कांग्रेस को सलाहवीर नहीं संघर्षवीर चाहिए

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने माफ करो और भूल जाओ की अपनी उदारता के चलते राष्ट्रीय सुरक्षा पर बनाई एक महत्वपूर्ण नई कमेटी में गुलामनबी आजाद को मनोनीत किया है। पर दो दिन भी नहीं हुए कि आजाद ने फिर मीडिया के माध्यम से कांग्रेस पर हमला बोल दिया। आश्चर्यजनक है कि इस बार उनका निशाना काफी जूनियर नेताओं पर है। आजाद ने संगठन चुनाव की तो बात की जो वे पहले भी कुछ नेताओं के साथ मिलकर लिखी चिट्ठी में कर चुके हैं मगर इस बार उन्होंने एक नया शिगुफा फाइव स्टार कल्चर का छेड़ा है।

बिहार चुनाव के बाद दिए इस इंटरव्यू में वे कांग्रेस पर पांच सितारा होटल कल्चर में लिप्त होने का हास्यास्पद आरोप लगा रहे हैं। जबकि मजेदार बात है कि बिहार में तो अभी तक कोई फाइव स्टार होटल ही नहीं है। और बिहारी कल्चर इतना मजबूत है कि यहां कोई दूसरा कल्चर पनप ही नहीं सकता है। पटना में ले देकर दो तीन ही ठीक ठाक होटल हैं। इनमें से एक तो चुनाव से पहले ही बीजेपी ने पूरा बुक करा लिया था। बाकी दो होटलों में भी जिन नेताओं के रूकने का आजाद आरोप लगा रहे हैं वे वहां रूके ही नहीं। ज्यादातर नेता दोस्तों के घरों में रुके। लगता है कुछ नई जानकारी देने के नाम पर किसी ने आजाद को हवाई कहानियां सुना दीं। बिहार में कांग्रेस की कम सीटें जीतने के कई कारण हो सकते हैं मगर नेताओं के कथित फाइव स्टार में रूकने से कांग्रेस हारी यह आरोप तो बेहद हल्के स्तर का हो गया।खैर, जिस फाइव स्टार कल्चर की आजाद को याद आई तो वह या तो शुरू से कांग्रेस में रही है तब से जब आजाद यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष थे या फिर वह है ही नहीं! ऐसा नहीं हो सकता कि वह आपके समय नहीं रही हो और आज जब वह अपने सबसे कमजोर टाइम में चल रही हो तो अचानक उसका उदय हो जाए।

यहां सिर्फ याद दिलाने के लिए कैटल क्लास का जिक्र कर रहा हूं कि इसे कहने वाले शशि थरूर भी गुलाम नबी आजाद के साथ 23 पत्र लेखकों में शामिल थे। सोनिया गांधी या राहुल पर आप चाहे जितने आरोप लगा लो मगर प्रदर्शन प्रियता का आरोप शायद कोई विरोधी भी न लगा पाए। सादगी और सभ्यता इस परिवार के जीवनसंस्कारों में है। तो यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी के कहने से यूपीए सरकार ने अपने मंत्रियों से सादगी बरतने को कहा था। फाइव स्टार होटलों और हवाई जहाज के बिजनेस क्लास से दूर रहने को कहा था। तब सरकार में मंत्री थरूर ने व्यंग्य किया था कि क्या अब उन्हें ‘ कैटल क्लास ‘ (जानवरों का तरह) में चलना पड़ेगा? और जनता क्लास के लिए कैटल क्लास उपयोग करने की सज़ा थरूर को मिली थी। उनका मंत्री पद छीन लिया गया था।

सवाल है कि राहुल गांधी पर अप्रत्यक्ष हमला करने वालों में से क्या किसी कांग्रेसी ने उनके 16 साल की राजनीतिक यात्रा को नजदीक से देखा है?  शुरूआती दौर में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ आंदोलन करते हुए राहुल मई जून की तपती हुई दोपहरी में 46- 47 डिग्री तापमानमें  झांसी की सड़कों पर धरना देकर बैठ गए थे। आलोचना करने के लिए बहुत सारे पाइंट हो सकते हैं मगर राहुल के सड़कों के संघर्ष को भट्ठा पारसौल से लेकर अभी हाल में हाथरस जाते हुए पुलिस के गिरा देने तक के एक से बढ़कर एक कई उदाहरण हैं। लेकिन अफसोस कांग्रेस पर जमीन से कट जाने के आरोप लगाने वालों के पास अपनी चार दशक से ज्यादा की राजनीति में ऐसा सड़क पर उतरने का एक भी उदाहरण नहीं होगा।

एक बहुत मशहूर शेर का मिसरा (एक पंक्ति) है- “ बुत हमसे कहें काफिर! “ कांग्रेस के विघ्नसंतोषियों पर यह पूरी तरह फिट होता है। कुछ बातें बताना अच्छी नहीं लगतीं। मगर समय कभी ऐसा भी होता है कि कहना पड़ती हैं। तो नेशनल हेराल्ड मामले में 5 साल पहले जब सोनिया गांधी, राहुल को अदालत से जमानत करवाना पड़ी तो आजाद ने कहा कि वे पहली बार अदालत में गए। चार दशक से ज्यादा समय से राजनीति करने वाले किसी नेता को इस बीच पुलिस मुकदमों और अदालत से वास्ता न पड़ा हो तो उसके सफर को क्या कहना चाहिए? जमीनी संघर्ष या फाइव स्टार कम्फर्ट?

सत्तर के दशक में जम्मू कश्मीर के तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद सईद के साथ  आजाद इंदिरा गांधी के पास आए थे। उसके बाद उन्होंने तरक्की की जो सीढ़ियां चढ़ी वैसी राजनीति में कम लोगों को नसीब हुई हैं। कांग्रेस की हर सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया। कम लोगों को यह बात पता होगी कि अपने गृह राज्य जम्मू कश्मीर से वे बहुत देर बाद 1996- 97 में संसद पहुंचे।

तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने उन्हें राज्यसभा सीट दी। इससे पहले कांग्रेस नेतृत्व उन्हें दूसरे राज्यों से संसद पहुंचाता रहा। यह राजनीति का सामान्य चलन है। मगर आज अचानक जब कांग्रेस अपने सबसे खराब दिनों में है तो नेतृत्व के साथ जुटकर काम करने के बदले उसे उपदेश दिए जा रहे हैं।  आदर्शवाद की उच्चतम राजनीति करने की सलाहें दी जा रही हैं।

यह वैसा ही है कि जब परेशानी में मददगार की जरूरत हो और आपसे सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाले सलाहकार बन जाएं!  सबसे दुखद यह है कि इन सलाहों में कोई ईमानदारी नहीं है। आश्चर्यजनक है कि आज जो लोग कांग्रेस में ब्लाक से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष तक के चुनाव करवाने की मांग कर रहे हैं ये वही लोग है जो राहुल के एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस के चुनाव करवाने के फैसले का मजाक उड़ाते थे। कांग्रेस में चुनाव की मांग इस तरह उठाई जा रही है कि जैसे यहां चुनाव होते ही नहीं हों। अभी तीन साल पहले कांग्रेस ने पूरी

पारदर्शिता और विधि विधान से अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव करवाया था। जिसमें राहुल गांधी निर्विरोध चुने गए थे।यही नेता थे, मीडिया था किसी ने भी उस समय चुनाव की प्रक्रिया पर एक ऊंगली तक नहीं उठा पाए थे। खुदसोनिया गांधी संगठन का चुनाव लड़ीं। 20 साल पहले जितेन्द्र प्रसाद उनके खिलाफ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़े। राजेश पायलट उनके प्रमुख सहयोगी थे। और जीतने के बाद सोनिया ने वैसे ही जैसे अभी राज्यसभा में विपक्ष का नेता बनाए रखे हुए आजाद के खिलाफ बदले की कोई भावना नहीं रखी उनके खिलाफ भी कभी कोई दुराव नहीं बरता। दोनों के न रहने पर उनकी पत्नियों को कांग्रेस का टिकट दिया। जितेन्द्र प्रसाद की पत्नी कांता प्रसाद नहीं जीत सकीं मगर राजेश पायलट की पत्नी रमा पायलट जीतीं। दोनों के लड़कों ने बगावत की मगर

सोनिया ने दोनों जतिन और सचिन को मंत्री बनाया। उन सोनिया पर जब वे अस्वस्थता के बावजूद कांग्रेसी नेताओं के कहने से ही पार्टी का नेतृत्व कर रही हैं आरोप पर आरोप लगाना कहां की पार्टी के प्रति वफादारी है।कांग्रेस के लिए यह सबसे कठिन संघर्ष का दौर है। और ऐसे में रोज घर के भेदी लंका ढहाने में लगे हुए हैं। आजाद से पहले कपिल सिब्बल भी नेतृत्व पर हमला बोल चुके हैं। बिहार का हारना जैसे इन लोगों के लिए एक अवसर बन गया। अभी और चुनाव आएंगे। हारना जीतना लगा रहेगा। लेकिन देखने वाली बात

बस एक होगी कि राहुल हिम्मत तो नहीं हारते! अभी वरिष्ठ पत्रकार हरिशंकर व्यास जी ने एक बहुत अच्छी बात लिखी जिसे कांग्रेस सर्किल में खूब कहा जा रहा है कि भाजपा और उससे पहले जनसंघ तो इतने चुनाव हारती रही। लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी।सचमुच कांग्रेस को घबराने की क्या जरूरत है? यह समय है बदलेगा तो फिर लोग कांग्रेस को लाएंगे। यही सच्चाई है। दुनिया भर में आज एक अलग तरह की राजनीति हो रही है। अमेरिका में चुनाव हार कर भी ट्रंप मानने को तैयार नहीं हैं। तो ऐसे में कुछ कांग्रेसियों द्वारा जहाज डूबने की भविष्यवाणियां करने का कोई मतलब नहीं है। शायद वे कांग्रेस रूपी जहाज से कूद कर किसी दूसरे जहाज में शरण लेने की भूमिका बना रहे हों। जो भी हो कांग्रेस का जहाज इस समय देश में विपक्ष का जहाज है जिसे जनता इतनी आसानी से डूबने नहीं देगी।

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