nayaindia rahul gandhi priyanka gandhi बहेलियों की काल-रात्रि में राहुल-प्रियंका का चिराग
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बहेलियों की काल-रात्रि में राहुल-प्रियंका का चिराग

rahul gandhi priyanka gandhi

समूचे विपक्ष की एकजुटता कराने की ठोस और अर्थवान पहलकदमी तीन ही लोग कर सकते हैं। एक, सोनिया गांधी; दो, शरद पवार; और तीन, ममता बनर्जी। लेकिन ममता यह ज़िम्मा तभी कारगर ढंग से निभा पाएंगी, जब वे किसी दिन बन भले ही जाएं, मगर फ़िलवक़्त ख़ुद प्रधानमंत्री बनने की ललक से अपने को मुक्त कर लें। इसके लिए उन्हें मतलबपरस्त आंकड़ा-बहेलियों का जाल छिन्नभिन्न करना होगा। rahul gandhi priyanka gandhi

जिनका दिल पंजाब में आम आदमी पार्टी की भरभर जीत के बाद बल्लियों-बल्लियों इतना उछल रहा है कि उन्हें अरविंद केजरीवाल में नरेंद्र भाई मोदी के राष्ट्रीय विकल्प के दर्शन होने लगे हैं, वे अपनी डायरी में लिख लें कि रायसीना पहाड़ी पर रखे सिंहासन से नरेंद्र भाई का विस्थापन विपक्ष जब भी करने की स्थिति में आएगा, वैकल्पिक चेहरा राहुल गांधी या प्रियंका गांधी का ही होगा। उत्तर प्रदेश में सवा दो प्रतिशत वोट के साथ महज़ दो सीटें ला पाने पर प्रियंका को हमेशा के लिए खारिज़ कर रहे महा-जन राजनीति की अस्थिर प्रकृति से अनभिज्ञ हैं। पंजाब के शांत आसमान में चुनाव के चंद महीने पहले तीर उड़ा कर उसे लपक लेने का करतब दिखाने के चक्कर में काफी-कुछ गंवा देने के लिए राहुल की कूवत को फिर-फिर संदेह के घेरे में धकेल रहे तमाम खुर्रांट सामाजिक विज्ञान के बुनियादी रक्त-बीज की तासीर से नावाकिफ़ हैं। इसलिए 2024 की गर्मियां आते-आते आज के सियासी दृश्य का शीर्षासन देखने को तैयार रहिए।

जो पांच प्रदेशों में हुई कांग्रेस की बुरी गत का ज़श्न मना रहे हैं, उन्हें इतना भी फुदकने की ज़रूरत नहीं है। कांग्रेस की हालत इन राज्यों में पहले से खराब हुई है, यह सही है। लेकिन इतनी नहीं, जितना माहौल बनाया जा रहा है। अभी-अभी चुनावी समर से बाहर आए पांच प्रदेशों में कांग्रेस की सीटें पहले से 85 कम हो गई हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की संख्या भी पहले से 43 घट गई है। कांग्रेस भाजपा के मुकाबले दुगनी रफ़्तार से रपटी है, मगर भाजपा ही कौन-से ऐसे ऐरावत पर सवार हो गई है कि आसमान छूने लगी है? अधोगामी कांग्रेस की सीटें कम होना तो समझ में आता है, लेकिन नरेंद्र भाई के ऊर्ध्वगामी कंधों पर लदी भाजपा की दो-चार नहीं, चार दर्जन सीटें घट जाने की वज़ह भी तो कोई बताए!

अगर अभी यह हाल है तो अगले लोकसभा चुनावों से पहले तो 15 और राज्यों के विधानसभा चुनाव होंगे। इस साल के दिसंबर में हिमाचल प्रदेश में चुनाव होंगे और अगले साल 2023 की जनवरी में गुजरात में। फरवरी में नगालैंड, मेघालय और त्रिपुरा के चुनाव होंगे। अप्रैल में कर्नाटक विधानसभा का चुनाव होगा और नवंबर में मिज़ोरम का। दिसंबर में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना के चुनाव आ जाएंगे। 2024 के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा के विधानसभा चुनाव भी हो रहे होंगे।

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इन 15 प्रदेशों से 1747 विधायक चुने जाते हैं। अभी इनमें से 657 भाजपा के हैं और 421 कांग्रेस के। अगर पांच प्रदेशों के ताजा चुनावों में भाजपा के विधायकों की तादाद 11 फ़ीसदी कम होने की यह गिरावट दर दो साल बीतते-बीतते और न भी बढ़े तो पंद्रह प्रदेशों के विधानसभा चुनाव होने के बाद भाजपा-विधायकों की संख्या 580 के आसपास रह जाने के पूरे आसार तो आज ही दिखाई दे रहे हैं। इतने के लिए तो विपक्ष को ज़्यादा कुछ करने की ज़रूरत ही नहीं है। अगर कहीं कांग्रेस ने दम पकड़ लिया तो भाजपा के निर्वाचित विधायकों का आंकड़ा इन राज्यों में पांच सौ से नीचे भी पहुंच सकता है। इसका इसका सीधा मतलब यह होगा कि इन पंद्रह प्रदेशों से 2024 की लोकसभा में भाजपा के चुन कर आने वाले सांसदों की संख्या सौ और सवा सौ के बीच रहेगी। बाकी के एक दर्जन राज्यों से वह अपने और कितने सांसद जिता कर ला पाएगी? इसलिए आज का हो-हल्ला कानों को कितना ही गुंजा रहा हो, नीचे फिसल रहा भाजपा का ग्राफ अगले आम चुनाव में भाजपा के माथे पर पसीना लाने के संकेत दे रहा है।

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विधानसभाओं में राजनीतिक दलों की उपस्थिति का यह बीजगणित कहता है कि इन पंद्रह राज्यों में लोकसभा की 90 के आसपास सीटें जीतने की हालत में तो कांग्रेस आज भी है। राहुल-प्रियंका अगर पंद्रह प्रदेशों का नक्शा बना कर पूरे जज़्बे के साथ अपने घर से निकल गए तो इनमें से कम-से-कम आधे राज्य ऐसे हैं, जहां कांग्रेस की सरकारें बन सकती हैं। बावजूद इसके कि भाजपा की बिछाई बिसात पर और उसके मुहैया कराए नौ मन तेल के बूते अरविंद केजरीवाल बहुत-से प्रदेशों में अपने नृत्य कार्यक्रम आयोजित करेंगे, मुझे नहीं लगता कि उनकी ताल-से-ताल मिलाने में मतदाताओं की कोई ख़ास दिलचस्पी रहेगी। मगर इसके लिए राहुल-प्रियंका को दो काम करने होंगे। एक तो ख़ुद को पूरी तरह मत-कुरुक्षेत्र में झोंक देना होगा और दूसरा अपने बहुत-से अगलियों-बगलियों को भाड़ में झोंक देना होगा। यह हो गया तो आम आदमी पार्टी 15 प्रदेशों में अपने 15 विधायक भी नहीं जिता पाएगी।

अगले आम चुनाव में मतदाताओं की संख्या 99 करोड़ का आंकड़ा छू लेगी। तब तक़रीबन दो करोड़ युवा पहली बार मतदान कर रहे होंगे। 18 से 45 बरस की उम्र के बीच के मतदाताओं की तादाद 2024 में क़रीब 40 करोड़ होगी। भाजपा की लोकप्रियता में गिरावट का मौजूदा प्रवाह अगर आज की औसत दर से भी बना रहा तो अगले आम चुनाव में उसे 33 प्रतिशत से ज़्यादा वोट हासिल नहीं हो पाएंगे। विपक्ष के वोट अगर आपस में ज़्यादा नहीं बंटे तो 33 प्रतिशत वोट पर भाजपा स्पष्ट बहुमत हासिल करने की स्थिति में नहीं होगी। खंड-खंड विपक्ष की स्थिति में तो यह मत-प्रतिशत केंद्र में भाजपा की सरकार बनवाने के लिए काफी होगा, लेकिन चुनावी आंकड़ों का इतिहास बताता है कि कांग्रेस 28 प्रतिशत वोट का आंकड़ा छू लेती है तो लोकसभा में उसकी सीटें 200 की संख्या आसानी से पार कर लेती हैं। जो पांच राज्यों में जीत का उत्सव मना कर भाजपा को अपराजेय घोषित कर चुके हैं, उन्हें यह अंदाज़ ही नहीं है कि सकल-विपक्ष की एकजुट रणनीति 2024 में नरेंद्र भाई के लिए विदाई भोज आराम से तैयार कर सकती है।

समूचे विपक्ष की एकजुटता कराने की ठोस और अर्थवान पहलकदमी तीन ही लोग कर सकते हैं। एक, सोनिया गांधी; दो, शरद पवार; और तीन, ममता बनर्जी। लेकिन ममता यह ज़िम्मा तभी कारगर ढंग से निभा पाएंगी, जब वे किसी दिन बन भले ही जाएं, मगर फ़िलवक़्त ख़ुद प्रधानमंत्री बनने की ललक से अपने को मुक्त कर लें। इसके लिए उन्हें मतलबपरस्त आंकड़ा-बहेलियों का जाल छिन्नभिन्न करना होगा। विपक्षी एकजुटता के स्वयंभू वास्तुकार बन देश भर में घूम रहे फुदकिए को पूरी तरह किनारे लगाए बिना कोई विश्वसनीय विकल्प तैयार होना मुश्क़िल है। सबसे पहले तो यह अहसास होना ज़रूरी है कि विपक्ष की समतल ज़मीन तैयार करना बेहद संजीदा विषय है और इस सियासी गुड़ाई का काम चार तक का पहाड़ा सीख लेने पर ही अपने को पायथोगोरस समझ लेने वालों के हवाले नहीं किया जा सकता। ऐसा करते ही इस प्रयास की पूरी गंभीरता और अर्थवत्ता का स्खलन हो जाएगा। विपक्षी जहाज के मस्तूलों के मुंह पर इससे बड़ा तमाचा और क्या होगा कि उन्हें अपने बादबान संभालने का इतना भी शऊर अब तक हासिल नहीं हुआ है कि रणनीतिकार का लबादा ओढ़े घूम रहे मदारियों की शरण में जाना पड़ रहा है? घड़ी वक़्त माप सकती है, पर उसे जान नहीं सकती। उसे जानने का काम तो तज़ुर्बेकार विपक्षी लंबरदारों को ही करना होगा।( लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।) rahul gandhi priyanka gandhi

By पंकज शर्मा

हिंदी के वरिष्ठतम पत्रकार। नवभारत टाइम्स में बतौर विशेष संवाददाता का लंबा अनुभव। जाफ़ना के जंगलों से भी नवभारत टाइम्स के लिए रपटें भेजीं और हंगरी के बुदापेश्त से भी।अस्सी के दशक में दूरदर्शन के कार्यक्रमों की लगातार एंकरिंग। नब्बे के दशक में टेलीविज़न के कई कार्यक्रम और फ़िल्में बनाईं। फिलहाल ‘न्यूज़ व्यूज़ इंडिया’ और ‘ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर’ के कर्ता-धर्ता।

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