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‘सुप्रीम’ कौन…. संसद, सरकार या न्यायपालिका…?

Conflict Pillars of Democracy

भोपाल। अब एक बार फिर प्रजातंत्र के तीन स्तंभों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच अधिकारों व सर्वोच्चता को लेकर संघर्ष की स्थिति निर्मित हो रही है, जबकि हमारे संविधान ने इन तीनों स्तंभों को अलग-अलग अधिकार व सीमाएं तय कर रही है, किंतु आज इन तीनों स्तंभों में ‘‘सर्वोच्चता’’ की स्पर्द्धा चल रही है और सब एक दूसरे को अपने अधीन बता रहा है। जबकि संविधान ने स्पष्ट हिदायत दी है कि प्रजातंत्र के तीनों स्तंभ अपनी-अपनी सीमा में रहकर अपने दायित्वों का निर्वहन करें। Conflict Pillars of Democracy

प्रजातंत्र के स्तंभों में टकराव

इस वर्ष जबकि हमारा देश अपने संविधान का तिहत्तरवां स्थापना दिवस मनाने जा रहा था, उसके ठीक एक दिन पहले माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं के सामने सरकारी खर्च पर परोसे जा रहे लोक लुभावन नारों व वादों को लेकर चिंता व्यक्त की तथा केन्द्र व चुनाव आयोग से इस सम्बंध में जवाब तलब किया, वैसे देखा जाए तो न्यायपालिका व चुनाव आयोग दोनों की स्वतंत्र संगठन है, जिन पर केन्द्र सरकार या विधायिका का कोई नियंत्रण नहीं होता, किंतु सुप्रीम कोर्ट ने इस आम जनहित के मामले को स्वयं संज्ञान में लेते हुए केन्द्र व चुनाव आयोग को जवाब देने हेतु नोटिस जारी किए तथा एक महीनें में जवाब तलब किए है। अब चुनाव आयोग व केन्द्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय को इस नोटिस का क्या जवाब देते है? या देते भी है या नही यह तो भविष्य के गर्भ में है, फिलहाल तो केन्द्र व चुनाव आयोग यही तय करने में व्यस्त है कि इस नोटिस का जवाब देना ठीक रहेगा या नहीं?

वैसे पिछली कई बार केन्द्र पर यह आरोप लगाए जा चुके है कि वह अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए चुनाव आयोग को नियंत्रण में रखने का प्रयास करता रहा है, जिसका ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल का है, जहां वहां की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने केन्द्र सरकार पर चुनाव आयोग को नियंत्रण में रखने के गंभीर आरोप लगाए थे और इन आरोपों में कुछ अंशों तक सत्यता पाई भी गई थी, क्योंकि चुनाव आयोग ने वही किया जो केन्द्र चाहता था। अब यह संयोग था या वास्तविकता यह स्पष्ट नहीं हो पाया, किंतु इस गंभीर आरोप का देश का माकूल जवाब नही मिला यह सब जानते है।

अब ताजे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट के वे नोटिस सामने आये है, जिनमें केन्द्र व चुनाव आयोग से पूछा गया है कि चुनाव प्रचार के दौरान करीब-करीब सभी राजनीतिक दल सरकारी खर्च पर चुनावी वादे करते है और मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास करते है, उसके लिए चुनाव आयोग की केन्द्र सरकार क्या कदम उठाने जा रही है? और इस अहम सवाल के जवाब में केन्द्र व चुनाव आयोग दोनों मौन इसलिए है क्योंकि चुनाव आयोग पर केन्द्र का दबदवा है और केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ही सुप्रीम कोर्ट के सवाल का सबसे अहम सबब है, उत्तरप्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान जो कुछ चल रहा है, भाजपा व सपा दोनों ही जिस तरह के सरकारी खर्च वाले चुनावी वादे लिखित रूप से मतदाताओं के सामने परोस रहे हैं उन्हीं को लेकर यह अहम सवाल उठाया गया है, अब ऐसी स्थिति में केन्द्र व चुनाव आयोग क्या जवाब दे?

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Deputation vote of states

किंतु यह सही है कि सुप्रीम कोर्ट ऐसे सवाल उठाकर अपने प्रति समर्थन जुटाने में अहम भूमिका निभा रही है। और…. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को भारत का आम देशवासी अपना सबसे बड़ हित चिंतक मानने लगा है अब इसी कारण देश के आम मतदाता का न तो विधायिका (सरकार-संसद) पर भरोसा रहा और न ही कार्यपालिका पर, क्योंकि कार्यपालिका तो शुद्ध रूप से केन्द्र के ही अधीन है, वह वही करती आई है, जो केन्द्र सरकार चाहती है, और केन्द्र के निर्देशों को मूर्तरूप देने में इसी अंग की अहम भूमिका भी है।

अब केन्द्र सरकार या विधायिका (संसद) की अधिकार लिप्सा इतनी अधिक बढ़ती जा रही है कि वह चुनाव आयोग जैसे स्वतंत्र संगठनों पर कब्जे के बाद देश की न्यायपालिका को भी अपने कब्जे में करना चाहता है, जिससे पूरे देश व स्वतंत्रता के तीनों प्रमुख अंगों पर उसका कब्जा रहे और वह निरंतर ‘‘एकतंत्र’’ की घातक रास्ते की ओर बढ़ता रहे? केन्द्र के इसी मंसूबे से चिंतित सुप्रीम कोर्ट ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इस तरह की चिंता व्यक्त कर अपनी आशंकाओं का केन्द्र व चुनाव आयोग से जवाब मांगा? साथ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने यह भी जोड़ा कि यह गंभीर मुद्दा है और ज्यादा चुनावी वादे करने वाले दल फायदे में रहते है और सभी को समान स्तर पर चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिल पा रहा है।

आज देश में एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट केन्द्र व चुनाव आयोग के इस तालमेल से चिंतित है, वहीं दूसरी ओर देश में कानून व संविधान विशेषज्ञों द्वारा यह सवाल उठाया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर संसद में विचार-परिचर्चा व वाद-विवदा हो सकती है या नहीं? संविधान विशेषज्ञ उल्हास बापट ने यह सवाल उठाया है उनका कहना है कि भारत का संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान है, इसमें समय के अनुरूप जनहित में संशोधन करने की अनुमति भी है, इसके सामने देश के सभी नागरिक समान है और सभी को समान अधिकार भी प्राप्त है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी कुछ प्रतिबंधों के साथ प्राप्त है।

सुप्रीम कोर्ट की प्रासंगिकता का उदाहरण देते हुए बापट का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की सेक्शन-377 (होमोसेक्स्यूलिटी) के प्रावधानों को गैर संवैधानिक करार दिया है इसके बावजूद आईपीसी में अब तक कोई बदलाव नहीं किया गया है, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर विचार करते हुए संसद को कानून में बदलाव करना चाहिये, लेकिन आज तक कोई संशोधन नहीं हुआ है, बापट का कहना है कि यही एक नहीं ऐसे सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसले है जिन पर संसद को विचार कर संविधान में जरूरी संशोधन करने चाहिये थे, जो अब तक नहीं किये गए। इसी प्रकार केन्द्र सरकार को ‘‘यूनिफार्म सिविल कोड’’ की ओर बढ़ना चाहिये था, किंतु यह मामला अभी भी सिर्व व सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित है?

यहाँ एक सवाल आरक्षण के बढ़ते प्रतिशत की ओर भी उठाया जा रहा है केन्द्र सरकार अपनी दलीय राजनीति के तहत् आरक्षण का प्रतिशत दिनोंदिन बढ़ाये जा रही है, जबकि देश के कानूनविदों की राय है कि देश में आरक्षण पचास फीसदी से अधिक कतई नहीं होना चाहिए। इस प्रकार कुल मिलाकर कई ऐसे विवादित मामले है जिन पर प्रजातंत्र के तीनों अंग विशेषकर विधायिका व न्यायपालिका मिल बैठकर फैसला ले सकते है, किंतु ऐसा हो नही पा रहा है और सभी ‘सुप्रीमैसी’ के अंग बने हुए है? क्या यह देशहित में है? सभी को मिल बैठकर इस पर गंभीर चिंतन करना चाहिये।

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