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दिग्विजय के लिए बनता माहौल

विपक्ष की एकता, उसे सही दिशा देने का काम कोई अनुभवी और विश्वसनीय व्यक्ति ही कर सकता है। दिग्विजय ने मध्यप्रदेश में दस साल अपनी सरकार चलाने के दौरान वहां सभी पार्टियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रखे। वह समय बसपा और सपा के उत्थान काल का था। मध्यप्रदेश में भी उनका बड़ा असर था। खासतौर से उत्तर प्रदेश से लगते इलाकों में। जैसे बुंदेलखंड। लेफ्ट भी ताकतवर थी। मगर दिग्विजय ने टकराव की राजनीति न करके सबसे संबंध रखे। भाजपा के नेताओं से भी अगर आप पूछें कि उनके व्यक्तिगत कामों में सबसे ज्यादा कौन नेता काम में आया तो वे बेहिचक दिग्गी राजा का नाम बताएंगे।

बदली हुई परिस्थितियों में अगर राहुल गांधी खुद अध्यक्ष बनना मान जाएं तो इससे बेहतर कुछ नहीं है। नथिंग लाइक देट। लेकिन अगर नहीं मानते है तो कांग्रेस के पास दिग्विजय सिंह से अच्छी च्वाइस कोई नहीं है। सौ प्रतिशत वफादार। कांग्रेस की विचारधारा के प्रति अडिग। कार्यकर्ताओं के लिए लड़ने वाले। राहुल की तरह किसी से नहीं डरने वाले। और राहुल की तरह ही हमेशा सड़क पर संघर्ष करते नजर आने वाले।

कांग्रेस को और क्या चाहिए? वे अभी हमें मिले केरल में। सबसे आगे चलते हुए। रात हो गई थी। करीब साढ़े सात- आठ बज रहे थे। सबके चेहरों पर थकान थी। राहुल पीछे रह गए थे। लोग जगह जगह रोक रहे थे। सबको तेजी थी कि जल्दी से जल्दी डेरे पर पहुंचे। आराम करें। मगर गांधी टोपी लगाए गमछे से पसीना पोंछते दिग्विजय कहीं से भी थके हुए और जल्दी में नहीं लग रहे थे। कोई यात्री आता कि सर फलाने फोन पर बात करना चाहते हैं। दिग्विजय कहते लाओ। और उसका फोन लेकर आराम से दूसरे छोर पर जो है उससे बात कर लेते। उसी सहजता से जितना किसी बड़े नेता का फोन आने पर कर रहे थे। सेल्फी लेने वाले एक मिनट को नहीं छोड़ रहे थे। केरल में दिग्विजय की इतनी लोकप्रियता है यह देखकर हैरानी हुई।

लेकिन यहां किस किस के नाम चल रहे हैं। मुकुल वासनिक जो हमेशा चल जाता है। 2019 में जब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था तब भी चला था। वरिष्ठ नेताओं ने पूरी कोशिश भी की थी। मगर सफल नहीं हुए। अब फिर चला रहे हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें ‘चलाना ’ सबसे आसान है। यहां तक कि उन्हें जी 23 में भी ले गए थे। और वे चले गए थे। तो अध्यक्ष से लेकर किसी भी पद के लिए जब कोई नहीं मिलता तो उनका नाम चला दिया जाता है। बाकी कौन?

तो खड़गे! जो यूपीए के टाइम लेबर मिनिस्टर थे। सारे श्रमिक विरोधी फैसले लेने वाले। उस समय उनके पास कोई भी कर्मचारी संगठन, श्रमिक यूनियन जाती थी तो मल्लिकार्जुन खड़गे उसकी बात भी सहानुभूतिपूर्वक नहीं सुनते थे। सुशील शिंदे! जो करीब करीब राजनीतिक सीन से गायब ही हैं। मगर ऐसे मौकों पर मीडिया को जरूर याद आते हैं। मीरा कुमार! जो अगर अध्यक्ष बन गईं तो प्रणव मुखर्जी की तरह (हालांकि वे कार्यकाल खत्म करके गए थे) नागपुर जाने में देर नहीं लगाएंगी। पहले बीजेपी में जा चुकी हैं। पिता जगजीवनराम ने भी इन्दिरा गांधी के सबसे कठिन समय में उनका साथ छोड़ था। फिर भी कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष बनाया। और उन्होंने बनने के बाद अपने आसपास संघियों को भर्ती कर लिया। पता नहीं कांग्रेस में मानिटर करने की व्यवस्था है या नहीं? और अगर है तो वह क्या किसी दक्षिणपंथी के हाथ में है जो प्रणव मुखर्जी से लेकर मीरा कुमार तक संघ मानसिकता के लोगों के प्रोफाइल को बढ़ा चढ़ाकर पेश करते रहता है?

दूसरी बात इस समय दलित स्पेस में कांग्रेस के लिए जगह ही नहीं है। अगर होती तो चन्नी छा गए होते। पंजाब में दलित सबसे ज्यादा हैं। सम्पन्न भी हैं और वहां मजबूत दलित आंदोलन भी रहा है। कांशीराम वहीं के थे। मगर इस समय दलित सब उग्र हिन्दुत्व के नशे में है। भाजपा द्वारा चलाई जा रही हिन्दू मुसलमान की राजनीति का सबसे बड़ा शिकार वही हुआ है। वह इतने गहरे असर में है कि दलित अत्याचारों के भयानक रुप से बढ़ने, आरक्षण को कमजोर करने पर भी उसका ध्यान नहीं जा रहा। मायावती जो उसकी सबसे बड़ी नेता हो गईं थीं वे खुद भाजपा के सामने शरणागत हो गईं हैं। ऐसे में कांग्रेस के लिए वहां इस समय इतना बड़ा दांव अध्यक्ष का लगाना बिल्कुल फिजुल है।

दलितों का हिन्दुत्व से मोहभंग होने और मायावती की असलियत समझ में आने के बाद ही वहां कांग्रेस के लिए फिर से जमीन बनेगी। तब तक उसे दलितों को लेकर संघ मानसिकता के अन्तरविरोध उजागर करने और मायवती एवं भाजपा के साथ की सच्चाई सामने लाने पर ही अपना ध्यान केन्द्रीत करना होगा। अध्यक्ष जैसा सर्वोच्च पद उसे जाति, धर्म की सीमाओं से उपर उठकर केवल इस पैमाने पर देना होगा कि कौन वफादार है। विचार के लिए प्रतिबद्ध है। लड़ता है। डरता नहीं है। और आज जो विपक्षी एकता की बात हो रही है कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर  वह उसमें किस तरह कांग्रेस की पुरानी नेतृत्वकारी भूमिका की वापसी करा सकता है।

नीतीश कुमार ने नई पहल शुरू की है। भाजपा बैचेन हो गई। नीतीश, लालू ने सोनिया से बात की। अभी इसका दायरा और बढ़ेगा। शरद पवार, ममता बनर्जी और दूसरे नेता मिलकर बात करेंगे। तो वहां कांग्रेस का प्रतिऩिधित्व दिग्विजय सिंह जैसे सर्वस्वीकार्यता वाले अनुभवी और बात के पक्के नेता करेंगे तो असर दूसरा ही होगा। विपक्ष में सोनिया गांधी का बहुत सम्मान है। स्वीकार्यता है। उनकी बात में वजन है। वही चीज नए कांग्रेस अध्यक्ष में चाहिए।

दिग्विजय ने 2003 में कह दिया कि दस साल कोई संवैधानिक पद नहीं लूंगा। तो इसको निभाया। 2004 में केन्द्र में सरकार बन गई। सोनिया, मनमोहन सिंह दोनों ने दिगिवजय से ज्वाइन करने को कहा। सबसे मह्त्वपूर्ण मंत्रालय देने की बात कही। मगर रघुकुल रीत सदा चली आई! राजा साहब नहीं माने। ऐसे दिग्गी राजा जब विपक्ष की बैठक में कांग्रेस का पक्ष रखेंगे तो उसका वज़न ही दूसरा होगा।

आज समस्या यह है कि विपक्ष दो भागों में बंटा हुआ है। लालू और नीतीश व्यापक एकता चाहते हैं। लेफ्ट भी उनसे सहमत है। शिवसेना, जेएमएम और दूसरी पार्टियां भी हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन हैं। दूसरी तरफ ममता बनर्जी, के चन्द्रशेखर राव हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री। अरविन्द केजरीवाल भी यहीं कहीं हैं। शरद पवार सबके बीच में हैं। ऐसे ही अखिलेश यादव हैं। जिनके जुड़ाव के बारे किसी को नहीं पता। ऐसे जटिल समीकरणों में कांग्रेस की नेतृत्वकारी भूमिका को वापस लाना बड़ी चुनौति है। कांग्रेस को कमजोर देखकर विपक्ष का हर नेता नेतृत्व पाना चाहता है। भाजपा को यह स्थिति बहुत सूट करती है। बिखरे और लड़ते हुए विपक्ष को वह अपने हिसाब से नियंत्रित भी करती रहती है। कहीं ईडी के छापे बढ़ा दिए जाते हैं तो कहीं कम कर दिए जाते हैं। एक मायवती जी हैं। जिनके बारे में यह कहना ज्यादा उपयुक्त होगा कि एक थीं मायावती! आज अलग से वे किसी गिनती में भी नहीं हैं। भाजपा प्लस में आ जाती हैं।

ऐसे में विपक्ष की एकता, उसे सही दिशा देने का काम कोई अनुभवी और विश्वसनीय व्यक्ति ही कर सकता है। दिग्विजय ने मध्यप्रदेश में दस साल अपनी सरकार चलाने के दौरान वहां सभी पार्टियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रखे। वह समय बसपा और सपा के उत्थान काल का था। मध्यप्रदेश में भी उनका बड़ा असर था। खासतौर से उत्तर प्रदेश से लगते इलाकों में। जैसे बुंदेलखंड। लेफ्ट भी ताकतवर थी। मगर दिग्विजय ने टकराव की राजनीति न करके सबसे संबंध रखे। भाजपा के नेताओं से भी अगर आप पूछें कि उनके व्यक्तिगत कामों में सबसे ज्यादा कौन नेता काम में आया तो वे बेहिचक दिग्गी राजा का नाम बताएंगे। शिवराज सिंह चौहान का जब एक्सिडेंट हो गया था। और उन्हें जहाज से तत्काल पहुंचाने की आवश्यकता थी तो दिग्विजय ने बिना एक मिनट भी देर किए सरकारी विमान भेज दिया था।

दिग्विजय व्यक्तिगत मामलों में विरोधियों के साथ जितने अच्छे संबंध रखते हैं। उतने ही वैचारिक मामलों में दृढ़ हैं। आरएसएस के सख्त खिलाफ। किसी भी तरह की साम्प्रदायिकता चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान दिग्विजय ने हमेशा उसका विरोध किया है। इसी तरह जाति के मामले में उन्हें हमेशा दलित और पिछड़ा समर्थक माना जाता है। मध्य प्रदेश में दलित डिक्लयरेशन उन्होंने ही पास किया था।

और अंत में कहलाते तो वे राजा हैं मगर देश में एक सबसे लंबी पदयात्रा (नर्मदा परिक्रमा) करने के बाद अब वे दूसरी उससे भी लंबी ( भारत जोड़ो यात्रा) कर रहे हैं। पहली यात्रा के समय राहुल अध्यक्ष थे तो वे उनसे अनुमति लेकर गए थे। और अब राहुल की इस यात्रा के मुख्य संयोजक के तौर पर साथ चलते चलते उनके अध्यक्ष बनने की स्थितियां बन गई हैं।

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