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बागियों की बगावत के इंतज़ार में कांग्रेस

इन उपचुनाव में कांग्रेस को एक तरफ सिंधिया परिवार से सीधे लड़ाई लड़ना है वहीं दूसरी ओर परंपरागत विरोधी दल भाजपा के वोट बैंक को कमजोर करने जातिगत समीकरणों का गणित बैठाना होगा जो बहुत आसान काम नहीं । दरसअल इस अंचल के क्षेत्रीय नेतृत्व की बात करें तो यहां कांग्रेस के पास फ्रंट फेस लहार विधायक डॉ गोविंद सिंह के इर्दगिर्द ही पूरी पार्टी घूम रही है।

गोविंद सिंह के अलावा सिंधिया के कभी खासमखास रहे अशोक सिंह,युवा विधायक प्रवीण पाठक,प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत,पिछोर विधायक केपी सिंह,पूर्व मंत्री लाखन सिंह ही हैं जिनके बलबूते कमलनाथ और दिग्विजयसिंह को उस भाजपा को ढहाना है। जहां केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, ग्रह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, पूर्व सांसद माया सिंह,पूर्व सांसद प्रभात झा, जयभान पवैया, पूर्व मंत्री यशोधरा राजे, जैसे कद्दावर, दिग्गज नेता पहले से ही मौजूद हैं और अब वे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी भाजपा के मजबूत स्तंभ हैं।

कांग्रेस के पास अब ज्यादा विकल्प वैसे भी नहीं हैं इसलिए पार्टी का भरोसा कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पर ही टिका है। ये दोनों बड़े नेता भी अंचल के कांग्रेसियों को व्यक्तिगत फोन से संपर्क कर विधानसभा क्षेत्रों की जानकारी ले रहे हैं और पार्टी को मजबूती देने पुराने कांग्रेसियों से व्यक्तिगत संपर्क साधने की कोशिश भी कर रहे हैं। इस अंचल से कमलनाथ का जमीनी तौर पर कोई लगाव नहीं है और वो सवा साल तक सीएम रहे लेकिन फिर भी यहां के लोगों के बीच कभी नहीं गए। दिग्विजय सिंह भी अंचल में खासे लोकप्रिय कभी नहीं रहे.एक समय था जब उनका उनका दम-खम चलता था लेकिन अब वो भी उस तरह से नहीं रहा.कांग्रेस की उम्मीद की किरण सिर्फ उम्मीदवार चयन और भाजपा की फूट पर टिकी है जो कुछ कमाल कर सकती है।

कांग्रेस ने उपचुनाव की रणनीति बनाना शुरू कर दी है और सटीक मुद्दों के साथ अभी भी पार्टी को भाजपा के सामने मजबूत उम्मीदवार की तलाश है। अंचल में कांग्रेसियों द्वारा सिंधिया को गद्दार और उनके समर्थन में इस्तीफा देकर भाजपा में पहुंचे विधायकों को बिकाऊ बोलने पर जनता की कोई खासी प्रतिक्रिया नज़र नहीं आ रही हालांकि इससे उलट ज्यादातर लोग सिंधिया के निर्णय को सही बताते हुए कांग्रेस में उन्हें सम्मान न मिलने की दलील जरूर दे रहे हैं.कांग्रेस के राजघराने सहित बागी मंत्री-विधायकों को लेकर किए जा रहे दुष्प्रचार का तोड़ भाजपा पहले ही निकाल चुकी है,भाजपा सभी बागियों को बलिदानी और लोकतंत्र का सजग प्रहरी बताकर उनके साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। इस संभावना से इनकार नहीँ किया जा सकता कि भाजपा अपनों को मनाने,समझाइश देने के बाद उन सभी 22 बागियों को टिकट देगी और उनका साथ भी जिन्होंने प्रदेश में उनकी सरकार बनवाने अपनी विधायकी का बलिदान दिया।

मंत्रिमंडल और असंतुष्टों पर कांग्रेस की नज़र
ग्वालियर अंचल में मजबूत उम्मीदवारों की तलाश में जुटी कांग्रेस की उम्मीदें हाल ही होने वाले शिवराज मंत्रिमंडल विस्तार से हैं और उसे इस विस्तार से अपना रास्ता निकलने की आस भी है.कांग्रेसियों को उम्मीद है कि शिवराज मंत्रिमंडल में भाजपा ज्यादातर सिंधिया समर्थकों को एडजस्ट नहीं कर पाएगी और कांग्रेस उन्हीं की नाराज़गी का फायदा उठाकर अपना उल्लू सीधा करने वाली कहावत को चरितार्थ करने की दिशा में आगे चलेगी।

हालांकि कांग्रेस की ये रणनीति भाजपा और सिंधिया दोनों बखूबी समझ रहे हैं और वे ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते जिससे अंचल में बिखरी पड़ी कांग्रेस को संजीवनी मिले.मंत्रिमंडल विस्तार से पहले ही भाजपा अपने किले को मजबूत कर चल रही है और उसके लिए संगठन स्तर पर सभी वरिष्ठों को कांग्रेस से भाजपा में पहुंचे नए साथियों के साथ पुराने भाजपाइयों का शीघ्र सामंजस्य बनवाए जाने की जवाबदेही तय कर दी गई है.सिंधिया ने भी अपने सभी विधायकों कार्यकर्ताओं के अनर्गल बयानबाजी पर लगाम लगाने की हिदायत देकर अपने अपने क्षेत्र के मजबूत कांग्रेस नेताओं को भाजपा में लाने की जिम्मेदारी दे रखी है। शिवराज के कैबिनेट मंत्री तुलसी सिलावट ने तो अपनी विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेसी नेताओं को भाजपा की सदस्यता दिलवाना ही शुरू कर दी और अब धीरे धीरे इस कार्य में सभी पूर्व मंत्री और सिंधिया समर्थक जुटकर कांग्रेस को डैमेज करने का काम कर रहे हैं।

पिटे मोहरों पर बड़ा दांव लगाने की तैयारी
बीजेपी के पास फिलहाल पॉजिटिव-निगेटिव सर्वे के बावजूद सभी सीटों पर तय उम्मीदवार हैं अंचल की एक विस सीट जौरा है जो विधायक बनवारीलाल शर्मा के असमय निधन के बाद रिक्त हुई है। शर्मा का जुड़ाव भी महाराज से रहा इसलिए भाजपा यहां प्रत्याशी किसे उतारेगी अभी तय नहीं है.ग्वालियर पूर्व, मुरैना, अंबाह, भांडेर, अशोकनगर, डबरा, सांची, सांवेर, पोहरी, बमोरी, मेहगांव, गोहद, दिमनी, करैरा, सुरखी, सुवासरा, ग्वालियर, मुगावली, बदनावर, अनूपपुर, सुमावली, हाटपिप्ल्या, आगर और जौरा सीट पर उपचुनाव होना है. कांग्रेस को फिर से सरकार बनाने के लिए इन उपचुनावों में जीत ही आखिरी सहारा है।

कांग्रेस के पास अभी 92 सीटें हैं और पूर्ण बहुमत के लिए 116 का आंकड़5ा चाहिए.इसके लिए कांग्रेस को सभी 24 सीटों पर उपचुनाव जीतना होगा जबकि भाजपा को 10 सीटों पर जीत से पूर्ण बहुमत मिल जाएगा.दूसरा समीकरण ये है कि यदि कांग्रेस चार निर्दलीय,दो बसपा और एक सपा को मिला ले तो उसकी संख्या 99 पर पहुंचती है.इस हिसाब से कांग्रेस को जीत के लिए 17 सीटें और चाहिए.जिन चेहरों पर कांग्रेस दांव लगाने की तैयारी में है वो या तो चर्चित नहीं रहे या फिर कांग्रेस के पुराने मोहरे हैं.ग्वालियर विधानसभा से सुनील शर्मा का नाम सबसे पहले लिया जा रहा है.ये दिग्विजय के नजदीकी बताए जाते हैं। अशोक सिंह का नाम ग्वालियर पूर्व विधानसभा क्षेत्र के लिए चर्चाओं में हैं।

अशोक सिंह कमलनाथ के भी नजदीकी हैं और कई बार लोकसभा का चुनाव हार चुके हैं.डबरा विधानसभा सीट पर ले देकर कांग्रेस के सत्यप्रकाश परसेड़िया,वृंदावन कोरी का नाम है.कांग्रेस पोहरी विधानसभा क्षेत्र से पूर्व मंत्री और कार्यकारी अध्यक्ष रामनिवास रावत,हरिबल्लभ शुक्ला के नाम सामने हैं.मुरैना विधानसभा से दिनेश गुर्जर,राकेश मावई का नाम सामने आ रहा है.दिमनी व अंबाह में रविंद्र सिंह व सत्पप्रकाश सखवार का नाम सामने है।

गोहद के लिए फ़िलहाल रामनारायण हिन्डोलिया के अलावा कोई दूसरा नाम नहीं दिखाई दे रहा.इसके अलावा कांग्रेस को भाजपा के फिलहाल तय उम्मीदवारों के सामने प्रत्याशियों की ही दरकार दिख रही है जिसकी तलाश कांग्रेस को भाजपा सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के बाद पूरी होने की उम्मीद है.इन पुराने चेहरों और पिटे मोहरों के सहारे कांग्रेस कितनी कारगर रणनीति बनाती या उसके पास भाजपा और सिंधिया को शिकस्त देने कोई नया पैंतरा है ये समय रहते ही सामने आएगा.अब यहां बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वो अपने उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं के बीच सही तालमेल बिठा डैमेज कंट्रोल करे और कांग्रेस के खाली हाथों में कोई ऐसा अवसर न दे बैठे जिससे बाद में उसे समस्या हो.क्योंकि इन क्षेत्रों में काम कर रहे नेता और कार्यकर्ताओं की बीजेपी को उतनी ही जरूरत है जितना कि उसके उम्मीदवारों का जीतना।
सिंधिया की एंट्री अभी बाकी है
जब से महाराज यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा का दामन थामा है तभी से वे अपने क्षेत्र ग्वालियर नहीं गए हैं फिर भी अंचल के करीब 70 से ज्यादा बजनदार कांग्रेसियों और ने इस्तीफा देकर महाराज के साथ अपनी आस्थाएं पहले ही जाता दी.भाजपाइयों का कहना है कि दिग्विजय सिंह गुट के कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो अंचल के ज्यादातर कांग्रेसी महाराज से व्यक्तिगत स्नेह रखते हैं और जब भी महाराज ग्वालियर आएंगे उनका गर्मजोशी से स्वागत करने सभी कांग्रेसी महाराज के साथ मंच पर खड़े नजर आएंगे।

जिन जिलों-ग्वालियर, भिंड, मुरैना, दतिया, शिवपुरी, अशोकनगर और गुना में उपचुनाव होना है वहां चुनाव तक कांग्रेस नहीं दिखाई देगी क्योंकि महाराज की एंट्री अभी बाकी है। लॉकडाउन होने की बजह से अभी सिंधिया ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र में नहीं ज रहे हैं.भाजपा और सिंधिया समर्थक क्षेत्र में महाराज की जोरदार अगुआई की भूमिका बनाने में जुटे हैं। जैसे ही माहौल सही होगा महाराज की धमाकेदार एंट्री इस क्षेत्र में कराकर उन कांग्रेसियों को भी महाराज के मंच पर लाने की योजना है जो अभी बे मन से कांग्रेस में हैं और कांग्रेसी उन्हें शंका की नज़र से देख रहे हैं । इस बात से अंचल के कांग्रेसी इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते कि ऐसा कुछ होने वाला है बल्कि उनका कहना उलट है कि थोड़े दिन बाद ही महाराज और उनके बागी सिपहसालारों को कांग्रेस ही सहारा बनेगी.इन बातों में कितनी सच्चाई है ये समय के गर्त में है। फिलहाल तो अंचल की कांग्रेस को अब भाजपा की फूटन और ग्वालियर महल की दरारों से ही अपना रास्ता नज़र आने की उम्मीद है।

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