल हों यह बात यूपी के लोगों को बहुत नागवार गुजरी थी। लेकिन अब तो और इंतहा हो गई जब जितिन को पुरस्कृत करके महासचिव बनाया गया और चुनाव वाले राज्य बंगाल का प्रभारी बनाया गया।इसके क्या संदेश हैं?

कि कांग्रेस में कुछ कहो, करो आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। साथ ही पुरुस्कृत होने की भी पूरी संभावना है। छोटे छोटे जिलों से लेकर, राज्यों में लड़ रहे कांग्रेसियों के लिए यह कोई अच्छा संदेश नहीं है। इसका अर्थ है कि राहुल शिकायत करते हैं मगर नए लोगों को लाने और उन्हें जिम्मेदारी सौंपने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। राहुल जो साहस मोदी सरकार पर आक्रमण पर आक्रमण करके दिखा रहे हैं, उन्हें वह साहस पार्टी के अंदर दिखाना होगा। कहीं की ईंट कहीं के रोड़े से कुनबा नहीं जुड़ेगा!

आशावादी लोग इसे राहुल की टीम बता रहे हैं। कह रहे हैं कि राहुल की ताजपोशी की तैयारी हो रही है। मगर क्या नई बनाई इस टीम में कुछ नया है? वह जोश और जुनून है जिसकी इस समय श्लथ पड़ी कांग्रेस को जरूरत है? क्यॉ इनमें से कुछ को छोड़कर बाकी नेताओं में कुछ कर गुजरने की, खुद को साबित करने की आग है? कांग्रेस की राह कठिन है, परिस्थितियां प्रतिकूल हैं। ऐसे में दाएं बाएं देखते, लड़खड़ाते लोगों की टीम राहुल पर बोझ ही बनेगी उनकीताकत नहीं!

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