ईसाइयों को करना चाहिए आत्मचिंतन

कोविड-19 के वैश्विक प्रकोप के साए में विश्व (भारत सहित) ने 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाई। इस त्योहार के साथ नववर्ष की उल्टी गिनती भी शुरू हो जाती है। उस नाते सभी पाठकों को इसकी ढेरों शुभकामनाएं। आप सभी कोरोना-मुक्त नए साल में सकुशल, सहर्ष और स्वस्थ प्रवेश करें- ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है।

यूं तो क्रिसमस का संबंध ईसा मसीह की जयंती से है, किंतु इसे अब दुनिया में मनाया जाता है। भारत में ईसाइयों की संख्या देश की कुल आबादी का केवल 2.3 प्रतिशत हैं, तब भी क्रिसमस पर सार्वजनिक अवकाश होता है। किंतु 25 दिसबंर को ही ईसा मसीह का जन्म हुआ था, इसका कोई प्रमाणिक रूप से ऐतिहासिक या वैज्ञानिक आधार नहीं है। यह तिथि कल्पना पर आधारित है। पवित्रग्रंथ बाइबल में वर्णित गोस्पल कथाओं के अनुसार- बैथलहम में “दिव्य-हस्तक्षेप” के बाद कुंवारी मैरी ने यीशु को जन्म दिया था, वह भी बिना किसी पुरुष संपर्क के। इन कथाओं में भी 25 दिसंबर का उल्लेख नहीं है।

यीशु जयंती 25 दिसंबर को ही मनाने की घोषणा, ईसा के जन्म के लगभग 300 वर्ष पश्चात- 350 ईस्वी में तत्कालीन पोप जूलियस-1 (337-52) ने की थी। यह तत्कालीन पोप का एक मनमाना निर्णय था। उन दिनों “पेगन” (बुतपरस्त) रोमनवासी प्रतिवर्ष “सैटर्नालिया” पर्व मनाते थे, जिसमें उत्सव के साथ प्रीतिभोज का आयोजन और उपहारों का आदान-प्रदान भी होता था। यह परंपरा आज हम क्रिसमस के समय भी देखते है। वास्तव में, पोप जूलियस-1 ने बड़े ही चतुराई से एक “पेगन” पर्व पर ईसाइयत का ठप्पा लगा दिया था। संयोग देखिए कि “सैटर्नालिया” उन्हीं सैटर्न देवता (शनिदेव) को समर्पित था, जिनके प्रकोप से बचने हेतु सनातन भारत में आस्थावान हिंदू अनादिकाल से पूजा करते आ रहे है।

ईसाइयों के एक प्रभावी वर्ग ने एक “पेगन” परंपरा को ईसाई चोले में ढालने का विरोध किया। इंग्लैंड में वर्ष 1642-60 के बीच क्रिसमस का त्योहार प्रतिबंधित था। सन् 1659-81 में अमेरिकी नगर मैसाचुसेट्स में भी इस पर्व पर पाबंदी थी। स्मरण रहे कि क्रिसमस पर रोक लगाने वाले स्वयं को यीशु का सच्चा अनुयायी मानते थे। क्रिसमस का उपयोग विरोधियों को प्रताड़ित करने हेतु भी होने लगा था। सन् 1466 में तत्कालीन पोप पॉल-2 के निर्देश पर क्रिसमस के दिन रोम में यहूदियों को सरेआम नग्न घुमाया गया। कालांतर में, यहूदी पुजारियों (रब्बी) को विदूषक परिधान पहनाकर उनका जुलूस निकाले जाने लगा। 25 दिसंबर 1881 को पोलैंड के वारसॉ में 12 यहूदियों को उन्मादी ईसाइयों ने निर्ममता के साथ मौत के घाट उतार दिया, कई महिलाओं का बलात्कार तक किया। जन्म से हिटलर ईसाई था। क्या इस नरपिशाच को यहूदियों के नरसंहार की प्रेरणा सदियों तक चलने वाले यहूदी विरोधी अभियानों से मिली थी?

विश्व में 120 से अधिक ईसाई बहुसंख्यक (51 प्रतिशत से अधिक) देश है और ईसाइयों कुल जनसंख्या 240 करोड़ से अधिक है। प्रश्न है कि इनकी संख्या इतनी कैसे हुई? इसका उत्तर चर्च और ईसाई मिशनरियों द्वारा ईसा मसीह के नाम पर सदियों से चल रहे मजहबी दमनचक्र (मतांतरण सहित) में छिपा है। वर्ष 1492 में क्रिस्टोफर कोलंबस के अमेरिका पहुंचने के बाद वहां के मूल निवासियों, जिन्हे “रेड इंडियंस” कहा जाता है- उन्हे और उनकी संस्कृति-परंपराओं का अस्तित्व चरणबद्ध तरीके से मिटा दिया गया। आज “रेड इंडियंस” संबंधित प्रतीक केवल अमेरिकी संग्राहलयों की शोभा बढ़ा रहे है। इसी तरह, 17वीं-18वीं शताब्दी में न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के मूल स्थानीय जनजातियों का मतांतरण किया गया। कनाडा में 1876-1996 तक ईसाइयत के विस्तार हेतु चर्च ने स्थानीय लोगों को उनकी मूल सांस्कृतिक और पांरपरिक जड़ों से काटकर ईसाई बनाया। इस संदर्भ में जून 2008 में कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर माफी भी मांग चुके है। विश्व के कई हिस्सों की भांति भारत भी इस मजहबी दंश को 16वीं शताब्दी में फ्रांसिस ज़ेवियर के गोवा आगमन से झेल रहा है, जिसे गति ब्रितानियों के औपनिवेशिक राज में मिली। वेटिकन सिटी के आशीर्वाद से चर्च और ईसाई मिशनरियों का मतांतरण अभियान देश के कई भागों में स्वघोषित “सेकुलरिस्टों” और वामपंथियों के प्रत्यक्ष-परोक्ष सहयोग से आज भी जारी है।

ब्रिटेन- दुनिया के उन 16 देशों में से एक है, जिनका राजकीय मजहब या तो ईसाई है या फिर चर्च प्रेरित। वहां चर्च कितना प्रभावशाली है, यह इस बात से स्पष्ट है कि “चर्च ऑफ इंग्लैंड”, जिसके संरक्षण हेतु ब्रितानी राजघराना प्रतिबद्ध और शपथबद्ध है- उसके कुल 42 बिशप-आर्कबिशप में से 26 के लिए ब्रितानी संसद के उच्च सदन- “हाउस ऑफ लार्ड्स” में स्थान आरक्षित है। शासकीय वरिष्ठता की सूची में कैंटरबरी के आर्कबिशप निर्वाचित ब्रितानी प्रधानमंत्री से पहले आते है। चर्च द्वारा संचालित हजारों स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों की शिक्षा का खर्च ब्रितानी सरकार उठाती है। इन विद्यालयों में पाठ्यक्रम भी स्वाभाविक रूप से चर्च तैयार करता है। ऐसी सुविधा अन्य किसी मजहब को प्राप्त नहीं है। विडंबना देखिए कि भारत के कई स्वयंभू बुद्धिजीवी ब्रिटेन के “सेकुलरवाद” को आदर्श और अनुकरणीय मानते है।

भले ही ब्रिटेन के शासन-व्यवस्था पर चर्च का प्रभाव हो, किंतु उसके नागरिकों का विश्वास चर्च से लगातार उठ रहा है। ईसाइयत को मानने वाले 3.3 करोड़ लोगों में से नियमित रूप से चर्च में प्रार्थना करने वालों की संख्या मात्र 10 लाख रह गई है। चर्च के भीतर यौन-उत्पीड़न के सैंकड़ों मामले सामने आने के बाद आस्थावान ईसाइयों की संख्या दुनियाभर में लगातार घट रही है।

अब सोचिए, एक पोप ने सदियों पहले ईसा मसीह की जन्मतिथि निर्धारित की थी, तो संसार बिना किसी प्रश्न के 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाने लगा। किंतु हिंदू समाज से श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिवजी और अन्य देवी-देवताओं के जन्म, उनके जन्मस्थान और अस्तित्व आदि पर निरंतर सवाल पूछा जाता है। वर्ष 2007 का स्मरण करें। कैथोलिक ईसाई सोनिया गांधी द्वारा “रिमोट संचालित” तत्कालीन कांग्रेस नीत संप्रग-1 सरकार ने सेतुसमुद्रम परियोजना के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल करके दावा किया था- “श्रीराम एक काल्पनिक चरित्र है, जिनका अस्तित्व सिद्ध करने का कोई ऐतिहासिक-वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।” भले ही विरोध के पश्चात वह हलफनामा वापस ले लिया गया हो, परंतु अदालत में प्रश्न उठा था- वह भी वामपंथ समर्थित सरकार की ओर से। वास्तव में, यह घटना भारत की बहुलतावादी सनातन संस्कृति और उसके प्रतीकों के खिलाफ षड़यंत्र का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

सौभाग्य से क्रिसमस का पर्व मनाने वालों पर किसी ने “असभ्य” सवाल नहीं दागे है। होली पर पानी और महाशिवरात्रि पर दूध की “बर्बादी” का संज्ञान लेने वालों ने कभी नहीं पूछा कि क्रिसमस पर घरों, दुकानों और बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल्स को भिन्न-भिन्न रोशनियों से सजाने में कितनी मेगावॉट ऊर्जा “बर्बाद” होती है। दीवाली पर “ग्रीन-पटाखे” छुड़ाने और दुर्गा-पूजा व गणेश-चतुर्थी पर “इको-फ्रेंडली” प्रतिमाओं के विसर्जन पर बल देने वालों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि क्रिसमस पर सजावट और उपहारों में इस्तेमाल “ज़हरीला” प्लास्टिक या फिर करोड़ों असली पेड़ काटकर बने “क्रिसमस-ट्री” और “ग्रीटिंग कार्ड्स” से पर्यावरण पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है। 500 वर्ष पुराने पारंपरिक भोजन के नाम पर दुनियाभर में करोड़ों- अकेले इंग्लैंड में प्रतिवर्ष 1 करोड़, तो अमेरिका में 2.2 करोड़ टर्की पक्षी मार दी जाती है। क्रिसमस के कारण टर्की-पालन एक वैश्विक उद्योग बन चुका है- जिसमें भूमि, जल और अन्य संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग होता है। इन सबका पर्यावरण पर कितना प्रतिकूल असर पड़ता है- इस ओर किसी भी स्वघोषित पर्यावरणविद् ने ध्यान नहीं दिया।

ईसा मसीह संबंधित पौराणिक-कथाओं से समझ में आता है कि वे सादगी में विश्वास रखने, गरीब-कमजोर की चिंता करने और आडंबर आदि तामझाम से दूर रहने वाले एक आध्यात्मिक पुरूष थे। इसलिए उन्हें श्रद्धापूर्वक “ईश्वरपुत्र” के रूप में स्मरण किया जाता है। इसपर चर्च और ईसाइयों को सोचना चाहिए कि जिस तरह यीशु के “कल्पित” जन्मदिन पर विश्वभर में अकूत धनसंपदा के साथ सीमित प्राकृतिक संसाधनों को “असंगत” जश्न के नाम पर “बर्बाद” किया जा रहा है- क्या यह सब ईसा मसीह के सौम्य व्यक्तित्व, उनके सरल जीवन और उनकी शिक्षाओं के अनुरूप है?

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