राज्यसभा में शह-मात बिछाएगी उपचुनाव की बिसात..!

मध्य प्रदेश में 24 विधानसभा सीट के उप चुनाव की तैयारी में कांग्रेस और भाजपा दोनों जुट गए, इस बीच कोरोना के चलते स्थगित कर दिए गए राज्यसभा के चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होती है। 19 जून को प्रस्तावित मतदान से पहले दोनों प्रमुख दलों के विधायकों की संयुक्त बैठक बुलाई गई है।

जो शिवराज सिंह चौहान और कमलनाथ के नेतृत्व में 17 जून को होगी.. सरकार बदलने के बाद इस बैठक में कौन नहीं पहुंचता या निर्दलीय सपा बसपा अपनी निष्ठा बदलेंगे इस पर पैनी नजर रहेगी। जो पहले भी सरकार के साथ थे तो अब सरकार बदल जाने के साथ पाला बदल चुके है।

भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर भाजपा विधायक दल का हिस्सा बनेंगे.. तो उधर दीपक बाबरिया के जाने के बाद प्रदेश कांग्रेस के नए प्रभारी मुकुल वासनिक का यह पहला दौरा होगा.. जब वह सीधे अपने विधायकों से रूबरू होंगे ..विधानसभा का गणित भाजपा के पक्ष में उसे सीधे 2 सीट ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुमेर सिंह को राज्यसभा में भेज रहा है.. तो कांग्रेस की ओर से फूल सिंह बरैया के मुकाबले पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के राज्यसभा में एक बार फिर जाने का रास्ता प्रशस्त तो होने वाला है.. तो कांग्रेस में फर्स्ट और सेकंड प्राइरटी को लेकर वैसे तो दिग्गी राजा की दावेदारी के साथ सस्पेंस खत्म हो चुका है.. बावजूद इसके प्रदेश प्रभारी के ऐलान का इंतजार है।

जिनकी देखरेख में कांग्रेस विधायकों को उम्मीदवारों के मतदान करने के लिए चिन्हित किया जाए .. पहले 52 और अतिरिक्त विधायकों की प्राथमिकता कांग्रेस को तय करना है.. भाजपा द्वारा राज्यसभा चुनाव में अनुसूचित जाति के फूल सिंह बरैया से सहानुभूति उन्हें कांग्रेस द्वारा नजरअंदाज किए जाने को एक मुद्दा बनाने की कोशिश जरूर की है.. वह बात और है कि ग्वालियर चंबल की जिन सीटों पर विधानसभा के उपचुनाव होना है.. वहां के कार्यकर्ताओं के साथ बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ लगातार फूल सिंह की उपस्थिति सुनिश्चित कर रहे हैं.. ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर चले जाने के बाद पार्टी के अंदर बने नए समीकरण उसे नई चुनौती को सोचने को मजबूर कर रही है । आधा दर्जन सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. जहां विधानसभा के चुनाव होना है।

ऐसे में कांग्रेस का एक खेमा उप चुनाव को ध्यान में रखते हुए शोषित और पीड़ित की आवाज उठाने वाले फूल सिंह को राज्यसभा में देखना चाहता है.. जो नहीं चाहता कि कांग्रेस पर इस उपचुनाव में सामंतवादी सोच का आरोप लगे.. यह फिलहाल दूर-दूर तक असंभव नजर आता.. यदि दिग्विजय सिंह के समर्थक विधायक बड़ी संख्या में कांग्रेस के अंदर मौजूद है.. तो उनके विरोधियों की मौजूदगी को नकारा नहीं जा सकता..ऐसे में सवाल आखिर कमलनाथ क्या चाहते.. क्या राज्यसभा में किसी अनुसूचित जाति के नेता को पहुंचा कर ग्वालियर चंबल क्षेत्र में वह पार्टी को ताकत और उप चुनाव और रोचक बनाना चाहते हैं.. या फिर अपने दोस्त दिग्गी राजा को और मजबूत साबित करने के लिए उन्हें हर हाल में राज्यसभा में देखना चाहेंगे.. जिससे प्रदेश में दोनों मिलकर लंबी लड़ाई लड़ सके.. यह जानते हुए कि भाजपा इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की फिराक में है ।

तो सवाल क्या कांग्रेस विधायक दल की बैठक में कोई विधायक फूल सिंह के समर्थन में सामने आकर अपनी बात रखेगा.. क्या कमलनाथ इसकी इजाजत देंगे.. वह बात और है कि चौधरी राकेश सिंह का दिग्गी राजा से विवाद मीडिया की सुर्खियां बन चुका है.. तो कांग्रेस की बैठक में कमलनाथ के करीबी माने जाने वालेएक नेता ज्योतिरादित्य की कांग्रेस में वापसी की गारंटी लेते हुए सामने आ चुके.. पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ जो प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं संगठन में अभी भी मजबूत पकड़ रखते.. तो उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व का भरोसा प्राप्त है.. कांग्रेस पहले ही राज्यसभा की एक सीट की प्राथमिकता के कारण उपजे विवाद के चलते प्रदेश में अपनी सरकार गवा चुकी है.. जब ज्योतिरादित्य के समर्थन में 22 विधायकों ने इस्तीफे दे दिए थे.. क्या इस बड़ी चूक को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस राज्यसभा चुनाव में अपने पुराने फैसले को बदलने का जोखिम मोल लेगी।

इन दिनों दिग्गी राजा भाजपा के निशाने पर हैं और मामला थाने तक जा पहुंचा है.. बावजूद दिग्गी राजा पलटवार के साथ फ्रंट फुट पर मोर्चा संभाले हुए है..मुख्यमंत्री रहते कभी दिग्विजय सिंह ने खुद मध्य प्रदेश में दलित एजेंडा को आगे बढ़ाया था.. बदलते राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस के अंदर इस वर्ग विशेष के विधायक भी राज्यसभा में किसी अनुसूचित जाति के नेता को देखना चाहते हैं.. लेकिन उनके लिए पार्टी लाइन अंतिम होगी ..अगले 48 घंटे में कांग्रेस और भाजपा की विधायक दल की बैठक के साथ राज्यसभा की बिसात बिछ चुकी होगी.. तख्तापलट और पिछले अनुभवों को ध्यान में रखते हुए दोनों राजनीतिक दल अपने विधायकों को इस महत्वपूर्ण बैठक के बाद शायद खुलेआम नहीं घूमने दे। लेकिन इन सभी विधायकों के भोपाल में डेरा डाल देने से सियासी माहौल जरूर गरमा जाएगा.. सवाल क्या कांग्रेस निर्दलीय, बसपा, सपा किसी अन्य विधायक का समर्थन हासिल करने में कामयाब होगी।

जो कभी उनकी सरकार के साथ जुड़े थे.. क्योंकि कांग्रेस के लिए चुनौती अपने विधायकों की गैर हाजिरी और क्रॉस वोटिंग बचाने की है.. जबकि पार्टी का एक विधायक कोरोना पॉजिटिव घोषित किया जा चुका है.. प्रबंधन के धनी कमलनाथ के लिए यह राज्यसभा चुनाव यदि अपनी ताकत दिखाने का एक मौका है.. तो उनके सामने चुनौती सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभाने वाले अपने मित्र दिग्विजय सिंह को राज्यसभा में पहुंचाने से ज्यादा फूल सिंह और उनके समर्थकों की नाराजगी उजागर नहीं होने देने की है …सरकार में रहते भाजपा के लिए अतिरिक्त विधायकों का समर्थन उसके गणित को मजबूत करने के लिए जरूरी है तो कांग्रेस के पाले में यह विधायक तभी लौटने का जोखिम मोल लेने जब खुद कांग्रेस का गणित इन चुनाव में मजबूत नजर आएगा।

कमलनाथ और कांग्रेस के दूसरे नेता जो लगातार भाजपा के कुछ विधायकों के बगावत और कांग्रेस के संपर्क में होने का दावा करते रहे हैं.. यह चुनाव उनके दावे को साबित करेगा या फिर पोल खोलेगा.. कांग्रेस के 92 विधायकों के साथ कमलनाथ यदि भाजपा के 107 में से 5 से ज्यादा विधायकों को पाला बदलने को मजबूर करते.. तभी यह चुनाव कांग्रेस को एक नई दिशा दे सकता है.. फिलहाल यह संभव नहीं ..तो सवाल खड़ा होना लाजमी है क्या कमलनाथ राज्यसभा चुनाव को आखिरी लड़ाई मानकर पूरी ताकत लगाएंगे या फिर उनके लिए आखिरी और निर्णायक लड़ाई उपचुनाव साबित हो.. यह उनकी रणनीति का हिस्सा होगा …चर्चा यह भी है कि भाजपा जो फूल सिंह से सहानुभूति रखती है कांग्रेस के अंदर दिग्गी राजा के विरोध को उजागर करने के लिए कुछ विधायकों से क्रॉस वोटिंग या फिर उन्हें गैरहाजिर करने की रणनीति पर काम कर सकती है.. क्या राज्यसभा चुनाव में गुजरात की तर्ज पर मध्य प्रदेश कांग्रेस एक बार फिर कमजोर नजर आएगी या फिर कमलनाथ कांग्रेस इस बार राजस्थान की तर्ज पर भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरेगी।

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