nayaindia Congress party rahul gandhi राहुल में भी भर रहा संशय!
kishori-yojna
गेस्ट कॉलम| नया इंडिया| Congress party rahul gandhi राहुल में भी भर रहा संशय!

राहुल में भी भर रहा संशय!

Congress party rahul gandhi

राहुल को यह समझना चाहिए की खेल के नियम, प्रवृति वे नहीं बदल सकते हैं। इसी में जीना है, डूबना है, निकलना है। सत्ता अपने लिए नहीं अपने विचारों को मूर्त रूप देने के लिए चाहिए। बिना सत्ता के आदर्श और सिद्धांत केवल मन बहलाव हैं। अब समय इनकी विवेचना का नहीं इन्हें लागू करने की स्थितियां बनाने का है। दुविधा का नहीं आगे बढ़कर नेतृत्व संभालने का है। Congress party rahul gandhi

सही बात है। हिम्मत हार चुकी, हताश फौज का नेतृत्व करने की इच्छा किस में होगी! उत्साह तो बड़ी बात है। राहुल गांधी जब यह कहते हैं कि उनका सत्ता में इंटरेस्ट बिल्कुल पैदा नहीं होता तो सच कहते हैं। आठ साल से कांग्रेस बैरकों में पड़ी हुई है। खाई पी हुई। वह लड़ना क्या सुबह की कवायद भी भूल चुकी है। पेंशन प्राप्त सीनियर सिटीजन की तरह जिसे रोटी पानी की कोई कमी नहीं है। कोई जिम्मेदारी नहीं है। है तो बस केवल खुद को सुरक्षित, सेफ जोन में बनाए रखना और अपने ही घर के लोगों की निंदा, आलोचना करते रहना।

राहुल अपनी लड़ाई अकेले लड़ते रहे। लेकिन एक स्थिति के बाद बैट्समेन को भी पता चल जाता है कि अकेले वह चाहे जितनी देर क्रीज पर दिख जाए, स्कोर बोर्ड पर रन भी आते रहें लेकिन अगर बाकी टीम 1980 से पहले की भारतीय टीम की तरह टाइम पास टाइप की है तो इनिंग खत्म होना ही है। मैच नहीं निकल सकता। गावस्कर अकेला बिचारा बहुत लड़ता रहा। बिना हेलमेट, आर्म गार्डस् के दुनिया के सर्वकालिक तेज और तूफानी बालरों का मुकाबला करता रहा। मगर बाकी खिलाड़ी एवरेज के 35 – 40 रन बनाकर खुश हो जाते थे। मैच का ड्रा होना हमारे लिए जीत होता था। आज कांग्रेस की राजनीति उसी 40 साल पुराने क्रिकेटीय मोड़ पर पहुंच गई है।

मगर उसी निराशा में उलझे रहना, अवसाद को आने देना कमजोर इंसान की फितरत हो सकती है, नेतृत्वकारी लोगों की नहीं। 1980 के बाद ही कपिलदेव आए और फिर 1983 का विश्वकप सबको याद है। वही टीम थी। घूमने इंग्लेंड गई थी। सेमीफाइनल से पहले के वापसी के टिकट करवा लिए गए थे। फाइनल लार्डस में होना था उस महान ग्राउंड की एंट्री के पास भी टीम को नहीं दिए गए थे कि जब वहां पहुंचना ही नहीं है तो पास किसलिए? मगर कप्तान कपिल देव में एक आग थी। जिसे उसने बुझने नहीं दिया। कपिल का कहना था कि वह भी तो इंसान ही हैं। फिर वे जीत सकते हैं तो हम क्यों नहीं? सिम्पल गांव का, हिन्दुस्तान के आगे बढ़ते युवा का तर्क। और इसी सहज बुद्धि ( कामन सेंस) ने कपिल को विश्व कप जितवा दिया।

Read also शरीफ से उम्मीद पालना जल्दबाजी होगी

राहुल का संशय कोई नया नहीं है। सबसे बड़ा भ्रम, दुविधा तो अर्जुन को हुई थी, बीच युद्ध में। वह तो गनीमत है कि राहुल ने 2019 के चुनाव के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया। कांग्रेसियों ने हालत तो चुनाव से पहले ही बना दिए थे कि राहुल अकेले पड़ते जा रहे रहे थे। मगर बिलाशक उन्होंने पूरी ताकत से कांग्रेस को चुनाव लड़वाया। लेकिन वही बात है कि गावस्कर की तरह अकेला बैट्समेन उत्साहहीन टीम के साथ कुछ नहीं कर सकता। 2014 में कांग्रेस ने इससे भी बुरी तरह निराश अवस्था में चुनाव लड़ा था। यूपीए सरकार में रहने वाले मंत्रियों ने खुद ही चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया था। पी चिदांबरम के मना करने से दक्षिण में और मनीष तिवारी के चुनाव लड़ने से इनकार करने से पूरे उत्तर भारत में हवा फैल गई थी कि कांग्रेस चुनाव हार रही है।

देश के 17 लोकसभा चुनावों में किसी कमजोर से कमजोर पार्टी ने भी ऐसा मरा गिरा चुनाव नहीं लड़ा होगा जैसे दस साल सत्ता में रहने के बाद 2014 में कांग्रेस ने लड़ा। अगर कांग्रेस थोड़ी सी हिम्मत से चुनाव लड़ लेती तो कम से कम सौ सीटे तो उसकी कहीं नहीं गईं थी। वह ऐसा चुनाव लड़ा था कि राहुल अमेठी से हार रहे थे। हम वहीं थे। मगर आखिरी मौके पर प्रियंका गांधी ने राहुल के साथ अमेठी लोकसभा क्षेत्र के सबसे बड़े कस्बे जायस में एक संयुक्त रोड शो निकालकर संभावित हार को टाल दिया था। उस जनसम्पर्क रैली को देखकर लोग कहने लगे थे कि नहीं राहुल, प्रियंका गंभीर हैं। नहीं तो उससे पहले पूरे देश की तरह वहां भी यह मैसेज पहुंच गया था कि कांग्रेस चुनावों को लेकर गंभीर ही नहीं है। (Congress party rahul gandhi)

2019 में वही हुआ, जो 2014 में टल गया था। राहुल अमेठी से हार गए। युद्ध और खेल की तरह चुनाव भी हौसले की चीज है। जनता निराश पार्टी, उम्मीदवार को नहीं चुनती। 2014 के राहुल के अमेठी चुनाव पर हमने बहुत लिखा था। जब जनता को लगा कि नहीं ये उत्साह के साथ हैं। जीत के लिए लड़ रहे हैं तो उसने कहा लो। हम आपके साथ हैं। वोट, समर्थन देते हैं। मगर 2019 में जब लगा कि नहीं वह चमक गायब ही है तो फिर उसने अपना मन बदल लिया। वह स्मृति ईरानी की जीत नहीं थी। राहुल की हार थी।

rahul gandhi priyanka gandhi

Congress party rahul gandhi

अब जब अगले लोकसभा चुनाव में दो साल बचे हैं और कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव अगले कुछ ही महीनों में होने वाला है तब क्या राहुल को संशय से घिरा रहना चाहिए? यह समय दुविधा मुक्त होने का है। कांग्रेस जैसी है, वैसी है। उसके नेता जैसे छल प्रपंची हैं, वैसे है। मगर देश के सामने उसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। अगर तीसरी बार भी मोदी सरकार आ गई तो देश में जो नाम मात्र की संस्थाएं बची हैं वह नाम के लिए भी बची रहेंगी? भारत विश्व गुरु बने। देश का भविष्य उज्जवल हो यह सब चाहते हैं। मगर आंखों के सामने उसे हिंसा, नफरत, विभाजन और गैर जवाबदेही के रास्ते पर जाता देखकर कौन कहेगा कि यह रास्ता विश्व गुरु बनने का है। असहिष्णुता ने देश के सामने बहुत बड़ा खतरा खड़ा कर  दिया है। हिन्दू मुसलमान करके मंहगाई, बेरोजगारी की भयानक समस्या से लोगों का ध्यान हटाया जा सकता है मगर देश को बचाया नहीं जा सकता। यह नफरत देश को कहां ले जा रही है यह शायद उसे फैलाने वाले नहीं समझ रहे।

राहुल को याद रखना चाहिए कि सोनिया गांधी आज 75 साल की उम्र में खराब स्वास्थ्य के बावजूद पार्टी अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। अभी सीडब्ल्यूसी की मीटिंग में पांच घंटे लगातार बैठी रहीं। अभी खत्म हुए लोकसभा के बजट सत्र में देर देर तक सदन में बैठी रहीं। कार्यवाही में हिस्सा लिया। उन्हें इतना सक्रिय इसीलिए होना पड़ा कि राहुल ने 2019 में अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। और लाख कोशिश करने के बाद, सोनिया, राहुल, प्रियंका के साफ कहने के बावजूद की परिवार के बाहर का अध्यक्ष चुनो कांग्रेस के नेता अध्यक्ष नहीं चुन पाए। और उनके अनुरोध पर ही सोनिया फिर अध्यक्ष बनीं। यह उनके साथ ज्यादती है। 2017 में अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद उन्होंने अपना सारा स्टाफ भी 10 जनपथ से कांग्रेस आफिस वापस पहुंचा दिया था। 20 साल तक बहुत मेहनत और सक्रियता से अध्यक्ष पद संभालने के बाद थोड़ा जिम्मेदारी मुक्त होकर रह रहीं थी। मगर उन्हें 2019 से फिर काम में जुटना पड़ा।

राहुल को यह भी याद रखना चाहिए कि सोनिया गांधी ने 1998 में इससे भी बुरी परिस्थितियों में कांग्रेस की जिम्मेदारी स्वीकार की थी। सोनिया भी उस समय अनिच्छुक थीं। दोनों बच्चे राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि सोनिया राजनीति में आएं। मगर कांग्रेस की डूबती नाव और कांग्रेसियों की चीख पुकार को सोनिया नजरअंदाज नहीं कर पाईं। यह अलग बात है कि उसका सिला कांग्रेसियों ने उन्हें क्या दिया। पहले राहुल को काम नहीं करने दिया। फिर 2019 में उन्हें बनाकर उनकी बीमारी की हालत में उन्हें पत्र लिखकर मनासिक संताप दिया गया।

लेकिन नेता को, उस नेता को जिसके दिल में पार्टी के लिए, अपने कार्यकर्ताओं के लिए, देश के लिए दर्द होता है यह सब सहना पड़ता है। पार्ट आफ द गेम। खेल का हिस्सा है। इसीलिए राहुल को यह समझना चाहिए की खेल के नियम, प्रवृति वे नहीं बदल सकते हैं। इसी में जीना है, डूबना है, निकलना है। सत्ता अपने लिए नहीं अपने विचारों को मूर्त रूप देने के लिए चाहिए। बिना सत्ता के आदर्श और सिद्धांत केवल मन बहलाव हैं। अब समय इनकी विवेचना का नहीं इन्हें लागू करने की स्थितियां बनाने का है। दुविधा का नहीं आगे बढ़कर नेतृत्व संभालने का है। Congress party rahul gandhi

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

fifteen − fourteen =

kishori-yojna
kishori-yojna
ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
Tripura Election 2023: भाजपा ने जारी की 48 उम्मीदवारों की लिस्ट, किसे कहां से मिला मौका?
Tripura Election 2023: भाजपा ने जारी की 48 उम्मीदवारों की लिस्ट, किसे कहां से मिला मौका?