उपचुनाव की जमावट में कांग्रेस का भाजपा से पिछड़ना मजबूरी या रणनीति?

राजनीति में विरोधी दल पर हावी रहना या उनसे पिछड़ना हमेशा से ही रणनीति का हिस्सा रहा है। कुछ ऐसा ही हाल वर्तमान में मध्यप्रदेश की सियासी राजनीति का भी है। मध्यप्रदेश में 24 सीटो पर उपचुनाव होने वाले है, जहॉ भाजपा अपनी पूरी ताकत से मैदानी तैयारी में जुट गयी है वही कांग्रेस कहीं न कहीं पिछडती दिखाई दे रही है।

भाजपा ने 24 सीटो पर विस्तारक नियुक्त कर दिये, कई जिलो के अध्यक्षों में बदलाव किया, स्थानीय असंतुष्ट नेताओं को मनाने का सिलसिला लगातार प्रदेशाध्याक्ष वीडी शर्मा एवं सुहास भगत द्वारा जारी है।

वही कांग्रेस के पास एक मात्र बडी उपलब्धि है जिसमें म.प्र. के प्रभारी दीपक बाबरिया की स्थान पर मुकुल वासनिक की ताजापोशी हुई, लेकिन सभी जानते है मध्यप्रदेश में कांग्रेस के प्रभारी का कितना महत्व रहता है। मध्यप्रदेश में कांग्रेस का इतिहास रहा है कि जो भी प्रभारी बनकर यहॉ आता है वो सिर्फ एक रबर स्टांप की तरह की कार्य करता है। मध्यप्रदेश से विदाई होने के बाद इन प्रभारियों का राजनैतिक भविष्य तक नही बचता है चाहे वो दीपक बाबरिया या मोहन प्रकाश।

कांग्रेस के पिछड़ना का बडा कारण यह भी है कि चंबल क्षेत्र के उनके सबसे मजबूत नेता ज्योतिरादित्या सिंधिया के भाजपा में चले जाने से वहॉ का स्थानीय संगठन भी कमजोर हो गया है, जो मजबूत स्थानीय कांग्रेस नेता थे वो इस्तीफा दे चुके, बाकी नेताओं पर कांग्रेस भारोसा करने में झिझक रही है। चबंल क्षेत्र की अधिकांश विधानसभा क्षेत्रों में सिंधिया का प्रभाव रहा है ऐसे में न तो कांग्रेस के पास मजबूत स्थानीय उम्मीदवार है न ही संगठन को चलाने योग्य कुशल नेतृत्व। ऐसे में उपचुनाव में कांग्रेस की राह मुश्किल होती नजर आ रही हैं।

कांग्रेस के पास इन 24 विधानसभा सीट में से कुछ सीट पर मजबूत उम्मीदवार न होने के कारण बहुजन समाज पार्टी से आये हुए नेताओं पर भारोसा जताने के अलावा अन्य कोई विकल्प नही है। प्रश्नचिन्ह यह है कि जो प्रत्याशी विधानसभा चुनाव 2018 में बहुजन समाज पार्टी से करीब 30,000 वोट प्राप्त किये क्या वो ये सारा वोट बैंक कांग्रेस की ओर ला पायेगा ?

हालांकि भारतीय जनता पार्टी के लिए भी यह समय चुनौतीपूर्ण है जहॉ एक तरफ प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा का संगठन में युवा नेतृत्व की टीम का चयन जिसके कारण वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है वही दूसरी ओर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के मंत्रीमंडल में शामिल होने की आस लगाये बैठे कई वरिष्ठ विधायक असंतुष्ट नजर आ रहे है।

ऐसे में कांग्रेस बैकफुट पर रहकर कही न कही भाजपा के वरिष्ठ विधायक व नेताओं पर टिकटिकी लगाई बैठी है, कही ऐसा तो नही कि कांग्रेस विराधियों के ताकत को अपने साथ मिलाकर उनके खिलाफ लडने का मन मना चुकी है। कांग्रेस की तासीर रही है कि अंतिम समय पर पत्ते खोलने की चाहे वो टिकट बटवारा या संगठन में सुधार। खैर ये तो वक्त बतायेगा की कांग्रेस की चुप्पी मजबूरी या रणनीति का हिस्सा।

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