राहुल पढ़े इंदिरा इतिहास, असंतुष्टों से निपटे

कांग्रेस के असंतुष्ट नेता बार-बार अपनी पार्टी का 50 साल पुराना इतिहास पढ़ रहे हैं। वे उस समय के दिग्गज असंतुष्टों की असफलता के कारण जानना चाहते हैं। इन्दिरा गांधी जिन्हें विपक्षी गुंगी गुड़िया कहते थे कैसे सफल हो गईं? मोरारजी देसाई, निर्जलिंगप्पा, एस के पाटिल, संजीवा रेड्डी जैसे घुटे हुए नेताओं को पराजय का सामना क्यों करना पड़ा?

अपनी नाराजगियों का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने वाले 23 पत्र लेखक उन नेताओं की गति को प्राप्त नहीं होना चाहते। इसलिए जब तक वे इंदिरा गांधी की जीत और उन असंतुष्ट नेताओं की हार के कारण ठीक से नहीं समझ पाते तब तक उन्होंने संघर्ष विराम का फैसला लिया है। वे थोड़ा समय चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने पार्टी में लोकतंत्र, पूर्णकालिक अध्यक्ष जैसी अपनी अमूर्त (एब्स्टर्ड) मांगों को छोड़कर सम्मान मिलना चाहिए जैसी चलताऊ, स्टिरियो टाइप बातें करना शुरू कर दिया हैं।

राजनीति में सम्मान के बारे में पहले भी बहुत लिखा गया। आगे भी बहुत लिखा जाएगा। यह भी सापेक्ष (सब्जेक्टिव) चीज है। जब कुर्सी मिलती है तो लगता है बड़े सम्मान के साथ दी। मगर जब जाती है तो कहते हैं अपमानित करके हटाया। खैर यह एक मानसिक अवस्था है। या यह भी कहें कि एक राजनीतिक हथियार है!

जो भी हो फिलहाल इसके लिए एक बहुत ही उपयुक्त उदाहरण ज्योतिरादित्य सिंधिया का है। वे जो कांग्रेस के हर बड़े नेता के साथ बराबरी से बैठते थे। सोनिया गांधी, राहुल, प्रियंका से चाहे जब मिल सकते थे। साथ में चलते थे। उन्हें भी शिकायत हो गई थी कि सम्मान में कमी है। यह कहना तो नहीं चाहिए मगर उन्हें कांग्रेस में अपने पिता माधवराव सिंधिया से ज्यादा सम्मान मिला। इसका कारण था। ज्योतिरादित्य को पिता की असामयिक मृत्यु की वजह से सबकी सहानुभूति भी प्राप्त थी। जो सम्मान के साथ ही जुड़ गई थी।

दूसरा एक कारण समय का भी है। माधवराव के समय कांग्रेस में बड़े बड़े दिग्गज नेता थे। राजीव गांधी के साथ, पीवी नरसिम्हा राव, बूटा सिंह, वीपी सिंह, एनडी तिवारी, अरुण नेहरु,, बंसीलाल, केसी पंत, वीएन गाडगिल, भजन लाल, वंसत साठे, दिनेश सिंह, माखन लाल फोतेदार, अर्जुन सिंह, गनी खान चौधरी, मुफ्ती मोहम्मद सईद, रामनिवास मिर्धा कितने नाम हैं जो एक से बढ़कर एक नेता थे। उनके बीच माघवराव ने अपनी जगह बनाई। लेकिन ज्योतिरादित्य को तो सहानुभूति की वजह से पहले दिन से ही सबका साथ और स्नेह मिला।

बावजूद  वे सम्मान के नाम पर पार्टी छोड़कर चले गए। और जहां गए वहां के नेता इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि बाहर से आए किस नेता को कितना सम्मान देना है! कांग्रेस में टाप नेतृत्व देता था मगर भाजपा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और खुद ग्वालियर का प्रतिनिधित्व करने वाले केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर उनको कितना देते हैं यह अब किसी को बताने की जरूरत नहीं है। तो यह सम्मान आपकी उपयोगिता पर निर्भर करता है। कभी जिन आडवानी से मिलने के लिए भाजपा के बड़े बड़े नेता उनके पीए दीपक चोपड़ा के पास बैठे रहते थे आज वही आडवानी अकेले बैठे पूछते रहते होंगे कि कोई मुलाकाती है क्या?

आज अगर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उन लोगों को बुलाकर उनकी बात सुन रही हैं, जिन्होंने उनके अस्पताल में भर्ती रहने के दरम्यान एक गुट बनाकर शिकायती चिट्ठी लिखी तो इससे बढ़कर सम्मान और महत्व देना और क्या हो सकता है? कांग्रेस नेतृत्व की तुलना में बार बार भाजपा नेतृत्व की बात करने वालों को भी यहां देख लेना चाहिए कि अगर भाजपा का कोई नेता प्रधानमंत्री मोदी या अमित शाह को ऐसी चिट्ठी लिखता तो क्या होता?  और अगर एक ग्रुप में लिखते तो और सोच सकते हैं कि क्या होता कैसे होता?

राहुल गांधी ने मीटिंग में कहा कि सम्मान में कोई कमी नहीं है। और यह सही है कि राहुल , प्रियंका और सोनिया ने किसी के सम्मान में कभी कोई कमी नहीं रखी है। लेकिन कुछ लोग काबिल तो बहुत बनते हैं मगर व्यक्ति व्यक्ति में फर्क समझने को तैयार नहीं होते। हर आदमी का अपना तरीका है। उसका स्वभाव है। एक वाकिया बताते हैं। कम ही लोगों को पता होगा। अपने दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलूवालिया को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे। उन्होंने आहलूवालिया को राहुल से मिलने उनके तुगलक लेन आवास पर पहुंचाया। जैसे ही राहुल को खबर मिली राहुल बाहर आए और आहलूवालिया से बोले आईए घूमते हुए बात करते हैं। राहुल उनके साथ लान में घूमते हुए काफी देर तक बात करते रहे।

इसमें कोई बुराई नहीं है। सम्मान न देने की भी कोई बात नहीं है। घूमते हुए बात करना खुद गुलामनबी आजाद की भी आदत है। आजाद कांग्रेस मुख्यालय से लेकर अपने आवास के लान तक में घूमते हुए बात करते हैं। लेकिन अगर राहुल ऐसा करते हैं तो लोगों को शिकायत होने लगती है। क्यों? क्योंकि राहुल को अभी वे शक्ति केन्द्र मानने को तैयार नहीं है। उन्हें लगता है कि राहुल अगर पूरी तरह पावर में आ गए तो उनके उस तरह कहे में नहीं रहेंगे जैसे सोनिया रहती थीं।

सोनिया असंतुष्ट नेताओं से दुःखी थीं। जिन्हें सरकार से लेकर संगठन तक में  सब कुछ दिया वे पार्टी के सबसे कठिन समय में साथ खड़े होने के बदले छिद्रान्वेष में लग गए! लेकिन सोनिया ने अपने व्यक्तिगत दुःख को छुपाया और पार्टी हित में उन लोगों को बात करने के लिए बुलाया जिनके पास कहने के लिए सिवाय इसके कुछ नहीं था कि हमारी राज्यसभा, राज्यसभा का नेता और उपनेता पद बरकरार रहे। सोनिया गांधी 20 साल से ऐसे ही सबके हितों का ख्याल रखे हुए हैं। लेकिन राहुल क्या इस बोझ को उठाएंगे? क्या वे नेताओं को मनमानी करने की छूट देंगे?  यही वे चिंताएं हैं जिनकी वजह से कांग्रेस के कुछ नेता दबाव की राजनीति कर रहे हैं। सोनिया कोमल ह्रदय होने के साथ एक महिला की तरह परिवार को बांधे रखने में यकीन करती हैं। लेकिन क्या राहुल लंबे समय तक इस भूलो और माफ करो कि उदार नीति को जारी रख पाएंगे? मिटिंग में राहुल ने सीनियर नेताओं के सम्मान की बात करने के साथ यह भी कहा कि हमारी कांग्रेस सरकारों को चलाता कौन है? क्या संघ के लोग हमारे मुख्यमंत्रियों को प्रभावित करते हैं?

यही वह फर्क है जिसे लेकर असंतुष्ट नेता घबराए हुए हैं। इसीलिए फिलहाल उन्होंने संघर्ष विराम करने का फैसला किया है। इन्दिरा गांधी से टकराने वाले 50 साल पुराने नेताओं ने संघर्ष विराम नहीं किया था। वे लगातार इन्दिरा के फैसलों का विरोध करते रहे। बैंकों का राष्ट्रीयकरण, राजाओं के विशेषाधिकार खत्म करने, राष्ट्रपति का चुनाव हर मामले में उस समय के वरिष्ठ नेताओं जिन्हें सिंडिकेट कहा जाता था को मुंह की खानी पड़ी। क्योंकि इन्दिरा के प्रगतिशील फैसलों के साथ कार्यकर्ता और जनता मजबूती से खड़े हो गए थे। राहुल के पास कोई सत्ता नहीं है। विपक्ष में रहते हुए वे जितनी जोरदार आवाज उठा सकते हैं उठा रहे हैं। यहीं कांग्रेस के कुछ नेताओं का सहयोग उन्हें नहीं मिल रहा है। और यह आज से नहीं है। 2014 से है।

कांग्रेस के हारते ही कुछ वरिष्ठ नेता कहने लगे थे कि मोदी की जीत भारतीयता की जीत है। और नई सरकार का विरोध नहीं किया जाना चाहिए। राहुल ने बात मान ली और अध्यक्ष बनने से इनकार कर दिया। तीन साल और नहीं बने। लेकिन 2017 में बनने के बाद उन्होंने मोदी सरकार के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चा खोल दिया।  लेकिन जैसा कि 2019 में इस्तीफा देते हुए उन्होंने खुद कहा कि उन्हें पार्टी के लोगों का ही समर्थन नहीं मिला।

और यही वह मुकाम है जहां राहुल को भी कांग्रेस का 50 साल पुराना इतिहास पढ़ना चाहिए! और समझना चाहिए इंदिरा गांधी की सफलता की मूल वजह क्या थी? और वह थी खुद पर और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर अगाध विश्वास। 1969 में प्रधानमंत्री रहते हुए कांग्रेस उन्हें पार्टी से निकाल रही थी। अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने इंदिरा समर्थक फखरुद्दीन अली अहमद और सुब्रमण्यम को कांग्रेस की सर्वोच्च नीति निर्धारक इकाई सीडब्ल्यूसी से निकाल दिया। लेकिन इंदिरा ने जोरदार पटलवार करते हुए मुंबई के कांग्रेस अधिवेशन में निजलिंगप्पा को ही अध्यक्ष पद से हटाकर जगजीवन राम को नया अध्यक्ष बना दिया। पार्टी टूट गई मगर इंदिरा गांधी की प्रगतिशील नीतियां जीत गईं। यही50 साल पुराने कांग्रेस इतिहास का सबक है। जिसे राहुल को पढ़ना चाहिए।

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